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    क्या संदेशखाली मुद्दे को सियासी तूल देकर टीएमसी के लिए समस्या खड़ी कर पाएगी बीजेपी…?

    Devanand SinghBy Devanand SinghFebruary 28, 2024No Comments5 Mins Read
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    क्या संदेशखाली मुद्दे को सियासी तूल देकर टीएमसी के लिए समस्या खड़ी कर पाएगी बीजेपी…?

    देवानंद सिंह

    पश्चिम बंगाल का संदेशखाली मुद्दा शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। भारतीय जनता पार्टी आगामी लोकसभा चुनावों में इसे भुनाने की पूरी तैयारी में जुटी हुई है। इसके दो मुख्य कारण हैं। पहला भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने भाल भाजपा को निर्देश दिए हैं कि चुनाव तक इस मुद्दे को न सिर्फ़ जीवित रखा जाए बल्कि इस पर नंदीग्राम की तर्ज पर ज़बरदस्त राज्यव्यापी आंदोलन खड़ा करने की भी रणनीति तैयार की जाए। खुद केंद्रीय नेतृत्व भी इसमें जुटा है, दूसरा प्रमुख कारण है, इसी के तहत पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एक सप्ताह में तीन-तीन बार पश्चिम बंगाल दौरे पर जाने की तैयारी करना।
    दरअसल, पहले पीएम मोदी को छह मार्च को उत्तर 24-परगना ज़िला मुख्यालय बारासात में संदेशखाली के मुद्दे पर एक जनसभा को संबोधित करना था, लेकिन अब इसकी तारीख़ बदल कर आठ मार्च कर दी गई है। बीजेपी नेताओं के मुताबिक़ प्रधानमंत्री ने महिलाओं पर अत्याचार और यौन उत्पीड़न का मुद्दा उठाने के लिए अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस यानी आठ मार्च ही चुना है, लेकिन उससे पहले प्रधानमंत्री एक और दो मार्च को आरामबाग़ और कृष्णानगर लोकसभा इलाक़ों में अलग-अलग रैलियों को संबोधित कर सकते हैं, क्योंकि चुनावी समीकरण के लिहाज से पार्टी के लिए यह दोनों सीटें अहम हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी आरामबाग़ लोकसभा सीट पर बहुत कम अंतर से हारी थी, जबकि वर्ष 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी इस लोकसभा क्षेत्र के तहत सात में से चार विधानसभा सीटों पर विजयी रही थी। दूसरी ओर, नदिया ज़िले में कृष्णानगर की राजनीतिक ज़मीन भी बीजेपी के लिए उपजाऊ है। वो पहले यह सीट जीत चुकी है। वर्ष 1999 में इस सीट पर पार्टी के उम्मीदवार जलू मुखर्जी जीते थे। उस समय राज्य में बीजेपी का कोई संगठन या जनाधार नहीं था। वहीं, कृष्णानगर की तृणमूल कांग्रेस सांसद रही महुआ मोइत्रा की लोकसभा सदस्यता छिनने और उनके कामकाज पर विवाद पैदा होने के बाद उपजी परिस्थिति का फ़ायदा बीजेपी उठाना चाहती है।

     

     

    उधर, प्रदेश बीजेपी सिंगूर और नंदीग्राम की तर्ज़ पर ही संदेशखाली आंदोलन को भी खड़ा करना चाहती है। इसकी कड़ी में, संदेशखाली पर आंदोलन तेज़ करने की अपनी रणनीति के तहत ही पार्टी ने बीते सप्ताह ‘द बिग रिवील-द संदेशखाली शॉकर’ शीर्षक से एक डॉक्यूमेंट्री भी जारी की है, इसमें संदेशखाली की प्रभावित महिलाओं के बयान और इलाक़े की स्थिति दिखाई गई है और संदेशखाली की तुलना नंदीग्राम से की है। बीजेपी विधायक शुभेंदु अधिकारी ने कहा, “संदेशखाली की परिस्थिति नंदीग्राम जैसी है। नंदीग्राम में लोगों ने ज़मीन के अधिग्रहण के ख़िलाफ़ लड़ाई की थी और यहां ज़मीन पर जबरन कब्ज़े के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं। संदेशखाली में खेती की ज़मीन पर जबरन कब्ज़ा यौन उत्पीड़न के बाद दूसरा सबसे बड़ा मुद्दा है।” यह गरम मुद्दा है, इसीलिए बीजेपी इस मुद्दे को लोकसभा चुनाव तक बनाए रखना चाहती है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसभा भी इसी रणनीति का हिस्सा है।

     

     

    दूसरी तरफ, कई केंद्रीय आयोग के प्रतिनिधि भी संदेशखाली का दौरा कर रहे हैं। राष्ट्रीय जनजाति आयोग की टीम बीते सप्ताह दूसरी बार यहां पर पहुंची। इससे पहले इलाक़े के दौरे के बाद उसने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंपी रिपोर्ट में बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफ़ारिश की थी। वहीं, राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा के नेतृत्व में भी एक टीम संदेशखाली के दौरे के बाद यही बात दोहरा चुकी है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी राज्य प्रशासन से चार सप्ताह के भीतर संदेशखाली पर रिपोर्ट मांगी है। मानवाधिकार आयोग की टीम भी दो दिनों तक इलाक़े का दौरा कर पीड़ितों से बातचीत कर चुकी है। अगर, चुनावी समीकरणों के नजरिए से देखें तो कृष्णानगर इलाक़े की ज़मीनी परिस्थिति बीजेपी की राजनीति के लिए सही है, इसी वजह से लोकसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री की सभा के लिए कृष्णानगर को चुना गया है।
    प्रधानमंत्री मोदी के दौरे से पहले प्रदेश बीजेपी ने कोलकाता में गांधी प्रतिमा के नीचे 27 से 29 फरवरी तक धरना देने का भी फ़ैसला किया है। इसमें पार्टी के तमाम नेता शामिल रहेंगे। बता दें कि बीजेपी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में राज्य की 42 में से 18 सीटें जीती थीं। बीजेपी नेताओं का मानना है कि तब जिस तरह उन्होंने अपनी सीटों की संख्या दो से बढ़ा कर 18 तक पहुंच दिया था, उसी तरह इस बार संदेशखाली आंदोलन के ज़रिए इसे 30 के पार पहुंचाना ही उनका लक्ष्य है। कुल मिलाकर, बीजेपी संदेशखाली के बहाने राज्य में महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों और उनकी हालत को मुद्दा बनाते हुए ममता बनर्जी के इस वोट बैंक में सेंध लगाना चाहती है।

     

     

    यह पूरा मामला बीते महीने राशन घोटाले के सिलसिले में तृणमूल कांग्रेस नेता शाहजहां शेख के घर ईडी के छापे से शुरू हुआ था। इस मामले में पूर्व खाद्य मंत्री ज्योतिप्रिय मल्लिक की गिरफ्तारी के बाद ईडी की एक टीम पिछले महीने पांच जनवरी को शाहजहां शेख के घर की तलाशी के लिए संदेशखाली पहुंची थी, लेकिन उस समय शाहजहां शेख के कथित समर्थकों के हमले में ईडी के तीन अधिकारी घायल हो गए थे। शाहजहां तभी से फरार है। उसके जिन दो सहयोगियों पर यौन उत्पीड़न और जमीन पर जबरन कब्जे के आरोप लगे हैं, जिनमें उत्तम सर्दार और शिव प्रसाद हाजरा शामिल हैं, जिन्हें पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है। देखने वाली बात होगी कि  संदेशखाली मुद्दे को सियासी तूल देकर बीजेपी टीएमसी को लोकसभा में कितना नुकसान पहुंचा पाती है।

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