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    Home » पुरुषोत्म को अपना ध्येय बना लेना इससे मनुष्य एक दिन पुरुषोत्म में मिलकर एकाकार हो जायगा
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    पुरुषोत्म को अपना ध्येय बना लेना इससे मनुष्य एक दिन पुरुषोत्म में मिलकर एकाकार हो जायगा

    Nizam KhanBy Nizam KhanDecember 31, 2023No Comments5 Mins Read
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    पुरुषोत्तम सृष्टि के प्राण केंद्र हैं

    प्राणकेन्द्र मे हैं पुरुषोत्म और सम्पूर्ण जगत पुरुषोत्तम के चारो तरफ घूम रहें हैं, चक्कर लगा रहे हैं।

    पुरुषोत्म को अपना ध्येय बना लेना इससे मनुष्य एक दिन पुरुषोत्म में मिलकर एकाकार हो जायगा

    —————————————————————-

    विज्ञप्ति
    जमशेदपुर 31 दिसंबर 2023

    जमशेदपुर एवं आसपास के क्षेत्र से काफी संख्या में आनंद मार्गी इस धर्म महासम्मेलन में भाग ले रहे हैं जो लोग इस धर्म महासम्मेलन में सशरीर उपस्थित नहीं है वह वेब टेलीकास्ट के माध्यम से इस कार्यक्रम का लाभ उठा रहे हैं
    आनंद मार्ग प्रचारक संघ के विश्वस्तरीय धर्म महासम्मेलन में देश के विभिन्न भागों से भक्तों आनंद नगर धर्म सम्मेलन में भाग लेने पहुंचे हैं साधक साधिकाओं ने ब्रह्म मुहूर्त में गुरु सकाश, पाञ्चजन्य एवं योगासन का अभ्यास अनुभवी आचार्य के निर्देशन में किया।
    संघ के पुरोधा प्रमुख श्रद्धेय आचार्य विश्वदेवानंद अवधूत ने दूसरे दिन भक्तों को को संबोधित करते हुए कहा कि पुरुषोत्तम विश्व के प्राण केंद्र हैं। वे ओत योग एवम प्रोत योग के द्वारा विश्व के साथ जुड़े हैं। हर प्राणी जीव- जंतु, पशु-पक्षी, लता लता- गुल्म के साथ व्यक्तिगत रूप से जुड़े रहते इसे कहते हैं ओत योग। परमपुरुष सभी सत्ताओं के साथ समषटि गत भाव से जुड़े रहते हैं उसे ही कहते हैं प्रोत योग। परम पुरुष के इस अंतरंग संबंध को भक्त लोग ही अनुभव करते हैं।
    पुरोधा प्रमुख जी ने कहा कि भक्त तीन प्रकार के होते हैं। प्रथम प्रकार के साधक कहते हैं की परम पुरुष सबके हैं इसलिए मेरे भी हैं, ऐसा मनोभाव रखने वाले भक्त अधम श्रेणी में गणय है । परम पुरुष मेरे भी हैं और अन्य सभी जीवो के भी हैं, ऐसे भक्त मध्यम श्रेणी के हैं। अव्वल दर्जे के भक्त कहते हैं कि परम पुरुष मेरे हैं और सिर्फ मेरे हैं, वे मेरे परम संपत्ति है। आचार्य जी ने कहा की भक्ति पाने के लिए नैतिक नियमो का पालन करना होगा । अहिंसासत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य शौच संतोष तप स्वाध्याय ईश्वर प्रणिधान के पालन से मन निर्मल होता है। इस निर्मल मन से जब इष्ट का ध्यान किया जाता है तो भक्ति सहज उपलब्ध हो जाता है।

    हर अवस्था में हर भावना में ब्रह्म को देखना, हर कर्म में ब्रह्म को देखना ही ब्रह्म सद्भाव है। परमात्मा का मन ही अपना मन हो जाता। अपना मन नहीं रहता ।

    ब्रह्मचक्र में हर जीव धूम रहे हैं, वे अपन-अपना आजीव या आलम्बन लेकर घूम रहे हैं। अपने-अपने संस्कारों अर्थात प्रतिक्रियात्मक बीजों के अनुसार सभी चक्कर लगा रहे हैं। उन्होंने चार प्रकार के छोटे एवं बडे चक्रों का जिक्र किया- पहला है पारमाणविक संरचना जिसमें प्राणकेन्द्र के चारों तरफ विधुताणु घूम रहें है, दूसरा है- पार्थिव चक्र जिसके केन्द्र मे पृथ्वी है और चन्द्रमा उसके चारो तरफ घूम रहा है- तीसरा है सौरचक्र – जिसमें सूर्य प्राणकेन्द्र में है और सभी ग्रह उसके चारो ओर घूम रहे हैं और चौथा तथा सबसे बडा चक्र है ब्रह्मचक्र अर्थात जिसके प्राणकेन्द्र मे हैं पुरुषोत्म और सम्पूर्ण जगत व्यापार ( जड-चेतन) सम्पूर्ण जीव समूह उस पुरुषोत्तम के चारो तरफ घूम रहें हैं, चक्कर लगा रहे हैं।

    इस घुमने के क्रम में जब वे यह समझते रहते हैं कि वे और उनका प्रणकेन्द्र अलग नहीं है, वे समझने लगते हैं कि मैं परम पिता का अंग हूँ और मुझे उनसे मिलकर एकाकार हो जाना है तब वे परमपुरुष से मिलकर अमृत के महासिन्धु में विलीन हो जाते हैं। और तब सृष्ट जीव अमृतत्व पा जाते हैं। इसके लिए उनकी कृपा की आवश्यकता होती है। ऐसे लोग साधक होते हैं। दूसरे प्रकार के वे साधारण लोग हैं जो कहते हैं कि मैं पाप भी नहीं करता हूँ, साधना भजन भी करता हूँ, ऐसे लोग विद्या और अविद्या के सामंजस्य के कारण अनन्तकाल तक घूमते रहेगे, उनका घुमना कभी बन्द नहीं होगा। तीसरे प्रकार के वे मनुष्य है जिन्हे पापाचारी कह सकते हैं, वे अविद्या शक्ति को बढावा देगें- अत: केन्द्र से दूर हट जाएगे। ब्रह्मचक्र में दो प्रकार की शक्ति काम करती हैं- विद्यामाया या केन्द्रानुगा शक्ति और अविद्यामाया या केन्द्रातिगा शक्ति। जबतक जीव के मन में यह बोध रहेगा कि मैं और मेरे भेजनेवाले, मैं और मेरे इष्ट दो पृथक सत्तायें है तबतक उनका घूमना बन्द नहीं होगा । हर अवस्था में हर भावना में हर कर्म में ब्रह्म को देखते रहने से अर्थात ब्रह्मसद्भाव से ही साधक का घूमना बन्द हो जायगा । वह देश काल पात्र के चक्कर से मुक्त हो जायगा। विद्या शक्ति की पहचान उसके संवि शक्ति एवं हलादिनी शक्ति से होती है और अविद्या शक्ति की पहचान उसके आवरणी शक्ति तथा विक्षेप शक्ति से होती है। दोनों का मन पर दो-दो प्रकार के प्रभाव पडते हैं। अविद्याशक्ति का प्रभाव मुख्यत: अष्टपाश और शडरिपु के द्वारा मानव मन पर पडता है। इनके प्रभाव से बचने का एकमात्र रास्ता है- ब्रह्मसद्भाव । अर्थात मन समर्पण करने की साधना, चरम दान की साधना । परमपुरुष को अपना ध्येय बना लेना। इससे मनुष्य एक दिन परमपुरुष में मिलकर एकाकार हो जायगा ।

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