प्रदीप कुमार नायक की रिपोर्ट
स्वतंत्र लेखक एवं पत्रकार
मधुबनी ,बिहार: सतत् स्मरण दुनियादारी में फंसे अधिकतर लोगों का जीवन इतना कठोर और दुखःमय होता है कि वे सदा किसी न किसी समस्या में उलझे रहते हैं और उनका बहुधा यह विश्वास हो जाता है कि वो भक्ति या पूजा के लिए शायद ही कोई समय निकाल सकें। वे सोचते हैं कि यदि वे पूजा के लिए समय निकालेंगे तो उन्हें महत्वपूर्ण और आर्थिक दृष्टि से लाभप्रद ऐसे अनेक कार्यों की अवहेलना करनी पड़ेगी जिन्हें वे आसानी से नहीं छोड़ सकते। यह विचार उनको कर्त्तव्य-पथ से दूर रखता है,यद्दपि कभी -कभी इसका भान उन्हें हो जाया करता है। उनका मन भौतिक जीवन की विविध समस्याओं को सोचने में हर क्षण डूबा रहता है और घोर विपत्ति या मुसीबत के दिनों को छोड़कर ईश्वर का ओर बहुत कम जाता है।इसका कारण यह है कि वे उन सांसारिक लाभों को ही प्रमुखता देते हैं जिनका ध्यान वे निरन्तर करते रहते हैं। इसलिए,वे माया के जंजाल में उलझे पड़े रहते हैं और कभी उसके बाहर निकलने की नहीं सोचते। यदि हम अपना ध्यान ईश्वर की ओर लगा दें और साक्षात्कार को अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य समझें तो स्वभावतः हम संसार की अन्य सभी वस्तुओं की अपेक्षा सर्व-प्रथम इसी को महत्व देने लगेंगे। इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपनी सांसारिक जिम्मेदारियों की ओर से उदासीन हो जायें और उससे सम्बन्धित अपने कर्त्तव्यों को भुला दें जिससे हमारी सहायता पर आश्रित रहने वाले परेशानी में पड़ जायें ।हमें सदा उनके तथा ईश्वर,दोनों के प्रति अपने कर्त्तव्य में सजग रहना है ,लेकिन बिना किसी अनुचित लगाव या आसक्ति के। इसके लिये हम अपने विश्राम के घण्टों से (विशेषकर सोने के समय) चन्द मिनट निकाल लें और कर्त्तव्य- पथ पर चलने के लिए सहायता एवं पथ-प्रदर्शन के निमित्त सच्चे दिल से ईश्वर से प्रार्थना करें। यदि हम प्रेम एवं भक्तिपूर्ण हृदय से इसे बराबर करते रहें तो प्रार्थना कभी भी अनसुनी नहीं होगी। इस प्रकार जब हम में कर्त्तव्य की भावना जाग उठती है और ईश्वर का भाव हमारे हृदय में प्रमुख हो जाता है तो साक्षात्कार को हम जीवन का मुख्य उद्देश्य मानने लगते हैं।इसके लिए स्वभावतः हमारी उत्कणठा उत्तरोत्तर तीव्र होने लगती है और अपने दैनिक कार्यों की उलझनों तथा व्यस्तताओं के बावजूद हमें ईश्वर का ध्यान बार-बार आता रहता है। हमारे कर्त्तव्य-पथ से विचलित होने का कारण हमारी परिस्थितियाँ या व्यस्तताएँ नहीं,अनियन्त्रित मन की दिगभ्रमित क्रियाएँ होती हैं।ईश्वर के बोध मात्र से मन के अनेक दोषों का उपचार और मार्ग की अनेक कठिनाइयों का निराकरण हो जाता है।इसलिए हमें दुनियादारी के सारे कामों के बीच ईश्वर की याद बनाये रखनी चाहिए। साक्षात्कार में अपनी अन्तिम सफलता के लिए ईश्वर का स्मरण,य़द्दपि बहुत लाभदायक है पर सब कुछ नहीं है। हम आमतौर से कोई महत्वपूर्ण कार्य ईश्वर का नाम लेकर आरम्भ करते हैं। लगभग सभी धर्मों में ऐसा करने की प्रथा है।किन्तु,यह केवल एक औपचारिकता मात्र है और इसका कोई वास्तविक महत्व नहीं है। हम उस वस्तु को सच्चे अर्थों में ईश्वर को समर्पित नहीं करते तथा हृदय में ईश्वर को विचार से वास्तव में कोसों दूर रहते हैं। अतः ईश्वर का ऐसा स्मरण निरर्थक है। इस प्रथा का वास्तविक महत्व यह है कि हम अपने सभी शारीरिक एवं मानसिक कार्य करते हुए भी ईश्वर के विचार में निमग्न रहें। हम अपने सभी कार्यों में हर क्षण एक अटूट विचारों की कड़ी द्वारा,अपने को परम शक्ति से जुड़ा हआ महसूस करें। यह क्रिया बड़ी सरलता से हो सकती है यदि हम अपने सभी कार्यों एवं क्रियाओं को उस ईश्वर द्वारा सोंपे गये कर्त्तव्य का अंग समझें जिसकी हमें भरसक सेवा करनी है। सेवा तथा त्याग दो प्रमुख उपकरण हैं जिनसे हम आध्यात्मिकता के मन्दिर का निर्माण करते हैं। प्रेम इस मन्दिर की नींव है ही।किसी भी प्रकार सेवा यदि निःस्वार्थ भाव से की जाय तो लाभप्रद होती है। सेवा में पूजा का भाव निहित है। अपने साथियों की सेवा वास्तविक अर्थ में ईश्वर की सेवा है यदि वह किसी स्वार्थ-भाव से न की गई हो। हम जो कुछ भी अपने दैनिक कार्यों में करते हैं उन सब का सम्बन्ध अपने ही कुछ लोगों से है चाहे वे हमारे बच्चे,मित्र अथवा सम्बन्धी हों। यदि कार्य करते समय हम यह सोचें कि वास्तव में ईश्वर के ही बनाए हुए किसी न किसी प्राणी की सेवा कर रहे हैं,अपने उद्देश्य की नहीं,तो हम निरन्तर सेवा के पथ का अनुसरण करते रहेंगे य़द्यपि ऊपरी तौर से हम अपनी ही दिनचर्या में व्यस्त रहेंगे। हमारे जीवन की लगभग सभी क्रियायें अपने बच्चों एवं प्रियजनों के जीविका उपार्जन के निमित्त होती हैं। अतः यदि हम उन्हें ईश्वर के बच्चे मान लें जो हमारी देख-रेख में रक्खे गये हैं और जिनके निर्वाह एवं सुरक्षा का भार कर्त्तव्य रूप में हम पर सोंपा गया है,तो हम ईश्वर के ही बच्चों की सेवा करते हैं,जो वास्तव में ईश्वर की ही सेवा है।हम इसके द्वारा अनावश्यक आसक्ति से भी छुटकारा पा जायेंगे और इस प्रकार अपने मार्ग की एक सबसे बड़ी बाधा भी हटा देंगे।यह विधि सरल एवं आसान होते हुए भी हमें हमारी सभी क्रियाओं में ईश्वर के सतत् विचार की ओर भी ले जायगी।यदि यह बात हमारे हृदय में गहराई से जड़ पकड़ लेती है तो हमें अपना प्रत्येक कार्य निःस्वार्थ और अनासक्त भाव से दैवी आदेशानुसार कर्त्तव्य के रूप में ही प्रतीत होगा।ऐसी दशा में विश्व-प्रेम प्रबल हो जाता है और हम अनासक्त भाव से ईश्वर की सृष्टि के प्रत्येक प्राणी से प्रेम करने लगते हैं। यह चित्तवृत्ति हमें भक्ति एवं त्याग की ओर ले जाती हेै। भक्ति हमारा मार्ग प्रशस्त करती है तथा ईश्वरीय धारा के लिए हमारे हृदय में एक रास्ता बनाती है।वह हमारे मार्ग से धूल-धक्कड़ दूर करती है और हमारी यात्रा को आसान बनाती है। यह धूल-धक्कड़ वस्तुतः मन में चिन्ता और उद्वेग को जन्म देने वाले अन्तर्द्वन्द्व से उत्पन्न होती है। ध्यान के द्वारा हमारा मन थोड़ी देर के लिए शान्त हो जाता है,और जितने समय तक हम दैवी शक्ति के सम्पर्क में रहते हैं शान्ति बनी रहती है। किन्तु यदि हम एक निश्चित समय पर ध्यान करने के उपरान्त शेष समय में ईश्वर का कोई ख्याल नहीं करते तो हम उस पवित्र विचार के सम्पर्क में थोड़ी देर के लिए ही रहेंगे और दिन के अधिकांश भाग में सेवा और भक्ति से विरत रहेंगे। परिणाम यह होगा कि वर्षों की साधना के पश्चात् भी हम अपने को आध्यात्मिक उपलब्धि में पिछड़ा हुआ ही पाएँगे।वास्तव में,समर्थ गुरु के पथ-प्रदर्शन में किये गये ध्यान में हमें केवल सरलता और शान्ति की ही अनुभूति होती है। परन्तु,एक साधक साधारणतः इसको समझने में असमर्थ होता है,क्योंकि आरम्भिक दशाओं में यह उसकी समझ से परे होती है।शान्ति की इस अनुभूति के अत्यन्त सूक्षम होने के कारण वह बहुधा ध्यान के समय कुछ भी अनुभव न करने की शिकायत करता है। इसका मुख्य कारण यह होता है कि वह साधना के कुछ क्षणों तक के लिए ही दैवी शक्ति के सम्पर्क में रहता है। अतः ध्यान के समय प्राप्त वास्तविक वस्तु उसके पास कुछ ही समय तक के लिए रहती है।दूसरी ओर,एक मनुष्य ध्यान से प्राप्त प्रभाव को अधिकांश समय के लिये अपने में बनाये रखने के लिए प्रयत्न करता है और उसी स्थिति में जितनी अधिक देर तक सम्भव हैं वह रहता है।वह एक तरह से ईश्वर के सतत् स्मरण में है और उसकी प्रगति आसान और तेज हो जाती है।

