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    Devanand SinghBy Devanand SinghJuly 14, 2019No Comments4 Mins Read
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    हार की पीड़ा

    जय प्रकाश राय न
    विश्व कप क्रिेकेट प्रतियोगिता के सेमीफाइनल में भारत की हार के बाद असंख्य प्रशंसकों की तरह मेरा भी दिल टूट गया। बल्कि बैठ गया। यह टीम चैंपियन बनने की हकदार थी और जब धोनी टीम को जीत के बिलकुल करीब ले जाकर इंच भर से रनआउट हो गये तो सभी की उम्मीदें टूट गयीँ। धोनी का वापस आना किसी से देखा नहीं गया। उनके आंखें से आंसू द्रवित करने वाले थे। कई लोग ऐसे भी हैं जिनको न जाने क्यों धोनी के सन्यास की पड़ी है। धोनी के सन्यास लेने से न जाने उनकी कौन सी मुराद पूरी होने वाली है। यह खिलाड़ी न जाने कितनी बार भारत को ऐसी परिस्थिति में जीत दिलाता रहा है। धोनी टीम से बाहर हो गये तो उनका कौन विकल्प होगा? जो मौजूद विकल्प हैं सभी इस मैच में खेले थे। उनका क्या योगदान रहा यह बहस का विषय नहीं। पता नहीं धोनी यदि सेमीफाइनल में भी 50 ओवर तक टिक जाते तो कहानी कुछ और होती। लेकिनयह खेल है। इसमें जीत हार लगी रहती है।
    जब दक्षिण अफ्रीका ने आस्ट्रेलिया को अंतिम लीग मुकाबले में पराजित किया था तो भारतीय प्रशंसकों ने राहत की सांस ली थी कि उसे सेमीफाइनल में इंगलैंड जैसी तगड़ी टीम से नहीं भिडऩा होगा। न्यूजीलैंड केसेमीफाइनल में पहुंचने वाली चारों टीमों में सबसे कमजोर आंका जा रहा था और जिस तरह का भारत का प्रदर्शन इस प्रतियोगिता में या पिछले दो तीन सालों से रहा है, उससे तो सभी मान रहे थे कि भारत का काम आसान रहेगा। जब भारतीय गेंदबाजों ने न्यूजीलैंड को 239 पर रोक दिया तो उसके बाद तो जीत को महज औपचारिकता माना जा रहा था। लेकिन जो कुछ हुआवह बेहद निराश करने वाला था। विराट कोहली की इस टीम में चैंपियन बनने के सारे गुण मौजूद थे। बल्लेबाजी, गेंदबाजी, क्षेत्ररक्षण और उससे बढकर मनोवैज्ञानिक तौर पर भी यह टीम काफी सशक्त नजर आ रही थी। इस टीम ने पिछले दो तीन सालों में अपने काबिलियत से सभी को काफी प्रभावित किया था और कई समीक्षक भी मान रहे थे कि भारत इस प्रतियोगिता के फाइनल में जरुर पहुंचेगा। लेकिन पिछले लंबे अरसा से जो उपरी क्रम के तीन बल्लेबाज टीम की रीढ रहे हैं, उनके केवल तीन रन के योगदान के बाद चलता होने से सारी की सारी उम्मीदें धरी की धरी रह गयीं। टीम का मध्यक्रम शुरु से ही कमजोर कड़ी रहा था और जब उसपर भारी दबाव आया तो वह अनुकूल प्रदर्शन नही ंकर पाया। यह तो भला हो महेंद्र सिंह धोनी और रवींद्र जाडेजा का जिनके दमपर भारत ने आखिरी तक मैच को बेहद रोमांचक बना दिया और जीत के करीब पहुंचकर चूक गया।
    अब इस मैच को लेकर कई तरह की बातें होंगी। हर समीक्षक अपने अपने अंदाज में इसका आकलन कर रहा है। टीम के संयोजन पर भी बात उठेगी। बल्लेबाजी क्रम परभी सवाल उठाया जा रहा है कि धोनी को सात नंबर पर भेजने का फैसला सही नही ंथा। जो कल तक धोनी की बल्लेबाजी पर सवाल उठा रहे थे, अब उनका कहना है कि ऐसी परिस्थिति के लिये धोनी ही सबसे उपयुक्त थे। वे दूसरे युवा बल्लेबाजों को लेकर टीम को जीत तक पहुंचा सकते थे जैसा कि रवींद्र जाडेजा के साथ किया। यदि रिषभ पंत की जगह धोनी चार नंबर पर आते तो वे रिषभ के कभी उस तरह का गैर जिम्मेदाराना शाट नहीं खेलने देते , जैसा कर रिषभ ने अपना विकेट गंवाया। कई ऐसे लोग हैं जो धोनी की बल्लेबाजी साफ्ट टारगेट बनाने का कोई मौका नहीं चूकते। मगर खुद कप्तान कोहली का कहना ै कि धोनी परिस्थितियों के अनुरुप बल्लेबाजी करते हैँ। उनको पता होता है कि मैच को डीप ले जाना है। आखिरी ओवर तक वे संघर्ष करते रहते हैँ। यदि धोनी का विकेट भारत जल्द गंवा देता तो फिर वह बुरी तरह हार जाता औरशायद रविंद्र जाडेजा की ऐसी बल्लेबाजी देखने को नहीं मिलती। इस एक हार ने जरुर कई सवाल उठा दिये हैं लेकिन भारतीय टीम को निराश नहीं होना चाहिये क्योंकि टीम में कई ऐसे खिलाड़ी हैं जो अकेले अपने दम पर मैच का पासा पलटने का माद्दा रखते हैं। यदि शिखर धवन को चोट नही ंलगी होती और वे प्रतियोगिता से बाहर नही ंहुए होते तो कहानी कुछ और हो सकती थी। कई सवाल उठेंगे, कई बातें होंगी, लेकिन इस हार की कसक सालों साल तक पूरे भारतीय क्रिकेट प्रेमियों को टीस देती रहेगी। कुछ ऐसा ही 1987 के विश्व कप के सेमीफाइनल में हुआ था। उस वक्त भी भारतीय टीम काफी मजबूत मानी जा रही थी लेकिन इंगलैंड ने सेमीफाइनल में भारत को हरा दिया था। अब न्यूजीलैंड ने भारत को यह दर्द दिया है। यह दर्द लंबे समय तक टीसता रहेगा। भारत फिर चैंपियन हो सकता है लेकिन उस टीम में धोनी नहीं होंगे।

    लेखक हिन्दी दैनिक चमकता आईना के संपादक हैं

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