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    Home » सुन्नी वक्फ बोर्ड ने राजीव धवन को अयोध्या केस से हटाया
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    सुन्नी वक्फ बोर्ड ने राजीव धवन को अयोध्या केस से हटाया

    Devanand SinghBy Devanand SinghDecember 3, 2019No Comments3 Mins Read
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    नई दिल्ली:अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद में सुन्नी वक्फ बोर्ड समेत मुस्लिम पक्ष की ओर से जिरह करने वाले सीनियर वकील राजीव धवन को केस से हटा दिया गया है. राजीव धवन ने खुद फेसबुक पर पोस्ट लिखकर इसकी जानकारी दी है.सीनियर वकील राजीव धवन ने फेसबुक पर लिखा- बाबरी केस के वकील (एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड) एजाज मकबूल ने मुझे बर्खास्त कर दिया है, ये जमीयत का मुकदमा देख रहे हैं. जमीयत को ये हक है कि वो मुझे केस से हटा सकते हैं, लेकिन मुझे बिना आपत्ति के हटाया गया. अब मैं डाली गई पुनर्विचार याचिका में शामिल नहीं हूं. धवन ने आगे लिखा, कहा जा रहा है कि मुझे केस से इसलिए हटा दिया गया है, क्योंकि मेरी तबीयत ठीक नहीं है. ये बिल्कुल बकवास है.सोमवार को अयोध्या रामजन्मभूमि विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट में पहली पुनर्विचार याचिका दाखिल हुई. इस पुनर्विचार याचिका को मौलाना सैय्यद अशद राशिदी ने दाखिल किया है. राशिदी अयोध्या भूमि विवाद के पक्षकार एम सिद्दीक के कानूनी वारिस है. इस याचिका में उन्होंने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के 9 नवंबर के फैसले में भारी खामियां हैं. इसलिए इसमें पुनर्विचार की जरूरत है.वकील एजाज मकबूल की 217 पेज की याचिका में 217वें पेज पर कहा गया है, माननीय न्यायालय ने राहत देने में गलती की है जो कि बाबरी मस्जिद को ध्वस्त करने आदेश जैसा है. माननीय कोर्ट ने हिंदू पक्ष को जमीन देकर 1934, 1949 और 1992 के दौरान हुए अपराधों को पुरस्कार देने की गलती की है. वह भी ऐसे में जब वह (कोर्ट) स्वयं कह चुका है कि यह कार्य गैरकानूनी थे.बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर को अयोध्या मामले पर अपना फैसला सुनाया था. चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रंजन गोगोई की अध्‍यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने विवादित जमीन पर रामलला विराजमान के हक में फैसला दिया है. सरकार को यह भी आदेश दिया कि वह मस्जिद के लिए सुन्‍नी वक्‍फ बोर्ड को अयोध्‍या में कहीं भी पांच एकड़ जमीन मुहैया कराए. कोर्ट ने केंद्र सरकार को राम मंदिर के लिए 3 महीने में एक्शन रिपोर्ट बनाकर निर्माण कार्य शुरू करने का आदेश दिया है.हालांकि, इससे पहले सुन्नी वक्फ बोर्ड ने कहा था कि यह कोर्ट के फैसले पर कोई पुनर्विचार याचिका दाखिल नहीं करेगा. जमीयत उलेमा-ए-हिंद और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड कह चुके हैं कि वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले से संतुष्ट नहीं हैं. दोनों ही संगठनों अलग-अलग वादी के तौर पर इस मामले में पक्षकार थे.

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