देश को अपने ज़रूरत के अनुसार जिरकोनिम, जरमेनिम, टंगस्टन, टाईटेनिम. मोलिब्डेनम जैसे कई धातु का उत्पादन करना है :प्रोफ़ेसर राजीव शेखर
धातु उत्पादन के क्षेत्र में कई चुनौतियाँ है.अयस्कों का सांद्रण, प्रसंस्करण एवं धातु उत्पादन के आधुनिक तकनीकी शोध। कई उच्च कोटि के अयस्क की उपलब्धता कम होती जा रही है। लौह अयस्क पहले हम 63-65 प्रतिशत ग्रेड का उपयोग करते थे अब हमें 45 प्रतिशत के ग्रेड को उपयोग करने के लिए उचित तकनीक चाहिए। ताम्बा अयस्क में आधा प्रतिशत ग्रेड का उपयोग ताम्बा उत्पादन कर लिए कर रहे हैं परंतु अब हमें इससे भी कम ग्रेड के अयस्क का सांद्रण कर उपयोग लायक़ बनाना होगा। हमारे देश को अपने ज़रूरत के अनुसार जिरकोनिम, जरमेनिम, टंगस्टन, टाईटेनिम. मोलिब्डेनम जैसे कई धातु का उत्पादन करना है। हम इस क्षेत्र में बहुत पीछे हैं। उक्त बातें धातु उत्पादन के क्षेत्र में चुनौतियों की चर्चा करते हुए आईआईटी-आई-आईएसएम के निदेशक प्रोफ़ेसर राजीव शेखर ने मेटालर्जिकल एंड मैटेरियल्स इंजीनियरिंग विभाग, एनआईटी जमशेदपुर के द्वारा आयोजित आभाषी द्वितीय तीन दिवसीय आभासी राष्ट्रीय सम्मेलन में कही। उन्होंने आगे कहा की हम इन चुनौतियों पर विजय पाने के लिए काम कर रहे है। कोरोना के कारण अस्वस्थ होने के बाद भी उन्होंने अपने जिवटता का परिचय देते हुए संगोष्ठी में भाग लेने वालों को अपना मार्गदर्शन दिया।
विशेष अतिथि, आईआईटी बॉम्बे के प्रोफ़ेसर जी एन जाधव ने भी अयस्कों की पहचान और सांद्रण पर बल दिया। उन्होंने खनन एवं धातु उत्पादन के समय उत्पन होने वाले अनुपयोगी पदार्थों के उपयोग की विधि खोजने पर बल दिया।
इन-स्मार्ट के मुख्य प्रबंधक आर के बिसेन ने विशेष अतिथि के रूप में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा क़ि छात्रों में हुनर होना ज़रूरी है। पढ़ते समय उनको उद्योग के साथ काम करने का अधिक अवसर मिलना चाहिए जिससे वे पढ़ कर निकलेंगे तो उद्योग का अनुभव पहले से होगा। उन्होंने सलाह दिया कि अंतिम वर्ष के छात्रों को छः महीना के लिए इंटर्नशीप करने का अवसर मिलना चाहिए।
भारत मे पाये जाने वाले कोयले में अशुद्धि उसके संरचना में बहुत ही सूक्ष्म रूप से जुड़ी होती है। जिसके कारण इन अशुद्धियों को दूर करना कठिन होता है। इन अशुद्धियों का दुष्प्रभाव मुख्य रूप से लोहे के उत्पादन में देखा जाता है. इसमें स्लेग की मात्रा बहुत बढ़ जाती है। और दुसरे भी दुष्प्रभाव देखने को मिलता हैं। इन्ही कारणों से हमें विदेशों से कोयले का आयात करना पड़ता है। इन अशुधियो को दूर करने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।कोयले के सफ़ाई का कई तरीक़ा उपलब्ध है। उसमें से तेल एग्लोमरेशन तकनीक से अशुद्धियों को दूर कर कोयले को साफ़ करने की विधि का वैज्ञानिक डॉ संचिता चक्रवर्ती ने काफी प्रभावी तरीके से N.I.T Jamshedpur के वर्चुअल कांफ्रेंस में पेश किया। उन्होंने आगे बताया कि इसके कारण यातायात ख़र्च काम होगा, वातावरण में प्रदूषण काम होगा, ऊर्जा की भी वचटत होगी। सबसे बढ़ कर कोयले का आयात काम होगा और हम आत्मनिर्भर भारत की ओर एक क़दम और आगे बढ़ेंगे।

एनआईटी जमशेदपुर के निदेशक प्रोफ़ेसर के के शुक्ला ने कहा कि हमें काम माँगने वाला नहीं काम देने वाला बनाना है। उन्होंने आभासी राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन करने के लिए डॉ रणजीत प्रसाद एवं डॉ रीना साहू का उत्साह बढ़ाया।
डॉ रणजीत प्रसाद ने इस संगोष्ठी की उपयोगिता पर प्रकाश डाला।
विभागाध्यक्ष डॉ अशोक कुमार ने बताया कि इस संगोष्ठी में देश विदेश से 145 शोध पत्र प्रस्तुत किए गए. मुख्य रूप से आईआईएससी बैंगलोर के प्रोफ़ेसर सत्यम सुहास, जैन विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर एवं पूर्व में एनएमएल के वैज्ञानिक डॉ एस रंगनाथन , आईआईटी बॉम्बे के मेटलर्जी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर के नरशिमन ने अपने विचार व्यक्त किए। उद्घाटन समारोह में आईआईटी हैदराबाद के निदेशक बी के मूर्ती के विचार सुनने को मिला, जो ऑनलाइन व्यवस्था के कारण ही संभव हो सका।
NIT जमशेदपुर के दो पुरवर्ती छात्र स्वर्गीय शीरज़ ज़मा खान और स्वर्गीय कौशिक स्वामीनाथन, जिसका निधन बहुत ही काम उम्र में कार्य स्थल पर ही हो गया, की याद में “कार्यक्षेत्र सुरक्षा” पर एक प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता का अंतिम दौर भी आज सैम्पैन हुआ जिसमें 120 प्रतिभागियों ने भाग लिया।
पुरस्कार की घोषणा की गयी –
शोध पत्र प्रस्तुति में प्रथम – ए मधुबल, पी एस जी कॉलेज कोयम्बटोर, द्वितीय – सपन कुमार नायक, आईआईटी खड़कपूर, त्तृतीय – कृष्ण कुमार, सीएसआईआर- एनएमएल जमशेदपुर को मिला.

