राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह दिनकर
जयंती पर विशेष
ब्रह्मा से कुछ लिखा भाग्य में मनुष्य नहीं लाया है।।
अपना सुख उसनेअपने भुजबल से
ही पाया है।।
हिंदी जगत जगत के अप्रतिम आलोक पुरुष दिनकर जी सिर्फ आग और राग के ही कवि नहीं बल्कि युग धर्म के भी कवि थे। इन्होंने अपने समय में देश- विदेश की समस्त प्रवृत्तियों को समझा ,अध्ययन और चिंतन किया, पहले स्वयं संपूर्ण वैश्विक परिदृश्य और मनुष्यता के विभिन्न लक्षणों को समझने का प्रयास किया और फिर अपने उद्वेलनों को अपने साहित्य में पूरा का पूरा ऐसे उतारा कि वह जनमानस के दिलों दिमाग पर गहराई से उतरते चले गए ।
34 काव्य पुस्तक और 27 ग्रंथों के रचयिता दिनकरजी का जन्म 23 सितंबर 1908 को बेगूसराय के सिमरिया ग्राम में हुआ। आर्थिक कठिनाइयों में यह आरंभ से ही रहे।अध्ययन के साथ-साथ घर की आमदनी के लिए भी कार्य किया करते थे। 1928 से उन्होंने बारदोली आंदोलन के विजय संदेश से इन्होंने अपने लेखन प्रारंभ किया था और साहित्य की यह रचना 24 अप्रैल 1974 तक निरंतर चलती रही। जब कवि ने अपनी जीवन यात्रा भी समेट ली थी।
1959 में साहित्य अकादमी पुरस्कार ,इसी वर्ष में पद्म विभूषण एवं 1972 में ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ। 1952 में इन्हें भारत के सर्वोच्च सदन राज्यसभा में स्थान देकर भारत के समस्त काव्य पुरुषों का सम्मान किया गया। दिनकर जी के प्रबंध काव्य कुरुक्षेत्र को संसार के 100 सर्वाधिक काव्यों में स्थान दिया जाता है। संस्कृति के चार अध्याय भारत की विशालता पर वैश्विक दृष्टि रखने वाला वृहद गद्य ग्रंथ है ।
संक्षिप्ततः यह कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं कि दिनकर जी स्वतंत्रता पूर्व एक विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतंत्रता के बाद राष्ट्र कवि के रूप में जाने गए। एक ओर इनकी कविताओं में ओज, विद्रोह ,आक्रोश और क्रांति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल, श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है ।जिसका उत्कृष्ट उदाहरण कुरुक्षेत्र और उर्वशी जैसी रचनाएं हैं। साहित्य जगत के यह दैदीप्यमान सितारे हैं जिन्होंने अपनी कालजयी रचनाओं के कारण अमरत्व को प्राप्त किया है।
ऊंच-नीच का भेद न माने , वही श्रेष्ठ ज्ञानी है दया धर्म जिसमें हो, सबसे वही पूज्य प्राणी है।।
डॉ अनिता शर्मा

