- विरोध की भी एक मर्यादा होती है — राजनीति में नहीं, संस्कृति में बेटी का सम्मान सर्वोपरि है
राष्ट्र संवाद संवाददाता
पूरे देश में प्रचलित है “बेटी का सम्मान देखना है तो मिथिला में देखो।”
सीता जी की पावन भूमि मिथिला में बेटी को देवी का रूप माना गया है। यहाँ दामाद की आवभगत जगप्रसिद्ध है, और बेटियों को संस्कारों की शिरोमणि समझा जाता है।
परंतु पिछले कुछ दिनों से मिथिला की इस गरिमा पर प्रश्न उठे हैं।सिर्फ इसलिए कि 20–25 वर्ष की कलाकार मैथिली ठाकुर को भारतीय जनता पार्टी ने प्रत्याशी बनाया, सोशल मीडिया पर उनके प्रति अपशब्दों और दुर्भावनापूर्ण टिप्पणियों की झड़ी लग गई।
कला और राजनीति के बीच एक असभ्य रेखा
मैथिली ठाकुर वह गायिका, जिसकी आवाज़ में भक्ति, लोक और संस्कृति का समन्वय है आज कुछ लोगों की राजनीतिक नाराज़गी का शिकार बन गई हैं।
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन विरोध का अर्थ अपमान नहीं हो सकता।
कला की साधक पर निजी टिप्पणियाँ करना न केवल अशोभनीय है, बल्कि समाज की सांस्कृतिक चेतना को भी आहत करता है।
राजनीति अपनी जगह, संस्कृति अपनी मर्यादा
भाजपा का यह निर्णय राजनीतिक है; कोई इसे समर्थन दे, कोई असहमति रखे — यह सब स्वाभाविक है।
परंतु मर्यादा वही होती है जब हम असहमति में भी सम्मान बनाए रखें।
मैथिली ठाकुर किसी दल से अधिक, मिथिला की बेटी हैं — जिन्होंने माँ सरस्वती की साधना को युगों तक पहुँचाया है।
मिथिला की महानता शब्दों की मर्यादा में है
मिथिला केवल भौगोलिक क्षेत्र नहीं, यह संस्कृति का संस्कार है।
यह वही भूमि है जहाँ सीता का त्याग और विद्वता दोनों पूजे जाते हैं।
यदि हम एक बेटी के प्रति असंयमित भाषा का प्रयोग करते हैं, तो हम मिथिला की आत्मा से ही दूर हो जाते हैं।
मिथिला महान था, है और रहेगा
लेकिन उसकी महानता तभी बचेगी जब हम अपनी बेटियों के सम्मान की रक्षा करेंगे।
विरोध करें, बहस करें, पर संस्कार और संस्कृति को राजनीति की भेंट न चढ़ाएँ।

