विकास के वादों के बीच क्यों हाशिए पर हैं बिहार की महिलाएं
देवानंद सिंह
बिहार की राजनीति में महिला सशक्तिकरण हमेशा एक चर्चित विषय रहा है। हर चुनाव में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों इसे अपनी प्राथमिकता बताते हैं। कहीं शिक्षा और सुरक्षा की बात होती है, तो कहीं आत्मनिर्भरता और सम्मान की, लेकिन हकीकत यह है कि बिहार की महिलाएं आज भी असुरक्षा, बीमारी और कर्ज़ के बोझ तले कराह रही हैं। हाल ही में कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने राज्य की बीजेपी-जेडीयू सरकार पर तीखे सवाल उठाते हुए इस विरोधाभास को उजागर किया। उनका कहना है कि बीते दो दशकों में सरकारों ने महिला सशक्तिकरण का नारा तो खूब बुलंद किया, पर ज़मीन पर महिलाओं की स्थिति लगातार बिगड़ती गई है।
जयराम रमेश ने सबसे पहले राज्य की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाया। उनके मुताबिक, पिछले 20 वर्षों में बिहार में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में 336 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। पहले जहां हर साल करीब 6,000 मामले दर्ज होते थे, अब यह संख्या 20,000 के पार पहुंच चुकी है। यानी बीते दो दशकों में 2.8 लाख से अधिक महिलाएं हिंसा या अपराध की शिकार बनी हैं। सबसे भयावह स्थिति न्याय प्रणाली की है। 98.2 प्रतिशत मामलों का निपटारा अब तक नहीं हुआ है, यानी हर सौ मामलों में केवल दो को ही न्याय मिला, जबकि बाकी 98 अब भी अदालतों में लंबित हैं। यह आंकड़ा न केवल बिहार, बल्कि पूरे देश में सबसे खराब है। सवाल यह है कि जब सुशासन का दावा इतने वर्षों से किया जा रहा है, तो न्याय व्यवस्था इतनी निष्क्रिय क्यों है?
महिलाओं के अपहरण के मामलों में तो स्थिति और भी चिंताजनक है। पहले जहां औसतन 929 मामले दर्ज होते थे, अब यह संख्या बढ़कर 10,190 तक पहुंच गई है—यानि 1,097 प्रतिशत की वृद्धि। यह इस बात का प्रमाण है कि बिहार में महिलाएं सार्वजनिक स्थानों पर तो क्या, अपने घर के आस-पास भी सुरक्षित नहीं हैं। यह भी ध्यान देने योग्य है कि बिहार में महिला शिक्षा और रोजगार की स्थिति अब भी कमजोर है। आर्थिक रूप से निर्भर न हो पाने के कारण महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति सजग नहीं हो पातीं और अपराधों से बचाव का उनका तंत्र भी कमजोर रहता है। ऐसे में, जयराम रमेश का यह सवाल वाजिब है कि जब अपराध लगातार बढ़ रहे हैं, तो सरकार की प्राथमिकता आखिर क्या रही है? क्या सुरक्षा तंत्र को राजनीतिक स्वार्थों ने निगल लिया है?
दूसरा सवाल महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ा है, और यह शायद सबसे गंभीर संकेत है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, बिहार में एनीमिया यानी खून की कमी की दर लगातार बढ़ रही है। गैर-गर्भवती महिलाओं (15–49 वर्ष) में एनीमिया के मामले 60.4% से बढ़कर 63.6% हो गए हैं। सभी महिलाओं में यह दर 60.3% से बढ़कर 63.5% हो गई। किशोरियों (15–19 वर्ष) में एनीमिया 61% से बढ़कर 65.7% पहुंच गया है।
इन आंकड़ों का अर्थ यह है कि राज्य में न केवल महिलाएं शारीरिक रूप से कमजोर हो रही हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का स्वास्थ्य भी गंभीर खतरे में है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि जहां पोषण योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं होता, जहां आंगनवाड़ी प्रणाली कमजोर है, और जहां महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पिछड़ी हुई है, वहां एनीमिया जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ती हैं। बिहार इन तीनों ही मोर्चों पर पिछड़ा हुआ है।
सरकार ने मुख्यमंत्री पोषण योजना और प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना जैसी कई योजनाएं शुरू कीं, लेकिन उनका क्रियान्वयन बेहद कमजोर रहा। जयराम रमेश का आरोप है कि सरकार ने इन योजनाओं को घोषणाओं तक सीमित रख दिया, और जब जवाबदेही ही नहीं होगी, तो सुधार की गुंजाइश भी खत्म हो जाएगी।
तीसरा सवाल महिलाओं के आर्थिक जीवन से जुड़ा था, जो एक अलग तरह के संकट की ओर इशारा करता है। जयराम रमेश ने दावा किया कि बिहार में 1 करोड़ 9 लाख महिलाएं माइक्रोफाइनेंस कर्ज़ के जाल में फंसी हुई हैं। औसतन हर महिला पर ₹30,000 का बकाया कर्ज़ है। माइक्रोफाइनेंस योजनाओं का मूल उद्देश्य था, गरीब महिलाओं को छोटे व्यवसाय, हस्तशिल्प, पशुपालन या सेवाओं के लिए सस्ते ऋण देकर आत्मनिर्भर बनाना। लेकिन व्यवहार में यह योजना कई जगह शोषण का माध्यम बन चुकी है। वसूली एजेंटों की धमकियां, सामाजिक अपमान और मानसिक उत्पीड़न के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। कई महिलाओं ने आत्महत्या तक का रास्ता चुन लिया।
सवाल यह है कि इन तथाकथित माइक्रोफाइनेंस माफियाओं को संरक्षण कौन दे रहा है? क्या सरकार के पास इन निजी वित्तीय संस्थानों पर कोई नियंत्रण है? या यह पूरा क्षेत्र अब राजनीतिक फंडिंग और स्थानीय दबाव समूहों के प्रभाव में आ गया है? विभिन्न सामाजिक संगठनों की रिपोर्टें बताती हैं कि कई महिलाएं एक से अधिक संस्थानों से कर्ज़ ले लेती हैं, जिससे उन पर ऋण का बोझ बढ़ता चला जाता है। जब वसूली का दबाव असहनीय हो जाता है, तो परिवार और सामाजिक जीवन बिखर जाता है। यह आत्मनिर्भरता नहीं, बल्कि कर्ज़ आधारित निर्भरता की नई व्यवस्था है।
जयराम रमेश के ये सवाल केवल राजनीतिक बयान नहीं हैं, बल्कि उस राजनीतिक पाखंड को उजागर करते हैं, जो बिहार की शासन संस्कृति में गहराई तक समाया है। हर चुनाव से पहले महिला सशक्तिकरण के नारे गूंजते हैं। जल, जीवन, हरियाली, सात निश्चय, कन्या उत्थान योजना, लेकिन जब बात उनके असर की आती है, तो परिणाम नदारद रहते हैं। सरकारें आंकड़ों की बाज़ीगरी में निपुण हैं, परंतु जमीनी वास्तविकता बिल्कुल अलग है। महिलाओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक स्वतंत्रता जैसे मुद्दे केवल नीति-निर्माण तक सीमित रह गए हैं। सच्चाई यह है कि बिहार का विकास आज भी पुरुष-प्रधान सोच से तय होता है, जिसमें महिलाओं की आवाज़ अक्सर खो जाती है।
बिहार की सामाजिक बनावट जटिल है। गरीबी, बेरोज़गारी, पलायन और जातीय असमानता जैसी चुनौतियां पहले से ही मौजूद हैं। ऐसे में, महिलाओं का सशक्तिकरण केवल योजनाओं की संख्या से नहीं, बल्कि उनके असर से मापा जाना चाहिए। इसके लिए कुछ ठोस कदम आवश्यक हैं। महिला थानों की संख्या बढ़ाई जाए, फास्ट-ट्रैक अदालतों को सक्रिय किया जाए और पुलिस बल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जाए। एनीमिया, मातृ मृत्यु दर और किशोरियों के पोषण पर केंद्रित योजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। राज्य स्तर पर निगरानी निकाय बनाया जाए जो ब्याज दरों, वसूली तरीकों और ऋण वितरण की प्रक्रिया पर नियंत्रण रखे।
कर्ज़ और हिंसा से जूझ रही महिलाओं को परामर्श, सहायता और सामाजिक सुरक्षा सेवाओं से जोड़ा जाए।
कुल मिलाकर, जयराम रमेश के सवाल बिहार सरकार के लिए एक चेतावनी हैं। यह सिर्फ़ चुनावी बयान नहीं, बल्कि उस गहरे सामाजिक असंतुलन की ओर संकेत है, जिसे राज्य की महिलाएं वर्षों से झेल रही हैं। अगर, सरकार सच में विकास का दावा करती है, तो उसे यह दिखाना होगा कि उस विकास का लाभ महिलाओं तक बराबरी से पहुंच रहा है। अपराध, बीमारी और कर्ज़ की जकड़ में फंसी महिलाएं किसी भी समाज की ताकत नहीं, बल्कि उसकी नीति विफलता का प्रमाण हैं। बिहार को अब महिलाओं को वोट बैंक नहीं, बल्कि समान भागीदार के रूप में देखने की जरूरत है। तभी यह कहा जा सकेगा कि राज्य सच में सशक्त हो रहा है, वरना विकास के आंकड़ों की चमक में उनकी पीड़ा हमेशा ओझल रह जाएगी।

