राष्ट्र संवाद संवाददाता
इंदिरा यादव
उत्तर प्रदेश की राजनीति और पुलिसिंग ने अभिव्यक्ति को दबाने का एक क्रांतिकारी ‘म्यूजिकल तरीका’ खोज निकाला है।
वाराणसी कोर्ट में जब पूर्व IPS अमिताभ ठाकुर ने अपनी बात रखनी चाही, तो पुलिसकर्मियों ने सामूहिक रूप से सीटियां बजाकर उनका गला दबाने की कोशिश की। शायद वर्दीवालों को लगा होगा कि सत्य की आवाज अगर कानों तक पहुँच गई, तो सिस्टम को ‘बहरा’ होने का बहाना नहीं मिलेगा।
लेकिन कहानी यहाँ खत्म नहीं होती! विधायक अतुल प्रधान ने सदन के भीतर वही ‘सीटी कांड’ दोहराकर सत्ता को आईना दिखा दिया। यह एक कड़वा कटाक्ष है उस व्यवस्था पर, जहाँ अब दलीलों, तर्कों और सवालों की जगह केवल शोर ने ले ली है।
सोचने वाली बात यह है।
क्या अब हमारी पुलिस को ‘कानून’ की नहीं, ‘सीटी’ बजाने की ट्रेनिंग दी जा रही है।
क्या लोकतंत्र के मंदिर (विधानसभा) में अब गूँजने वाली आवाजों को इसी तरह ‘सीटी’ के शोर में दफन किया जाएगा?
जब रक्षक ही आवाज दबाने के लिए तमाशा करने लगें, तो समझिए कि व्यवस्था ‘सुर’ खो चुकी है और केवल ‘शोर’ बचा है।
सावधान रहिये! कहीं अगली बार जब आप अपना हक मांगने जाएं, तो जवाब में आपको कोई ठोस आश्वासन नहीं, बल्कि पुलिस की एक तीखी ‘सीटी’ सुनाई दे। क्योंकि साहब, अब सच बोलना मना है, बस सीटी बजाइए और मस्त रहिये

