पश्चिम एशिया संकट (ईरान-इजरायल विवाद) के बीच भारत की संतुलित कूटनीति और रणनीतिक स्वायत्तता पर देवानंद सिंह का विशेष संपादकीय लेख पढ़ें।
देवानंद सिंह
पश्चिम एशिया में जारी तनाव और संघर्ष ने एक बार फिर वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और कूटनीति को झकझोर दिया है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव ने न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित किया है, बल्कि इसके असर पूरी दुनिया में महसूस किए जा रहे हैं। तेल की कीमतों में उछाल, आपूर्ति संकट और वैश्विक बाजार की अनिश्चितता ने अनेक देशों के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। भारत भी इस संकट से पूरी तरह अछूता नहीं है, लेकिन इन जटिल परिस्थितियों के बीच भारत की विदेश नीति ने संतुलन और परिपक्वता का जो उदाहरण प्रस्तुत किया है, वह उल्लेखनीय है।
भारत ने इस संकट के दौरान किसी एक पक्ष के साथ खड़े होने के बजाय एक संतुलित और व्यावहारिक कूटनीतिक रास्ता अपनाया है। विदेश मंत्री के नेतृत्व में भारत ने अमेरिका, रूस, चीन, इजरायल और ईरान—इन पाँचों महत्वपूर्ण शक्तियों के साथ संवाद और सहयोग बनाए रखने की कोशिश की है। यही कारण है कि इस कठिन दौर में भी भारत की भूमिका को विश्व स्तर पर एक जिम्मेदार और संतुलित शक्ति के रूप में देखा जा रहा है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के कारण वैश्विक तेल बाजार में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चली गई हैं, जिससे कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है। भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए यह एक गंभीर चुनौती है। फिर भी भारत ने ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन दोनों को ध्यान में रखते हुए अपने कदम बढ़ाए हैं।
अमेरिका के साथ संबंधों को मजबूत बनाए रखने की दिशा में भारत ने कई महत्वपूर्ण पहल की हैं। दोनों देशों के बीच ऊर्जा और निवेश सहयोग को बढ़ावा देने के प्रयास जारी हैं। हाल के समय में अमेरिका में एक नई रिफाइनरी स्थापित करने की योजना में भारत की प्रमुख भूमिका बताई जा रही है, जिसमें भारतीय उद्योग जगत की बड़ी कंपनियाँ निवेश कर रही हैं। इससे न केवल ऊर्जा सहयोग मजबूत होगा, बल्कि भारत-अमेरिका संबंधों को भी नई दिशा मिलेगी।
इसी तरह भारत ने चीन के साथ भी अपने संबंधों को धीरे-धीरे सामान्य बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। वर्ष 2020 की Galwan Valley Clash के बाद दोनों देशों के रिश्तों में काफी तनाव आ गया था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कूटनीतिक प्रयासों के कारण संबंधों में कुछ सुधार दिखाई दिया है। व्यापारिक गतिविधियों का विस्तार, यात्राओं का पुनः आरंभ और निवेश संबंधी नीतिगत ढील जैसे कदम इस दिशा में महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
भारत और रूस के संबंध ऐतिहासिक रूप से मजबूत और भरोसेमंद रहे हैं। ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद जारी रखी है। हालांकि इस पर पश्चिमी देशों की आपत्तियाँ भी सामने आईं, लेकिन भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए संतुलित नीति अपनाई। आज वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच यही निर्णय भारत के लिए रणनीतिक रूप से लाभकारी साबित हो रहा है।
दूसरी ओर, इजरायल के साथ भारत के संबंध पिछले कुछ वर्षों में काफी मजबूत हुए हैं। रक्षा सहयोग, तकनीकी साझेदारी और कृषि क्षेत्र में संयुक्त परियोजनाओं ने दोनों देशों के रिश्तों को नई ऊँचाई दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इजरायल दौरा और उसके बाद हुई रक्षा तथा तकनीकी समझौतों ने इस सहयोग को और मजबूती दी है।
हालांकि, भारत ने इजरायल के साथ संबंध मजबूत करते हुए भी ईरान के साथ अपने संबंधों को कमजोर नहीं होने दिया। भारत के लिए ईरान रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण देश है, विशेषकर ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार मार्गों के संदर्भ में। हाल ही में दिल्ली में आयोजित Raisina Dialogue में ईरान की भागीदारी और दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संवाद इस बात का संकेत है कि भारत क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने की नीति पर कायम है।
साथ ही, हिंद महासागर क्षेत्र में फँसे ईरानी जहाजों को सहायता प्रदान करना और समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रयास भी भारत की जिम्मेदार भूमिका को दर्शाते हैं। पश्चिम एशिया के महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग Strait of Hormuz से होकर भारत के लिए बड़ी मात्रा में ऊर्जा और व्यापारिक आपूर्ति आती है। ऐसे में इस क्षेत्र की स्थिरता भारत के लिए अत्यंत आवश्यक है।
दरअसल, वैश्विक राजनीति के इस दौर में भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ है। भारत न तो किसी एक शक्ति-गुट का हिस्सा बनना चाहता है और न ही अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता करना चाहता है। यही कारण है कि वह एक ओर अमेरिका के साथ साझेदारी को मजबूत करता है, तो दूसरी ओर रूस के साथ पुराने भरोसे को बनाए रखता है; इजरायल के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाता है तो ईरान के साथ भी संवाद कायम रखता है।
पश्चिम एशिया का मौजूदा संकट यह स्पष्ट करता है कि आज की दुनिया में कूटनीति केवल पक्ष चुनने का खेल नहीं रह गई है, बल्कि संतुलन, संवाद और राष्ट्रीय हितों की रक्षा का संयोजन बन चुकी है। भारत ने इस जटिल परिस्थिति में जिस संयम और समझदारी का परिचय दिया है, वह उसकी बढ़ती वैश्विक भूमिका का संकेत भी है।
भविष्य में यह संतुलित कूटनीति भारत को न केवल आर्थिक और रणनीतिक लाभ दिला सकती है, बल्कि उसे विश्व राजनीति में एक भरोसेमंद और जिम्मेदार शक्ति के रूप में स्थापित करने में भी मदद करेगी।

