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    Home » हम प्राकृतिक घटकों के संरक्षक, मालिक नहीं : शेखावत
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    हम प्राकृतिक घटकों के संरक्षक, मालिक नहीं : शेखावत

    Bishan PapolaBy Bishan PapolaNovember 14, 2022No Comments5 Mins Read
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    केन्‍द्रीय जलशक्ति मंत्री बोले- जल के क्षेत्र हुए हैं बहुत अधिक सकारात्‍मक प्रयास

    मोदी सरकार की नीतियों से आज देश में प्रकृति और विज्ञान के प्रति समान जागरुकता का वातावरण

    बीकानेर । केन्‍द्रीय जलशक्ति मंत्री गजेन्‍द्र सिंह शेखावत ने कहा कि जितने भी प्रकृति के घटक हैं, हम उनके मालिक नहीं, बल्कि संरक्षक हैं। हम इस विचार को कैसे आगे बढ़ा सकते हैं? इस पर हमें विचार करना होगा, क्‍योंकि पीढ़ियों से ये स्रोत हमें हस्‍तांतरित होकर मिले हैं, जिस अवस्‍था में हमें मिले थे, हमने किस अवस्‍था में इन्‍हें आगे बढ़ाना है। उस दिशा में काम करना है।

    शनिवार को दीनदयाल शोध संस्थान के “सुमंगलम्” कार्यक्रम के तहत पंचमहाभूतों में जल की अन्य तत्वों से संबद्धता विषय पर गजनेर में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में बतौर मुख्‍य अतिथि शेखावत ने कहा कि जिस रूप में हमें प्राकृतिक स्रोत मिले हैं, अगर उसी रूप में हमने इन्‍हें आने वाली पीढ़ी को हस्‍तांतरित किया तो यह हमारी मनुष्‍यता है। अगर हमने उन्‍हें बेहतर करके आगे की पीढ़ी को हस्‍तांतरित किया तो यह हमारा देवत्‍व कहा जाएगा। अगर हम इसमें चूक गए और हमने विनाश करके आगे की पीढ़ी को इन्‍हें दिया तो हम निश्चित ही अमानत में खयानत के दोषी होंगे, हमें इसका जवाब देना होगा।

    उन्होंने कहा कि मोदी सरकार की नीतियों से आज देश में प्रकृति और विज्ञान के प्रति समान जागरुकता का वातावरण है और दीनदयाल शोध संस्थान इस वातावरण को देशज ज्ञान परंपरा से पुष्ट कर रहा है। यह अनुकरणीय है। सुमंगलम् में पानी के हर पक्ष को शामिल किया गया है। चाहे सिंचाई के मामला हो, सिंचाई के संसाधनों को कैसे उपयोगी बनाया जाए, हर व्‍यक्‍ति को शुद्ध पेयजल मिले, पेयजल स्रोतों का संरक्षण किस तरह से किया जा सकता है, नए जलस्रोत कैसे खड़े कर सकते हैं, इन सबकी कल्‍पना की गई है।

    *तत्‍कालीन शासकों ने जल के संरक्षण के लिए किए बेहतर प्रबंध*
    राजस्‍थान को जिक्र करते हुए केन्‍द्रीय मंत्री शेखावत ने कहा कि यहां के तत्‍कालीन शासकों ने जल के संचयन के लिए कई बेहतर प्रबंध किए। विशेषकर पश्चिम राजस्‍थान के गांवों में जाकर देखें तो जल, जंगल और जमीन के साथ हमारा संबंध कैसा हो? हमारे ऋषियों और मनीषियों की दी परंपरा को तत्‍कालीन शासकों ने अच्‍छी तरह समझा था। इसी के चलते हर एक गांव में एक तरह के प्रबंध, उपबंध किए गए, जिससे जल का संरक्षण किया जा सके। बीकानेर से जैसलमेर, बाड़मेर सहित पूरे पश्चिमी राजस्‍थान और सुदूर चूरू, थार के रेगिस्‍तान में शायद ही ऐसा कोई गांव होगा, जिस गांव में कोई तालाब या नाड़ी उस समय नहीं बनाई गई हो। पांच-सात-दस गांवों के बीच में इस तरह के तालाबों का सृजन किया और ये तालाब इंटरकनेक्‍ट थे, जिससे किसी भी परिस्थिति में किसी गांव में जल का संकट न हाने पाए। उन्‍होंने कहा कि पाश्‍चत्‍य संस्‍कृति के प्रभाव में वह सारी संस्‍कृति और परंपरा बहती चल गई। अधिकतम प्राप्‍त करने की लालसा में हमने पर्यावरण का नुकसान तो किया है, बल्कि उससे बड़ा पूर्व में बनाए गए प्रज्ञा और प्रभाव को तोड़ने का काम किया है, जो किसी भी रूप में उचित नहीं है।

    अमृत सरोवर योजना के मिले सुखद परिणाम
    केन्द्रीय मंत्री शेखावत ने कहा कि जब देश ने आजादी के 75 साल पूरे किए, तब प्रधानमंत्री ने आह्वान किया था कि देश के हर जिले में 75 अमृत सरोवर बनने चाहिए, आज देश के हर जिले में ऐसे सरोवर बनाने के लिए होड़ मची हुई है, जो बहुत ही सुखद देने वाली बात है। कई जिलों का टारगेट 75 ही नहीं है, बल्कि 200-250 तक सरोवर बनाने का लक्ष्‍य रखा है। यह नेतृत्‍व में विश्‍वास को सबसे बड़ा परिचायक है।

    प्रत्येक वर्ष जारी होगा भूजल डाटा
    केन्द्रीय मंत्री शेखावत ने कहा कि दो दिन पहले ही भारत सरकार ने भूजल का डाटा रिलीज किया है, जिसके आंकड़े काफी सुखद हैं। पहले तीन से पांच सालों के अंतराल में ऐसा डाटा रिलीज होता था, लेकिन हमने यह कोशिश की है कि अब हर साल इस तरह का डाटा रिलीज किया जाएगा। वर्ष 2021-22 की जो रिपोर्ट हमने प्रकाशित की है, उससे पता चलता है कि वर्ष 2017-20 तक भूजल के स्रोतों में जो सकारात्‍मक परिवर्तन देखने को मिला था, उससे भी अधिक सकारात्‍मक परिवर्तन वर्ष 2020-22 के दौरान देखने को मिला है।

    जल के क्षेत्र में भारत करेगा सबसे बड़ा निवेश
    शेखावत ने बताया कि भारत आगामी वर्ष 2024 तक जल के क्षेत्र में 220 बिलियन यूएस डॉलर का निवेश करेगा, जो दुनिया में सबसे अधिक है। उन्‍होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने वर्ष 2019 में जलशक्ति मंत्रालय को गठन करने के लिए साथ जिस तरह पानी पर फोकस किया है, वह उनकी दूरदृष्टि सोच का परिणाम है, क्‍योंकि आज हमारे सामने जल के क्षेत्र में बहुत सारे सकारात्‍मक परिणाम हैं।

    पश्चिम की सोच और भारतीय पद्धति में बहुत फर्क
    केन्‍द्रीय मंत्री ने कहा कि पश्चिम की सोच और भारतीय पद्धति में बहुत फर्क है। पश्चिम के लोग डार्विन के विचार से आगे बढ़ते हैं। डार्विन की थ्‍योरी को मानने वाले लोग मानते हैं कि हमारे पूर्वज बंदर थे, शायद हममें से ऐसा कोई नहीं मानता है, हम तो ये मानते हैं कि हम भगवान राम और भगवान कृष्‍ण की संतानें हैं। डार्विन की थ्‍योरी को मानने वाले लोग जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो उन्‍हें अपने की पीछे की पीढ़ी कमतर ही नजर आती है, जबकि भारतीय मनीषा और ज्ञान कहता है कि हम सतयुग ने प्रारंभ हुए, त्रेता में आए, द्वापर में आए और आज कलयुग में हैं। उनके पास गर्व करने के लिए कुछ नहीं है। उनके यहां जो कुछ नूतन है, उसे ही श्रेष्‍ठ माना गया, जबकि भारतीय दर्शन में मनीषियों द्वारा दिया गया ज्ञान यह कहता है कि हमें वापस उसी सतयुग की तरफ जाना है, इसलिए हमारे सामने एक स्‍पष्‍ट लक्ष्‍य भी है और पीछे घूमकर देखें तो हमारे लिए प्ररेणा लेने के लिए बहुत सारा ज्ञान है। भारत की इस दृष्टि को आज पूरा विश्‍व भी समझने लगा है कि भारत की दृष्टि ही विश्‍व को बचाए और बनाए रखने के लिए एकमात्र सहारा है।

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