संघ-बीजेपी के रिश्तों और काशी-मथुरा पर संघ प्रमुख भागवत के बयान के मायने
देवानंद सिंह
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने गुरुवार 28 अगस्त को राजधानी दिल्ली में आयोजित संघ की शताब्दी व्याख्यानमाला के समापन सत्र में जो कुछ कहा, उसने एक बार फिर से भारतीय राजनीति और संघ-बीजेपी के रिश्तों पर नई बहस छेड़ दी है। उनका यह कहना कि वे रिटायर होने वाले नहीं हैं, यह संदेश देता है कि संघ में नेतृत्व परिवर्तन की परंपरा राजनीति से अलग है। वहीं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उम्र और 75 साल की ‘मर्यादा’ को लेकर उठ रहे सवालों के बीच भागवत का यह बयान महज सफाई नहीं, बल्कि रणनीतिक संदेश भी माना जा सकता है। इसके साथ ही उन्होंने बीजेपी और संघ के रिश्तों पर भी टिप्पणी की, जिसमें एक तरफ तालमेल का आश्वासन था तो दूसरी तरफ हल्का-सा तंज़ भी छुपा था। और अंततः काशी-मथुरा के सवाल पर उन्होंने जो कुछ कहा, वह विवाद और सियासत दोनों के लिए उर्वर भूमि तैयार करता हुआ दिखा।

भागवत ने हाल ही में यह कहा था कि 75 साल की उम्र के बाद नेताओं को सक्रिय राजनीति या जिम्मेदारी वाले पदों से हट जाना चाहिए। स्वाभाविक है कि इस बयान को सीधे प्रधानमंत्री मोदी से जोड़कर देखा गया, जो सितंबर में 75 वर्ष के होने जा रहे हैं। बीजेपी में पिछले एक दशक से यह अनलिखा नियम रहा है कि 75 साल के बाद नेता सक्रिय राजनीति से किनारे कर दिए जाते हैं। लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ यही हुआ, लेकिन सवाल उठता है कि क्या वही कसौटी नरेंद्र मोदी पर भी लागू होगी?
भागवत ने इस बार सफाई दी कि यह बयान उन्होंने मोरोपंत पिंगले के मज़ाकिया अंदाज़ को उद्धृत करते हुए दिया था। उन्होंने साफ़ किया कि उनका ऐसा कोई इरादा नहीं है कि वे खुद रिटायर हों या किसी और को रिटायर होने को कहें, लेकिन राजनीति समझने वाले यह मानते हैं कि अगर भागवत खुद 75 वर्ष की उम्र में पद छोड़ देते तो एक नैतिक दबाव अपने आप प्रधानमंत्री पर बनता। यह दबाव इतना बड़ा होता कि बीजेपी की अंदरूनी व्यवस्था हिल जाती। जानकार कहते हैं कि नरेंद्र मोदी संघ और बीजेपी दोनों के लिए ब्रैंड वैल्यू हैं और राजनीति की भाषा में कोई भी संगठन अपने सबसे प्रभावी ब्रैंड को समय से पहले रिटायर नहीं करता, इसलिए मोदी अपवाद बने हुए हैं और भागवत का यू-टर्न इसी अपवाद को सुरक्षित रखने की रणनीति है।

इसीलिए ऐसा लगता हैं कि 75 साल वाली बात दरअसल एक जुमला थी, ठीक वैसे ही जैसे कभी अच्छे दिनों का वादा या पंद्रह लाख रुपये वाले नारे दिए गए थे। राजनीति में ऐसे जुमले सुविधानुसार इस्तेमाल होते हैं और सुविधानुसार छोड़ दिए जाते हैं। संघ प्रमुख का यह स्पष्टीकरण इसी श्रेणी में आता है। मोहन भागवत ने व्याख्यानमाला में यह भी कहा कि संघ और बीजेपी के बीच कोई झगड़ा नहीं है, मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं हैं। यह वाक्य सतही तौर पर बहुत सौम्य और संतुलित लगता है, लेकिन इसके भीतर कई परतें छिपी हैं।
2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को स्पष्ट बहुमत न मिलना और फिर जेपी नड्डा का यह बयान कि बीजेपी अब इतनी सक्षम हो गई है कि उसे संघ की ज़रूरत नहीं है, इन घटनाओं ने दोनों संगठनों के रिश्तों में खटास की ओर संकेत किया। भागवत ने विज्ञान भवन में कहा कि अगर, संघ बीजेपी के अध्यक्ष पद का फैसला करता, तो चुनाव में इतनी देरी क्यों होती? उनका यह कहना दरअसल एक तंज़ था कि बीजेपी ने संघ की राय को पूरी तरह नहीं माना और अब उसकी खिचड़ी पक रही है।

जानकारों के अनुसार, भागवत का यह बयान केवल एक चुटकुला नहीं था, बल्कि साफ संदेश था कि संघ अपने सुझाव देता है, लेकिन बीजेपी अब हमेशा उसे मानने को बाध्य नहीं मानती। हालांकि संघ इस असहमति को घर के अंदर का मामला कहकर टाल देता है, लेकिन इसका असर नेतृत्व चयन और नीतिगत फैसलों पर साफ़ झलकता है। बीजेपी के किसी भी शीर्ष पद पर संघ की पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति होना लगभग अनिवार्य है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में मुख्यमंत्री चयन इसका उदाहरण है। ऐसे में, अगर बीजेपी अध्यक्ष के चुनाव में महीनों की देरी हो रही है, तो यह संघ की सहमति के बिना संभव ही नहीं। संघ और बीजेपी का रिश्ता ऐसा है जहां संघ कह सकता है कि यह होगा या नहीं होगा, भले ही वह प्रत्यक्ष रूप से हर निर्णय न ले।
मोहन भागवत ने काशी और मथुरा के मसलों पर जो बयान दिया, उसने सबसे ज्यादा राजनीतिक और सांप्रदायिक बहस को जन्म दिया। उन्होंने कहा कि संघ आंदोलन में सीधे नहीं जाएगा, लेकिन यह भी साफ़ किया कि अयोध्या, काशी और मथुरा हिंदू मानस के केंद्र में हैं। अयोध्या का मुद्दा निपट चुका है, अब काशी और मथुरा की बारी है। उन्होंने यह खुला संकेत दिया कि संघ तो औपचारिक रूप से आंदोलन में शामिल नहीं होगा, लेकिन स्वयंसेवक अगर इस पर आगे बढ़ना चाहें तो उन्हें रोका नहीं जाएगा।
यह बयान दो स्तरों पर महत्वपूर्ण है। पहला, मुस्लिम समाज को अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेश देना कि इस विवाद में मत उलझें और दो स्थान हिंदू पक्ष को दे दें। दूसरा, बीजेपी और केंद्र सरकार पर दबाव बनाना कि ‘प्लेसेज़ ऑफ वर्शिप एक्ट 1991’ की समीक्षा की जाए और इन मुद्दों पर कानूनी या राजनीतिक रास्ता निकाला जाए।

विशेषज्ञ मानते हैं कि भागवत ने यह कहकर एक नया रास्ता खोला है कि आंदोलन का झंडा संघ के हाथ में न भी हो, लेकिन आंदोलन करने वाले लोग संघ से ही होंगे। यह अप्रत्यक्ष स्वीकृति है। इसका सीधा असर यह होगा कि हिंदुत्व की राजनीति को एक बार फिर से नया ईंधन मिलेगा, खासकर तब जब बीजेपी को चुनावी गणित में नए नैरेटिव की जरूरत होगी। जब भी बीजेपी को अपनी राजनीति को धार देने की जरूरत होती है, तब ऐसे धार्मिक मुद्दों को सामने लाया जाता है और इन्हें धार्मिक चाशनी में लपेटकर जनता के बीच पेश किया जाता है।
संघ खुद को हमेशा एक सांस्कृतिक संगठन कहता रहा है, लेकिन वास्तविकता यह है कि उसकी जड़ें और शाखाएं राजनीति से गहराई से जुड़ी हैं। बीजेपी का उदय संघ की वैचारिक और संगठनात्मक जमीन के बिना संभव नहीं था। सवाल यह है कि क्या संघ अपने स्वयंसेवकों को राजनीति से अलग रख सकता है? संघ बिना स्वयंसेवकों का कुछ भी नहीं है और स्वयंसेवक जब राजनीति में सक्रिय हैं तो संघ का राजनीतिक एजेंडा से अलग रहना संभव ही नहीं।
मोहन भागवत का यह कहना कि तीन मंदिरों के अलावा हर जगह मंदिर मत ढूंढो एक संतुलन साधने का प्रयास है, ताकि संघ की छवि कट्टर हिंदुत्व तक सीमित न रह जाए, लेकिन उनके उसी बयान के अगले हिस्से में यह कहना कि काशी और मथुरा पर हिंदू समाज का आग्रह बना रहेगा, यह दिखाता है कि संघ अपने स्वयंसेवकों की भावनाओं और दबाव से पूरी तरह बच नहीं सकता।
इस पूरे घटनाक्रम से यह साफ़ है कि आरएसएस और बीजेपी का रिश्ता केवल गुरु-शिष्य या मार्गदर्शक-संगठन का नहीं है, बल्कि अब यह सत्ता, रणनीति और विचारधारा के बीच जटिल संतुलन का खेल बन चुका है। भागवत ने एक तरफ यह भरोसा दिलाया कि संघ और बीजेपी के बीच मनभेद नहीं हैं, लेकिन दूसरी ओर संकेत भी दिया कि दोनों संगठनों के बीच बीरबल की खिचड़ी अभी पक रही है। काशी और मथुरा पर उनका बयान बताता है कि हिंदुत्व का एजेंडा फिलहाल खत्म नहीं हुआ है, बल्कि उसे भविष्य के लिए सुरक्षित रखा जा रहा है। संघ सीधे आंदोलन में शामिल न भी हो, तो स्वयंसेवकों के जरिए यह एजेंडा आगे बढ़ सकता है। और यही वह बिंदु है जहां सांस्कृतिक संगठन और राजनीतिक दल का फर्क धुंधला हो जाता है।

मोहन भागवत के इस बयान ने यह स्पष्ट कर दिया कि आरएसएस भले ही खुद को गैर-राजनीतिक कहे, लेकिन उसकी दिशा और दृष्टि भारतीय राजनीति को गहराई से प्रभावित करती है। सवाल यही है कि क्या संघ भविष्य में अपने लिए ‘सांस्कृतिक संगठन’ की पहचान बनाए रख पाएगा, या फिर बीजेपी की राजनीतिक ज़रूरतों ने उसे हमेशा की तरह राजनीतिक मोहरे में तब्दील कर दिया है।

