देवानंद सिंह
एयर इंडिया की भयावह दुर्घटना में गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री विजय रूपाणी का आकस्मिक निधन न केवल गुजरात बल्कि भारतीय राजनीति के लिए एक भावनात्मक क्षति है। वह एक ऐसे नेता थे, जिनकी राजनीतिक यात्रा में ठहराव कम और चुनौतियां अधिक थीं, पर उन्होंने हर मोड़ पर पार्टी के आदेश को सर्वोपरि रखा, भले ही वह उनकी व्यक्तिगत आकांक्षाओं के विरुद्ध क्यों न रहा हो।

रूपाणी का करियर एबीवीपी से शुरू होकर भाजपा की कोर रणनीतिक संरचना का हिस्सा बनने तक फैला। वे तेज़तर्रार वक्ता नहीं थे, न ही कद्दावर जननेता, परंतु संगठन के भीतर उनका स्थान एक विश्वसनीय कार्यकर्ता का था। एक ऐसा व्यक्ति, जिस पर जिम्मेदारियां भले ही देरी से आईं, पर जब आईं, तब उन्होंने उसे निष्ठापूर्वक निभाया।
राजकोट के मेयर से लेकर मुख्यमंत्री तक का सफर यह दिखाता है कि वे संगठन के प्रति कितने समर्पित थे। विशेष रूप से 2014 के बाद उनका राजनीतिक कद बढ़ा, लेकिन इसका पूर्ण दोहन उन्हें केवल सीमित समय के लिए ही मिल सका। 2016 में विजय रूपाणी का मुख्यमंत्री बनना एक सुविचारित राजनीतिक गणित का हिस्सा था। पाटीदार आंदोलन की पृष्ठभूमि में भाजपा को एक ऐसे चेहरे की आवश्यकता थी, जो संघ से जुड़ा हो, कट्टर न लगे, और संगठन में विश्वसनीय हो। रूपाणी उस समय एक कंट्रोल्ड चॉइस थे।

उनका कार्यकाल विकासोन्मुख योजनाओं से जुड़ा रहा, विशेष रूप से सौराष्ट्र के लिए, जो उनके निजी और राजनीतिक क्षेत्र दोनों का केंद्र रहा। राजकोट में एम्स, हीरासर एयरपोर्ट, नर्मदा पाइपलाइन और स्कूल फीस नियमन जैसी पहलों ने उन्हें विकासशील प्रशासक के रूप में स्थापित किया, परंतु उनका प्रशासनिक कार्यकाल पूरी तरह निर्विवाद नहीं था। कोविड-19 के दौरान व्यवस्थागत विफलता, धमन वेंटिलेटर विवाद और रेमडेसिविर इंजेक्शन घोटाले जैसे मामलों में उनकी जवाबदेही को लेकर सवाल उठे। जब जनता जानना चाहती थी कि दवाइयां कहां हैं, उनका जवाब मुझे नहीं पता रहा, एक ऐसा वाक्य था, जो न सिर्फ़ उनकी प्रशासनिक विफलता का प्रतीक बना, बल्कि सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ़ व्यंग्यात्मक ट्रेंड भी बन गया।

उनकी विदाई का तरीका बताता है कि भाजपा नेतृत्व किस तरह बिना सार्वजनिक कारण बताए, रातों-रात
बदलाव करता है। इस सामूहिक नेतृत्व की रणनीति में व्यक्तिगत महत्व गौण होता है, लेकिन जो नेता पार्टी के लिए वर्षों तक चुपचाप पसीना बहाता रहा हो, उसे इस तरह हटा देना न केवल असहज बल्कि असंवेदनशील भी प्रतीत हुआ। यही कारण है कि विश्लेषकों ने इसे अवांछित निष्कासन कहा। रूपाणी के व्यक्तित्व का भावनात्मक पक्ष उनके भाषणों में उभरता रहा, विशेष रूप से इस्तीफे के बाद के भाषण में जब उन्होंने कहा, सीएम का मतलब है आम आदमी और आपके बीच का कार्यकर्ता। यह बयान सत्ता के प्रति उनके दृष्टिकोण को दर्शाता है। वे पद के लिए नहीं, कार्यकर्ता धर्म के लिए राजनीति में थे।

उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, म्यांमार से भारत आना, राजकोट में व्यावसायिक संघर्ष और फिर राजनीतिक धैर्य, यह सभी पहलू उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में रेखांकित करते हैं, जो अति महत्वाकांक्षा से दूर रहा, लेकिन जब अवसर मिला, तो उसे पूरी ईमानदारी से निभाया। कुल मिलाकर, विजय रूपाणी का जीवन और मृत्यु दोनों राजनीतिक विमर्श के लिए कई प्रश्न छोड़ते हैं। क्या राजनीति में विश्वसनीयता का मूल्य अवसर की तुलना में कम हो गया है? क्या पार्टी के लिए त्याग देने वाला कार्यकर्ता कभी शीर्ष पर सम्मान से स्थान पा सकेगा?

उनकी अंतिम यात्रा एक दुर्घटना में समाप्त हुई, पर राजनीतिक यात्रा एक पूर्वनियोजित, अचानक और निर्धारित समापन की तरह लगती है। संभव है कि इतिहास उन्हें एक ‘मध्यमार्गी प्रशासक’ के रूप में याद रखे, जिसने कभी राजनीति को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया, बल्कि उसे एक दायित्व की तरह निभाया।

उनकी विरासत यह नहीं है कि उन्होंने कितने चुनाव जीते, बल्कि यह है कि उन्होंने बिना किसी प्रतिरोध के कितनी बार आदेश का पालन किया।

