नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने वाहन की नंबर प्लेट छिपाने से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि केवल नंबर प्लेट को ढकना अपने आप में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी का अपराध नहीं बनता। न्यायालय ने कहा कि यदि किसी मामले में बेईमानी की नीयत, किसी व्यक्ति को धोखे में रखकर संपत्ति प्राप्त करने या नुकसान पहुंचाने जैसे आवश्यक तत्व मौजूद नहीं हैं, तो केवल नंबर प्लेट छिपाने के आधार पर धोखाधड़ी का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। अदालत ने इस आधार पर आरोपी के खिलाफ दर्ज धोखाधड़ी का मामला रद्द कर दिया, जबकि मोटर व्हीकल एक्ट के तहत कार्रवाई को यथावत रखा।
यह फैसला न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने मोहम्मद अब्दुल अहद शाकर बनाम तेलंगाना राज्य एवं अन्य मामले में सुनाया। अदालत ने कहा कि पुलिस का यह अनुमान कि वाहन चालक ने ट्रैफिक चालान से बचने या भविष्य में पहचान छिपाने के उद्देश्य से पिछली नंबर प्लेट ढकी होगी, मात्र एक आशंका है। केवल इस आधार पर किसी व्यक्ति पर धोखाधड़ी का आपराधिक मामला कायम नहीं किया जा सकता।
मामले के अनुसार अपीलकर्ता अपनी काले रंग की होंडा एक्टिवा स्कूटी चला रहा था। आरोप था कि उसने स्कूटी की पिछली नंबर प्लेट को काले मास्क से ढक रखा था। पेट्रोलिंग ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी ने उसे रोककर कार्रवाई की और उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 420 तथा मोटर व्हीकल एक्ट, 1988 की संबंधित धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई। पुलिस का आरोप था कि चालक ने ट्रैफिक चालान से बचने के उद्देश्य से नंबर प्लेट छिपाई थी और इस प्रकार उसने पुलिस को धोखा देने का प्रयास किया।
जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने चार्जशीट प्रस्तुत की, जिस पर मजिस्ट्रेट ने संज्ञान लिया। इसके बाद आरोपी ने बीएनएसएस की धारा 528 के तहत तेलंगाना हाई कोर्ट में प्राथमिकी रद्द करने की मांग की, लेकिन हाई कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि प्रथम दृष्टया मामला बनता है। इसके बाद आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद पाया कि अभियोजन पक्ष ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका, जिससे यह सिद्ध हो कि नंबर प्लेट छिपाने के पीछे बेईमानी की नीयत थी या इस कृत्य से किसी व्यक्ति को गलत तरीके से लाभ पहुंचाया गया अथवा किसी अन्य को हानि हुई। न्यायालय ने कहा कि धोखाधड़ी के अपराध के लिए केवल संदेह पर्याप्त नहीं है, बल्कि कानून में निर्धारित सभी आवश्यक तत्वों का स्पष्ट रूप से स्थापित होना जरूरी है।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि आईपीसी की धारा 420 के तहत धोखाधड़ी का अपराध सिद्ध करने के लिए तीन प्रमुख तत्व आवश्यक हैं—पहला, बेईमानी की नीयत; दूसरा, किसी व्यक्ति को धोखे में रखकर प्रेरित करना; और तीसरा, उसके परिणामस्वरूप संपत्ति का हस्तांतरण या मूल्यवान सुरक्षा में परिवर्तन अथवा उसका विनाश। यदि ये आवश्यक तत्व मौजूद नहीं हैं, तो धारा 420 के तहत अभियोजन नहीं चलाया जा सकता।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि इस मामले में वाहन की आगे की नंबर प्लेट स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी। ऐसी स्थिति में यह कहना कि चालक ने अपनी पहचान पूरी तरह छिपाने की सुनियोजित योजना बनाई थी, उपलब्ध तथ्यों से मेल नहीं खाता। न्यायालय ने माना कि यदि आरोपों को सही भी मान लिया जाए, तब भी वे अधिकतम मोटर व्हीकल एक्ट के तहत नियामकीय उल्लंघन का मामला बनाते हैं, न कि धोखाधड़ी का आपराधिक अपराध।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नंबर प्लेट को ढकना मोटर व्हीकल एक्ट और उसके तहत बनाए गए नियमों का उल्लंघन हो सकता है, जिसके लिए संबंधित प्रावधानों के तहत जुर्माना लगाया जा सकता है। हालांकि, केवल इस आधार पर भारतीय दंड संहिता की धारा 420 के तहत मुकदमा दर्ज करना कानून के दायरे से बाहर है। न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों में आपराधिक प्रावधानों का अनावश्यक प्रयोग न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।
फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ लंबित धोखाधड़ी की आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश का मोटर व्हीकल एक्ट के तहत देय जुर्माने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। अदालत ने आरोपी को निर्देश दिया कि यदि उसने अब तक निर्धारित जुर्माना जमा नहीं किया है तो वह एक माह के भीतर संबंधित प्राधिकरण के समक्ष जुर्माना जमा करे।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला आपराधिक कानून और नियामकीय उल्लंघनों के बीच अंतर को स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय है। न्यायालय ने अपने आदेश के माध्यम से यह सिद्धांत दोहराया है कि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ गंभीर आपराधिक धाराएं तभी लगाई जा सकती हैं, जब कानून में निर्धारित आवश्यक तत्व स्पष्ट रूप से मौजूद हों। केवल अनुमान या आशंका के आधार पर धोखाधड़ी जैसे गंभीर अपराध का मामला दर्ज करना उचित नहीं माना जा सकता।

