सुप्रीम कोर्ट का सरकार से सवाल: मरीजों को दवाओं की कीमतों के खेल से कब मिलेगी मुक्ति?
औषधि (मूल्य नियंत्रण)आदेश 2013, आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 और दवा मूल्य नियमों का असली इम्तिहान! -कैंसर के बाद अब हार्ट स्टेंट,एंटीबायोटिक और दूसरी दवाओं की बारी? – सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा, मरीजों को कीमतों के इस खेल से कब मिलेगी मुक्ति? अगली सुनवाई 27 अक्टूबर 2026 -समग्र व्यापक महा-विश्लेषण
क़्या कानूनी कमियों के सहारे महंगी बिकती रहेंगी जीवनरक्षक दवाएं? -सुप्रीम कोर्ट के सवालों से हिला दवा बाजार,अब क्या सभी जीवनरक्षक दवाओं पर लगेगी मुनाफे की लगाम?
भारत के दवा बाजार के कानून नियम विनियम मौजूद, फिर भी दवाएं इतनी महंगी क्यों? -अधिनियमों और विनियमों के बीच छिपे मूल्य नियंत्रण क़े तीन बड़े लूपहोल्स (कमियों) को चुनौती :सुप्रीम कोर्ट की नजर ! -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर कानून की किताब में नियम, बाजार में कीमतों का खेल और मरीज की जेब पर सबसे बड़ा बोझ! किसी भी सभ्य समाज में कानून का उद्देश्य केवल व्यवस्था बनाए रखना नहीं,बल्कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना, शोषण रोकना और न्याय सुनिश्चित करना भी होता है।भारत सहित दुनियाँ के विभिन्न देशों में आर्थिक गतिविधियों,व्यापार,स्वास्थ्य सेवाओं,औषधि निर्माण और वितरण को नियंत्रित करने के लिए समय-समय पर कानून, नियम,विनियम और अधिनियम बनाए जाते हैं।बदलती परिस्थितियों के अनुसार इनमें संशोधन भी किए जाते हैं,लेकिन इसके बावजूद कानूनी व्यवस्थाओं में ऐसी कमियां रह सकती हैं, जिनका लाभ उठाकर कुछ कारोबारी या संस्थाएं नियमों की सीमाओं के भीतर रहते हुए भी अनुचित आर्थिक लाभ अर्जित कर सकती हैं। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह बताना चाहूंगा कि कई बार समस्या कानून के अभाव की नहीं, बल्कि कानून के दायरे,उसकी व्याख्या निगरानी और प्रभावी क्रियान्वयन की होती है।जब किसी व्यवस्था में एक श्रेणी पर नियंत्रण हो,लेकिन दूसरी समान रूप से महत्वपूर्ण श्रेणी को खुली छूट मिल जाए,तब नियमों का उद्देश्य और वास्तविक परिणाम एक-दूसरे से अलग दिखाई देने लगते हैं।यही चुनौती दवा बाजार में विशेष रूप से गंभीर हो जाती है,क्योंकि यहां किसी वस्तु की कीमत का सवाल केवल व्यापारिक लाभ-हानि तक सीमित नहीं रहता,बल्कि मरीज के जीवन, इलाज की निरंतरता और परिवार की आर्थिक सुरक्षा से सीधे जुड़ जाता है। कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में महंगी दवाओं का खर्च अनेक परिवारों को बचत समाप्त करने,कर्ज लेने अथवा संपत्ति बेचने तक की स्थिति में पहुंचा सकता है। ऐसे में दवा की कीमत निर्धारित करने की व्यवस्था में मौजूद संभावित कमियों की जांच और सुधार केवल आर्थिक सुधार नहीं,बल्कि जनहित, स्वास्थ्य संबंधी अधिकारों और सामाजिक न्याय का महत्वपूर्ण प्रश्न बन जाता है।सुप्रीम कोर्ट के सवालों ने क्यों खींचा ध्यान? इसको समझने की करें तो 22 सितंबर और उसके बाद की सुनवाइयों से संबंधित समाचार रिपोर्टों में कैंसर की एक दवा का उदाहरण सामने आया,2,700 रुपए की दवा का 27,000 रुपए का वसूला जा रहा था।इसी व्यापक संदर्भ में 12 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से संबंधित प्रस्तुत विवरण के अनुसार, किशन चंद जैन बनाम एथिक्स एंड मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड एवं अन्य, रिट याचिका (सिविल) संख्या डब्ल्यू.पी. (सी) 794/2023, का मामला दवा मूल्य निर्धारण की व्यवस्था पर महत्वपूर्ण बहस का केंद्र बना। उपलब्ध कराए गए विवरण में दो न्यायमूर्तियों की पीठ का उल्लेख है। याचिका में दवा मूल्य नियंत्रण, निजी अस्पतालों की फार्मेसी में दवाओं की बिक्री तथा चिकित्सा उपकरणों की कीमतों से जुड़े प्रश्न उठाए गए हैं। हालांकि, इस मामले की तारीख,पीठ,आदेशों और सरकारी हलफनामे के सभी विवरणों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है;इसलिए इस आर्टिकल के माध्यम से इस घटनाक्रम को मीडिया में उपलब्ध विवरण के आधार पर समझने की कोशिश करते हैं।
साथियों बात अगर हम डीपीसीओ 2013: कानून बना, लेकिन क्या दवा बाजार की हर कीमत पर नियंत्रण है? इसको समझने की करें तो भारत में दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने का प्रमुख कानूनी ढांचा आवश्यक वस्तु अधिनियम,1955 के अंतर्गत जारी औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 यानी डीपीसीओ 2013 है। इसे लागू करने और दवाओं की कीमतों की निगरानी करने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण यानी एनपीपीए की है।इसका उद्देश्य आवश्यक दवाओं को उचित कीमत पर उपलब्ध कराना, निर्धारित मूल्य से अधिक वसूली पर कार्रवाई करना और दवाओं की उपलब्धता बनाए रखना है।लेकिन इस व्यवस्था में अनुसूचित और गैर-अनुसूचित दवाओं के बीच अंतर महत्वपूर्ण है।राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची में शामिल अनुसूचित दवाओं की अधिकतम कीमत निर्धारित करने की व्यवस्था है, जबकि गैर-अनुसूचित दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने में कंपनियों को अधिक स्वतंत्रता मिलती रही है।डीपीसीओ के पैरा 20 के अंतर्गत गैर- अनुसूचित दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य में किसी भी 12 महीने की अवधि में 10 प्रतिशत से अधिक वृद्धि नहीं की जा सकती। ध्यान देने योग्य बात यह है कि सालाना वृद्धि की सीमा और शुरुआती कीमत पर नियंत्रण दो अलग-अलग विषय हैं। यदि किसी दवा की शुरुआती कीमत ही बहुत अधिक रखी जाती है, तो उस पर सालाना वृद्धि की सीमा अपने आप मरीज को सस्ती दवा उपलब्ध नहीं करा देती। यही वह कानूनी और नीतिगत अंतर है, जिसे सटीकता से वर्तमान विवाद के केंद्र में रखा गया है।
साथियों बात अगर हम सोमवार दिनांक12 अक्टूबर 2026: कैंसर की दवाओं पर 30 प्रतिशत ट्रेड मार्जिन की सरकारी योजना को समझने की करें तो 12 अक्टूबर की सुनवाई से संबंधित रिपोर्टों के अनुसार, केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायालय को बताया कि गैर-अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं के ट्रेड मार्जिन को अधिकतम 30 प्रतिशत तक सीमित करने की योजना बनाई गई है। एनपीपीए की 8 अक्टूबर 2026 की बैठक में इस विषय पर निर्णय की जानकारी सामने आई। सरकार ने ऐसी विशेषज्ञ समिति गठित की है, जिसे निर्धारित समय के भीतर उन कैंसर दवाओं की सूची तैयार करनी है, जिन पर यह व्यवस्था लागू होगी। प्रस्तावित सूची को बाजार की परिस्थितियों और सार्वजनिक स्वास्थ्य की जरूरतों के अनुसार समय-समय पर अद्यतन करने की भी बात कही गई है। इस योजना का उद्देश्य उन दवाओं की कीमतों में अत्यधिक वृद्धि को रोकना है, जिन पर पहले अनुसूचित दवाओं जैसा प्रत्यक्ष मूल्य नियंत्रण लागू नहीं था। हालांकि,30 प्रतिशत की सीमा को समझते समय यह स्पष्ट रहना चाहिए कि ट्रेड मार्जिन और एमआरपी एक ही चीज नहीं हैं। ट्रेड मार्जिन वितरण श्रृंखला में खरीद मूल्य और बिक्री मूल्य के बीच अंतर से संबंधित होता है। इसे किस आधार पर और किन- किन स्तरों पर लागू किया जाएगा, इसका अंतिम प्रभाव अधिसूचित नियमों तथा दवाओं की सूची पर निर्भर करेगा। इसलिए यह कहना कि हर कैंसर दवा की कीमत निश्चित रूप से 70 प्रतिशत घट जाएगी,अभी उचित नहीं होगा। समाचार रिपोर्टों में कुछ दवाओं की कीमतों में 20 से 70 प्रतिशत तक संभावित कमी और मरीजों को सालाना लगभग ₹2,500 करोड़ की बचत का अनुमान बताया गया है। ये अनुमान हैं; वास्तविक बचत लागू व्यवस्था और दवा-विशेष के मूल्य पर निर्भर करेगी।
साथियों बात अगर हम क्या केवल कैंसर की दवाएं ही महंगी हैं? सुप्रीम कोर्ट का व्यापक सवाल इसको समझने की करें तो, इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि दवा मूल्य निर्धारण की समस्या केवल कैंसर के उपचार तक सीमित नहीं है। हृदय रोग, मधुमेह, संक्रमण और अन्य गंभीर बीमारियों में इस्तेमाल होने वाली दवाएं भी लाखों परिवारों के नियमित खर्च का हिस्सा हैं। इसके अतिरिक्त, स्टेंट, कैथेटर, सलाइन से जुड़ी उपभोग्य सामग्री और दूसरे चिकित्सा उपकरणों की कीमतें भी उपचार की कुल लागत को प्रभावित करती हैं। याचिका से संबंधित रिपोर्टों के अनुसार,अस्पतालों और चिकित्सा सामग्री की बिक्री में अत्यधिक मूल्य-अंतर तथा मरीजों के पास खरीद के सीमित विकल्प जैसे मुद्दे न्यायालय के समक्ष उठाए गए हैं। 12 अक्टूबर की सुनवाई पर प्रकाशित रिपोर्टों में बताया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से सवाल किया कि यदि कैंसर की दवाओं के ट्रेड मार्जिन को नियंत्रित किया जा सकता है,तो अन्य जीवन रक्षक दवाओं और चिकित्सा उपकरणों के लिए भी प्रभावी व्यवस्था पर विचार क्यों नहीं किया जाना चाहिए।अदालत ने दवा बाजार के व्यापक मूल्यनिर्धारण तंत्र की समीक्षा पर जोर दिया और 27 अक्टूबर 2026 को अगली सुनवाई के लिए मामला सूचीबद्ध किया।यहां अदालत की भूमिका और सरकार की भूमिका के बीच अंतर भी महत्वपूर्ण है। न्यायालय सरकार से नीतिगत कमियों पर विचार करने, उपलब्ध कानूनी शक्तियों का उपयोग करने और जनहित में समाधान तलाशने को कह सकता है; लेकिन किसी नई मूल्य सीमा का वास्तविक क्रियान्वयन संबंधित कानूनी प्रावधानों, सरकारी निर्णय और आवश्यक अधिसूचनाओं के माध्यमसे ही होगा।इसलिए सभी दवाओं पर 16 प्रतिशत का समान मार्जिन लागू होने की बात को अभी अंतिम सरकारी निर्णय नहीं माना जाना चाहिए। इस विषय पर न्यायालय के प्रश्न और किसी बाध्यकारी अंतिम आदेश के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है।
साथियों बात अगर हम अस्पतालों की फार्मेसी और चिकित्सा उपकरण:मरीज के पास विकल्प कितने?इसको समझने की करें तो निजी अस्पतालों के भीतर संचालित फार्मेसियों को लेकर उठी चिंताओं में एक अहम प्रश्न मरीज की पसंद का है। यदि अस्पताल में भर्ती मरीज को दवा बाहर से खरीदने का व्यावहारिक अवसर नहीं मिलता, तो वह कीमतों की तुलना करने की स्थिति में भी नहीं रहता। ऐसी परिस्थिति में पारदर्शी बिलिंग, खरीद मूल्य और बिक्री मूल्य के बीच उचित अंतर, जेनेरिक विकल्पों की जानकारी तथा मरीज को उपलब्ध वैकल्पिक स्रोतों की स्पष्ट जानकारी महत्वपूर्ण हो जातीहै।हालांकि सभी अस्पतालों या फार्मेसियों पर एक समान आरोप लगाना उचित नहीं होगा; किसी संस्था की वास्तविक प्रथाओं का आकलन प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए।इसी तरह, चिकित्सा उपकरणों पर 500 से 1,000 प्रतिशत तक मार्जिन होने के दावों की जांच संबंधित उत्पाद, उसकी खरीद लागत,तकनीकी गुणवत्ता नियामकीय श्रेणी और अस्पताल के सेवा शुल्क को अलग-अलग करके की जानी चाहिए। यदि किसी उपकरण की कीमत में अनुचित वृद्धि पाई जाती है, तो उसके लिए प्रभावी मूल्य नियंत्रण, लागत संबंधी जानकारी और शिकायत निवारण की व्यवस्था उपयोगी हो सकती है। परंतु प्रत्येक उपकरण पर एक ही सीमा लागू करना तभी व्यावहारिक होगा, जब उत्पादों की लागत और आपूर्ति संबंधी परिस्थितियों का उचित आकलन किया जाए।
साथियों बात अगर हम भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय संदेश: सस्ता इलाज,पारदर्शी बाजार और मजबूत कानून इसको समझने की करें तो,दवा की कीमतों का प्रश्न भारत तक सीमित नहीं है। दुनिया के अनेक देशों में पेटेंट अधिकार, अनुसंधान की लागत, दवा कंपनियों की प्रतिस्पर्धा, सरकारी स्वास्थ्य बीमा और सार्वजनिक खरीद के बीच संतुलन बनाने की चुनौती मौजूद है।कुछ देशों में सामूहिक खरीद और मूल्य वार्ता के माध्यम से लागत घटाने का प्रयास किया जाता है, जबकि अन्य देशों में बीमा योजनाओं और नियामकीय निगरानी की मदद ली जाती है।भारत के लिए भी ऐसा ढांचा उपयोगी होसकता है,जिसमें आवश्यक दवाओं की उपलब्धता, उचित कीमत, गुणवत्तापूर्ण निर्माण और नवाचार के लिए प्रोत्साहन एक साथ सुनिश्चित किए जाएं।सिर्फ मूल्य सीमा घोषित करना पर्याप्त नहीं होगा। सरकार को यह भी देखना होगा कि कम कीमत के कारण किसी आवश्यक दवा का उत्पादन बंद न हो,बाजार में कृत्रिम कमी न पैदा हो और मरीज को निर्धारित दवा समय पर मिलती रहे। इसके लिए लागत संबंधी आंकड़ों का नियमित विश्लेषण, थोक और खुदरा कीमतों की निगरानी, अस्पतालों की बिलिंग में पारदर्शिता, उल्लंघन पर समयबद्ध कार्रवाई और मरीजों के लिए सुलभ शिकायत प्रणाली जरूरी हैं। यही वह बिंदु है जहां कानून के शब्दों को वास्तविक जनहित में बदलने की परीक्षा होती है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि दवा का बाजार मुनाफे के साथ मानवीय जिम्मेदारी भी समझे किशन चंद जैन बनाम एथिक्स एंड मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड एवं अन्य से जुड़ी बहस ने दवा मूल्य नियंत्रण की व्यवस्था में मौजूद अंतरालों पर ध्यान केंद्रित किया है।कैंसर की दवाओं पर 30 प्रतिशत ट्रेड मार्जिन की प्रस्तावित व्यवस्था एक महत्वपूर्ण नीतिगत कदम हो सकती है, लेकिन इसकी सफलता अंतिम नियमों, वास्तविक कीमतों में कमी और मरीजों तक पहुंचने वाले लाभ से तय होगी। अगला बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार अन्य जीवनरक्षक दवाओं, चिकित्सा उपकरणों और अस्पतालों की फार्मेसी में मूल्य पारदर्शिता के लिए भी व्यापक सुधार करेगी।कानून की असली सफलता इस बात में नहीं कि उसके पन्नों पर कितने नियम लिखे हैं, बल्कि इसमें है कि उसकी कमियों का लाभ उठाकर आम नागरिक के अधिकारों का हनन न हो।दवा उद्योग को उचित लाभ कमाने का अधिकार है, लेकिन गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीज की विवशता को असीमित मूल्य-वृद्धि का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।27 अक्टूबर 2026 की प्रस्तावित अगली सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण होगी कि उसमें सरकार के व्यापक रुख और आगे की नियामकीय दिशा पर अधिक स्पष्टता मिल सकती है।अंतिम कसौटी यही रहेगी,क्या मरीज को गुणवत्तापूर्ण जीवनरक्षक दवा उचित कीमत पर मिलती है, क्या बाजार में प्रतिस्पर्धा और पारदर्शिता बढ़ती है, और क्या कानून अपने मूल उद्देश्य, अर्थात जनहित की रक्षा,को प्रभावी रूप से पूरा कर पाता है?
*-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318*

