समाज के कर्णधारों की चाटुकारिता और जन-मानस का दूषितीकरण—
वर्तमान समय की समाज व्यवस्था एक सूक्ष्म किंतु अत्यंत भयानक संकट के दौर से गुजर रही है। जिस समाज में ज्ञान, विवेक और नैतिकता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी, उसी समाज को आज स्वार्थी तत्वों ने अपने नियंत्रण में ले लिया है। वे लोगों के मन-मस्तिष्क को दूषित करने की एक जहरीली होड़ में शामिल हो चुके हैं।
समाज की बागडोर संभालने वाले लोग अपनी सत्ता, स्थिति और स्वार्थों को सुरक्षित रखने के लिए चाटुकारिता को एक मुख्य हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। इन चाटुकार चालकों के कुछ मुख्य पहलू नीचे दिए गए हैं:
मिथ्या का प्रचार और ब्रेनवाशिंग — समाज का शक्तिशाली वर्ग अपनी चाटुकारिता और कृत्रिम मुखौटों के पीछे छिपकर झूठे प्रचार के माध्यम से आम जनता की सोच और चेतना पर कब्जा कर लेता है। समाज की वास्तविक समस्याओं से ध्यान भटकाने के लिए अनावश्यक विवादों और द्वेष का बीज बोया जाता है, ताकि लोगों की स्वतंत्र सोचने की क्षमता समाप्त हो जाए।
सत्य को दबाना और प्रशंसा की राजनीति—चाटुकार हमेशा सत्ता का अंध समर्थन करते हैं। वे सत्ताधारी पक्ष के गलत निर्णयों को भी सुंदर आवरण में ढककर जनता के सामने पेश करते हैं। ऐसे संचालक समाज में वास्तविक रचनात्मक आलोचकों को दरकिनार
कर देते हैं और केवल चापलूसी करने वाले लोगों को ही आगे बढ़ाते हैं, जिससे सत्य जनता की नजरों में नहीं आ पाता।
मानवीय मूल्यों का पतन—सत्ता और व्यक्तिगत लाभ के लिए ये संचालक लोगों के बीच भाईचारे, सहानुभूति और नैतिकता को नष्ट करने में भी संकोच नहीं करते। लोगों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करके, हिंसा और नफरत का माहौल बनाकर वे अपनी सत्ता की नींव मजबूत करते हैं।
शोषण की नवीनतम तकनीक—चाटुकारिता केवल शब्दों तक सीमित नहीं है, यह एक मनोवैज्ञानिक शोषण है। समाज को स्वस्थ दिशा में ले जाने के बजाय, जनता को अंधविश्वास, अतार्किक अवधारणाओं और क्षणिक प्रलोभनों के जाल में बांधकर रखा जाता है, ताकि वे अपने अधिकारों पर सवाल न उठा सकें।
ऐसी व्यवस्था मनुष्यों की वैचारिक स्वतंत्रता छीन लेती है और समाज को भीतर से खोखला कर देती है। इन संचालकों के चाटुकार और स्वार्थी रूप को पहचानना तथा इसके खिलाफ जागरूक और तर्कसंगत सोच के साथ खड़े होना आज के समय की नितांत आवश्यकता बन गया है।
मूल आलेख: मनीषा शर्मा
अनुवाद: रितेश शर्मा
स्थान: असम, गुवाहाटी

