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    रघुपति राघव राजा राम भजन से दिक्कत क्यों ?

    Devanand SinghBy Devanand SinghDecember 29, 2024No Comments5 Mins Read
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    रघुपति राघव राजा राम भजन से दिक्कत क्यों ?
    देवानंद सिंह
    25 दिसंबर को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिवस पर बिहार में आयोजित एक घटना ने सबका ध्यान आकर्षित किया। दरअसल, इस कार्यक्रम में जब लोकगायिका देवी ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के प्रिय भजन ‘रघुपति राघव राजा राम’ गाया तो इसका विरोध किया गया। पता चला कि 60-70 युवा कार्यकर्ताओं ने वहां हंगामा किया और इसके बाद गायिका को माफी मांगनी पड़ी। उनके माफी मांगने के बाद बीजेपी नेता अश्विनी चौबे ने ‘जय श्री राम’ का नारा लगवाया। भारत जैसे विविधता वाले देश में इस तरह की घटना वाकई चिंताजनक है। भारत पूरी दुनिया के लिए विविधता में एकता का प्रतीक है। यह देश कई धर्मों, संस्कृतियों, भाषाओं और जातियों का संगम है और यह विविधता ही हमारी ताकत भी है। ऐसे में, सवाल उठता है कि इस विविधता के बावजूद अगर इस तरह की घटना हो तो वह सामाजिक तानेबाने के लिए अत्यंत घातक ही कहा जाएगा। यह हमारी राष्ट्रीय एकता और भाईचारे के लिए चुनौती ही कहा जाएगा।

     

     

    ‘रघुपति राघव राजा राम’ भजन महात्मा गांधी से गहरे रूप से जुड़ा हुआ है। गांधी जी ने इस भजन को अपने जीवन के हर पहलू में आत्मसात किया था और इसे सत्य, अहिंसा और एकता के प्रतीक के रूप में अपनाया। गांधी जी का यह विश्वास था कि इस भजन में निहित संदेश सभी भारतीयों को एक साथ जोड़ने और समाज में शांति और भाईचारे की भावना पैदा करने का है। यह भजन न केवल गांधी जी की निजी आस्थाओं को दर्शाता था, बल्कि यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक अहम हिस्से के रूप में भी जाना जाता है। इस भजन का हर शब्द एक संघर्ष, एक समर्पण और एकता का प्रतीक है। यह ध्यान देने की जरूरत है कि ‘रघुपति राघव राजा राम’ कोई एक धार्मिक भजन नहीं है। यह भजन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और महात्मा गांधी के आंदोलनों से गहरे जुड़ा हुआ है। गांधी जी के लिए यह भजन एक नारा था, जो उन्हें आत्मबल, शांति और सत्य की ओर प्रेरित करता था। इसके माध्यम से उन्होंने पूरे भारत को एकता की भावना का अहसास कराया था, चाहे उनकी धार्मिक पहचान कुछ भी हो।

     

     

    कुछ लोगों ने ‘रघुपति राघव राजा राम’ भजन का विरोध कर इसे एक धार्मिक विवाद का हिस्सा बना दिया, जो उचित नहीं कहा जा सकता है। निश्चित रूप से इस तरह का विरोध एक संकीर्ण दृष्टिकोण को दर्शाता है, हालांकि इस भजन का संदर्भ और उद्देश्य धार्मिक से कहीं अधिक सामाजिक और राजनीतिक है। महात्मा गांधी के जीवन में इस भजन का महत्व इस तथ्य में निहित था कि यह एकता, अहिंसा और शांतिपूर्ण संघर्ष के प्रतीक के रूप में था। अगर, हम इस भजन को केवल धार्मिक रूप से सीमित कर लें, तो हम इसके व्यापक संदेश को नजरअंदाज कर रहे हैं। भारत में ‘रघुपति राघव राजा राम’ जैसे भजन केवल एक धार्मिक प्रतीक तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा भी है। ऐसे भजन हमारी सांस्कृतिक पहचान के महत्वपूर्ण भाग हैं, जो समय के साथ हमारे समाज के विचारों और आस्थाओं को जोड़ते हैं। जब इस तरह के भजन का विरोध होता है, तो यह केवल धार्मिकता का विरोध नहीं होता, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर और इतिहास का विरोध भी होता है।

     

     

    भारत की सांस्कृतिक धरोहर में हर धर्म और समुदाय का योगदान है। इस बहुलतावादी समाज में यह जरूरी है कि हम सभी सांस्कृतिक प्रतीकों का सम्मान करें। किसी भी गीत, भजन या पूजा को एक विशेष धार्मिक विश्वास के चश्मे से देखना, हमारी राष्ट्रीय एकता को कमजोर करने जैसा है। ‘रघुपति राघव राजा राम’ भजन को केवल हिंदू धर्म से जोड़ने की बजाय, इसे एक राष्ट्र के प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए, जो गांधी जी के आदर्शों को आगे बढ़ाता है। बिहार में लोक गायिका देवी के साथ हुई घटना हमें यह समझने का अवसर देती है कि विवाद का असली कारण क्या है ? यह केवल एक भजन का विरोध नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज में बढ़ती हुई सांप्रदायिकता और असहिष्णुता का प्रतीक है। जब किसी को माफी मांगने के लिए मजबूर किया जाता है और उस पर धार्मिक नारों को लगाने का दबाव डाला जाता है, तो यह केवल समाज के एक हिस्से की असहमति नहीं, बल्कि एक बड़े स्तर पर सामाजिक ताने-बाने को चुनौती देने का भी संकेत है।

     

     

    भारत में धार्मिक असहमति हमेशा से रही है, लेकिन यह असहमति कभी भी भाईचारे और एकता के लिए खतरे का कारण नहीं बननी चाहिए। ‘रघुपति राघव राजा राम’ जैसे भजन का विरोध करने से हम केवल धार्मिक विभाजन को बढ़ावा देते हैं, बल्कि हम उस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को भी नष्ट करते हैं, जो हमें जोड़ने का काम करती है। यह एक ऐसा भजन है, जो महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के आदर्शों को प्रस्तुत करता है और इसके माध्यम से हमें शांति और एकता की आवश्यकता का अहसास होता है।  हमें एकता, अहिंसा और शांति का संदेश देने वाले भजन को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में देखना चाहिए।

    सांस्कृतिक प्रतीकों का विरोध करना और उन्हें संकीर्ण धार्मिक दृष्टिकोण से देखना, हमारे समाज की विविधता और समरसता के खिलाफ है। हमें यह समझना होगा कि भारतीय समाज की ताकत उसकी विविधता और सांस्कृतिक धरोहर में है। ‘रघुपति राघव राजा राम’ भजन का विरोध करना, इस देश के इतिहास और संस्कृति का विरोध करना है। हमें इस भजन और अन्य सांस्कृतिक प्रतीकों को सम्मान देना चाहिए, क्योंकि ये हमारे देश के एकता और भाईचारे के प्रतीक हैं। समाज में बढ़ती हुई असहिष्णुता और सांप्रदायिकता का मुकाबला करने के लिए हमें अपने सांस्कृतिक प्रतीकों का सम्मान करना होगा और गांधी जी के आदर्शों को जीवित रखना होगा। तभी हम अपने राष्ट्र को एकता, शांति और समृद्धि की ओर अग्रसर कर सकते हैं।

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