बिहार में पटरी से उतरता विपक्ष!
भाग 01
*देवानंद सिंह*
बिहार की राजनीति में फिर एक बार एकजुट विपक्ष का दावा उस रथ से नीचे उतरता दिखा, जिस पर सवार होकर विपक्ष 2025 के विधानसभा चुनाव की निर्णायक यात्रा की शुरुआत करना चाहता था। राहुल गांधी की ‘संविधान बचाओ न्याय यात्रा’ का मकसद जहां एक ओर देश में विपक्षी समन्वय को मजबूत करना था, वहीं बिहार में यह यात्रा खुद असमंजस, अविश्वास और अहंकार का प्रतीक बनकर रह गई। सबसे बड़ा विवाद बना कन्हैया कुमार और पप्पू यादव को रथ से हटाने का निर्णय। एक ऐसा फैसला, जिसने बिहार में विपक्षी एकता की गाड़ी को पटरी से उतार दिया है।

कन्हैया कुमार को लेकर राजद नेतृत्व की असहजता कोई नई बात नहीं है। कन्हैया, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से राजनीति की मुख्यधारा में आए, अपनी भाषण शैली, वैचारिक स्पष्टता और युवा अपील के कारण राष्ट्रीय पहचान बना चुके हैं। तेजस्वी यादव का राजनैतिक सफर विरासत आधारित रहा है, उनके लिए कन्हैया एक वैकल्पिक चेहरे की तरह उभरते रहे हैं। यह संभवतः इस घटना की जड़ में मौजूद असुरक्षा का कारण है।

यह भी गौरतलब है कि रथ यात्रा के आयोजन में संजय यादव की भूमिका केंद्रीय रही। वह एक ऐसा व्यक्ति है, जिन पर आरजेडी की रणनीतिक दिशा तय करने का जिम्मा है, और जिनकी निर्णय प्रक्रिया अक्सर सहयोगी दलों से संवाद की बजाय नियंत्रण आधारित दिखती है।

