लेखक: राष्ट्र संवाद संवाददाता
विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले स्थित जादूगोड़ा में आदिवासी संस्कृति की अनुपम छटा बिखरी। इस खास मौके पर सिद्धू-कान्हू मोड़ में आयोजित भव्य समारोह ने उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। आदिवासी युवा संघर्ष समिति के तत्वावधान में हुए इस आयोजन ने पारंपरिक विरासत को सहेजने का सशक्त संदेश दिया।
विश्व आदिवासी दिवस पर जादूगोड़ा में सांस्कृतिक विरासत का प्रदर्शन
कार्यक्रम में पोटका विधायक एवं समिति के संरक्षक संजीव सरदार मुख्य अतिथि तथा देश परगना धाड़ दिसोम बैजू मुर्मू विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। अतिथियों का पारंपरिक रीति-रिवाज से भव्य स्वागत किया गया। मंच पर उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन किया।
कार्यक्रम में धोगेंड, बूढ़ी गाड़ी, हो, मुंडारी एवं रिंजा नृत्य मंडलियों ने पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत कर लोगों का मन मोह लिया। मांदर और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप से पूरा सिद्धू-कान्हू मोड़ आदिवासी संस्कृति के रंग में रंग गया। नर्तक दलों ने अपने-अपने क्षेत्र की विशिष्ट नृत्य शैलियों का प्रदर्शन किया, जिससे झारखंड की सांस्कृतिक विविधता की झलक मिली। युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक सभी थिरकते नजर आए।
विधायक संजीव सरदार का संबोधन: संस्कृति संरक्षण का संकल्प
इस अवसर पर विधायक संजीव सरदार ने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस अपनी भाषा, संस्कृति, परंपरा और पहचान को संरक्षित करने का संकल्प लेने का दिन है। आदिवासी समाज की संस्कृति सदियों पुरानी और समृद्ध है, जिसे बचाए रखना नई पीढ़ी की जिम्मेदारी है। उन्होंने युवाओं से आधुनिक शिक्षा और रोजगार के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़े रहने का आह्वान किया। विधायक ने कहा कि सरकार आदिवासी हितों के लिए निरंतर कार्य कर रही है।
आदिवासी दिवस का वैश्विक महत्व और झारखंड की भूमिका
संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस घोषित करने का मुख्य उद्देश्य विश्वभर के आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा और उनकी विशिष्ट संस्कृतियों को बढ़ावा देना है। झारखंड, जिसे ‘आदिवासियों की भूमि’ कहा जाता है, इस दिवस को विशेष उत्साह के साथ मनाता है। यहां संताल, मुंडा, हो, उरांव, खड़िया जैसे अनेक जनजाति समूह निवास करते हैं, जिनकी अपनी अलग भाषा, लिपि, रीति-रिवाज और शासन प्रणाली रही है।
जादूगोड़ा क्षेत्र यूरेनियम खनन के लिए जाना जाता है, लेकिन यहां की आदिवासी आबादी ने अपनी सांस्कृतिक पहचान को अक्षुण्ण रखा है। सिद्धू-कान्हू मोड़ का नामकरण महान स्वतंत्रता सेनानी सिद्धू और कान्हू मुर्मू के नाम पर किया गया है, जिन्होंने 1855-56 के संताल हूल (विद्रोह) का नेतृत्व किया था। यह स्थान आदिवासी गौरव और संघर्ष का प्रतीक है। ऐसे ऐतिहासिक स्थल पर सांस्कृतिक आयोजन का होना नई पीढ़ी को उनके गौरवशाली इतिहास से जोड़ता है।
आदिवासी संस्कृति केवल नृत्य-संगीत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के साथ सहअस्तित्व का दर्शन है। सरना धर्म कोड, जल-जंगल-जमीन पर सामुदायिक अधिकार और सामूहिक निर्णय प्रक्रिया (ग्रामसभा) इसकी मूल विशेषताएं हैं। वर्तमान दौर में जब आधुनिकीकरण और शहरीकरण की आंधी तेज है, ऐसे आयोजन संस्कृति की जड़ों को सींचने का काम करते हैं। युवाओं का बढ़-चढ़कर भाग लेना शुभ संकेत है।
कार्यक्रम के सफल संचालन में प्रभात कुमार माझी, सुधीर सोरेन, रमेश सोरेन, बागराई सोरेन, रायसेन सोरेन, अनिल मुर्मू, राहुल टुडू, प्रेम सोरेन, समीर सोरेन, सुभाष टुडू, निखिल सोरेन, मधु सोरेन, मोहन सोरेन समेत बड़ी संख्या में महिलाएं एवं समाज के लोगों की सक्रिय भागीदारी रही। आयोजकों ने भविष्य में भी ऐसे आयोजनों को जारी रखने का संकल्प व्यक्त किया। अधिक जानकारी के लिए संयुक्त राष्ट्र का आधिकारिक पृष्ठ देखें।
अंत में धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ। उपस्थित जनसमूह ने संकल्प लिया कि वे अपनी भाषा, संस्कृति और परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाएंगे। विश्व आदिवासी दिवस का यह आयोजन जादूगोड़ा ही नहीं, पूरे कोल्हान प्रमंडल के लिए प्रेरणादायी रहा।

