भाजपा के कद्दावर नेता व पूर्व कृषि मंत्री सत्यानंद झा बाटुल नेमरा पहूंचकर दिशोम गुरु शिबू सोरेन को दिया श्रंद्धांजली
निजाम खान। राष्ट्र संवाद
रांची: झारखंड की राजनीति के लिए रविवार का दिन भावनाओं और संवेदनाओं से भरा रहा। नाला विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के कद्दावर नेता और राज्य के पूर्व कृषि मंत्री सत्यानंद झा उर्फ़ बाटुल दिशोम गुरु शिबू सोरेन के पैतृक आवास नेमरा पहुंचे। इस दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मुलाकात की और गुरुजी के निधन पर गहरी संवेदना व्यक्त की। उन्होंने दिवंगत नेता को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि शिबू सोरेन का जीवन संघर्ष, समर्पण और झारखंड की अस्मिता की रक्षा के लिए प्रेरणास्रोत है।
नेमरा पहुँचने पर सत्यानंद झा ने गुरुजी के परिजनों से मुलाकात की और उनके दुःख में सहभागी बनने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि शिबू सोरेन न केवल एक बड़े राजनेता थे, बल्कि वे एक आंदोलनकारी, समाज सुधारक और आदिवासी समुदाय के सशक्त स्वर भी थे। उनके नेतृत्व ने झारखंड के अलग राज्य बनने के सपने को साकार किया। “गुरुजी का जाना एक युग का अंत है, लेकिन उनके विचार और संघर्ष हमेशा हमें प्रेरित करते रहेंगे,” झा ने भावुक स्वर में कहा।
इस मौके पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी पूर्व मंत्री से संवाद किया और पिता की स्मृतियों को साझा किया। उन्होंने कहा कि शिबू सोरेन ने अपने जीवन के हर क्षण को जनसेवा और झारखंड की अस्मिता की रक्षा के लिए समर्पित किया। “वे जमीन से जुड़े, सरल स्वभाव के और जनता की समस्याओं को समझने वाले नेता थे। आज हम सभी का दायित्व है कि उनके अधूरे सपनों को पूरा करें,” हेमंत ने कहा।
सत्यानंद झा उर्फ़ बाटुल ने याद करते हुए कहा कि उनके राजनीतिक जीवन में गुरुजी का मार्गदर्शन हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। “उन्होंने हमें सिखाया कि राजनीति में ईमानदारी, पारदर्शिता और जनता की भलाई सबसे पहले होनी चाहिए। उनके व्यक्तित्व में संघर्षशीलता और सरलता का अद्भुत मेल था,” उन्होंने कहा।
नेमरा गाँव में उस समय गहरी भावनात्मक लहर थी। आसपास के ग्रामीण, राजनीतिक कार्यकर्ता और समर्थक बड़ी संख्या में मौजूद थे। लोग गुरुजी की स्मृतियों को साझा कर रहे थे—किस तरह उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को संगठित किया और झारखंड की आवाज को दिल्ली तक पहुँचाया। कई बुजुर्गों ने बताया कि गुरुजी का जीवन हर झारखंडी के लिए प्रेरणा है, और उनकी कमी कभी पूरी नहीं हो सकेगी।
सत्यानंद झा ने यह भी कहा कि राजनीतिक मतभेदों से परे, शिबू सोरेन जैसे नेताओं का योगदान किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं होता, बल्कि पूरे समाज के लिए होता है। “गुरुजी ने हमें यह सिखाया कि जब बात जनहित की हो, तो सभी को एकजुट होना चाहिए,” उन्होंने जोड़ा।
यह मुलाकात और श्रद्धांजलि केवल शोक का पल नहीं थी, बल्कि एक संकल्प का क्षण भी था—कि शिबू सोरेन की सोच, उनके आंदोलन और उनके सपनों को आगे बढ़ाने के लिए सभी राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता एक साथ आएंगे। नेमरा का यह दिन गुरुजी की स्मृतियों में डूबा रहा, लेकिन साथ ही झारखंड के उज्ज्वल भविष्य की दिशा में एकता और प्रतिबद्धता का संदेश भी दे गया।

