लेखक: देवानंद सिंह
लोकसभा की कार्यवाही और लोकतंत्र की चुनौती
लोकसभा की कार्यवाही का बार-बार हंगामे की भेंट चढ़ जाना अब एक सामान्य घटना बनती जा रही है। ताजा घटनाक्रम में भी विपक्ष के विरोध और सत्ता पक्ष की कार्यशैली के बीच पूरा दिन लगभग निष्फल रहा। इस दौरान महत्वपूर्ण विधेयक ध्वनिमत से पारित हो गया, लेकिन सदन में सार्थक बहस नहीं हो सकी। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस राजनीतिक टकराव की कीमत कौन चुका रहा है? इसका सीधा उत्तर है—देश का करदाता।
संसद की गरिमा और जनता का पैसा
संसद देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था है। यहां जनता ने अपने प्रतिनिधियों को इसलिए भेजा है कि वे जनहित के मुद्दों पर चर्चा करें, सरकार से जवाब मांगें, कानूनों पर गंभीर बहस करें और देश के भविष्य की दिशा तय करें। लेकिन जब पूरा समय नारेबाजी, वेल में आने और लगातार स्थगन में बीत जाए, तब लोकतंत्र की आत्मा आहत होती है।
विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों की जिम्मेदारी
यह कहना गलत होगा कि केवल विपक्ष ही दोषी है। विपक्ष का संवैधानिक दायित्व है कि वह सरकार से कठिन सवाल पूछे, जवाबदेही तय करे और जनता की आवाज उठाए। यदि किसी घटना पर उसे आपत्ति है तो विरोध करना उसका अधिकार है। लेकिन विरोध और व्यवधान में अंतर होता है। यदि हर मुद्दे का अंत केवल हंगामे में होगा तो जनता यह पूछने का अधिकार रखती है कि क्या विपक्ष केवल विरोध करने के लिए विपक्ष बना है, या समाधान खोजने के लिए भी उसकी कोई भूमिका है?
दूसरी ओर सत्ता पक्ष भी पूरी तरह जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। लोकतंत्र केवल बहुमत के बल पर नहीं चलता, बल्कि संवाद और सहमति की संस्कृति पर भी आधारित होता है। यदि विपक्ष लगातार किसी विषय पर चर्चा की मांग कर रहा है तो सरकार को भी यथासंभव चर्चा के लिए तैयार रहना चाहिए। बहुमत का अर्थ यह नहीं कि संवाद की आवश्यकता समाप्त हो जाए। सरकार की मजबूती उसकी संख्या से नहीं, बल्कि आलोचना सुनने और उसका उत्तर देने की क्षमता से भी मापी जाती है।
करोड़ों रुपये का नुकसान और जनता के सवाल
आज देश की जनता दोनों पक्षों से सवाल पूछ रही है। संसद चलाने पर हर दिन करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। यह पैसा किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि टैक्स देने वाले करोड़ों नागरिकों का है। जब सदन की कार्यवाही बाधित होती है तो केवल समय ही नहीं, जनता की मेहनत की कमाई भी व्यर्थ जाती है। ऐसे में नागरिक यह जानना चाहते हैं कि आखिर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच ऐसा कौन-सा गतिरोध है, जिसे बातचीत से दूर नहीं किया जा सकता?
समाधान की राजनीति वक्त की मांग
लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन मनभेद स्थायी नहीं होने चाहिए। सरकार और विपक्ष दोनों को यह समझना होगा कि संसद राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का मंच नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नीति निर्माण का केंद्र है। यदि महत्वपूर्ण विधेयक बिना बहस के पारित होंगे और विपक्ष केवल शोर तक सीमित रहेगा, तो लोकतंत्र की गुणवत्ता कमजोर होगी।
देश को आज ऐसी राजनीति की आवश्यकता है जिसमें सरकार जवाब देने से न भागे और विपक्ष केवल हंगामे तक सीमित न रहे। संसद की गरिमा तभी बचेगी जब सत्ता पक्ष संवाद के लिए उदार होगा और विपक्ष विरोध के साथ-साथ रचनात्मक सुझाव भी देगा।
जनता ने दोनों को अलग-अलग भूमिकाएं सौंपी हैं, लेकिन उद्देश्य एक ही है—राष्ट्रहित। इसलिए अब समय आ गया है कि संसद में टकराव की राजनीति छोड़कर समाधान की राजनीति को प्राथमिकता दी जाए। क्योंकि अंततः जनता न सत्ता पक्ष के साथ स्थायी रूप से खड़ी होती है, न विपक्ष के साथ; वह केवल उन जनप्रतिनिधियों के साथ खड़ी होती है जो उसकी अपेक्षाओं, उसके टैक्स और उसके लोकतंत्र का सम्मान करते हैं। यही संसद की असली मर्यादा है और यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।

