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    Home » कोख की चोरी: जब डॉक्टर ही बन गए मासूमियत के दुश्मन
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    कोख की चोरी: जब डॉक्टर ही बन गए मासूमियत के दुश्मन

    Devanand SinghBy Devanand SinghFebruary 10, 2026No Comments3 Mins Read
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    कोख की चोरी
    कोख की चोरी
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    कोख की चोरी केवल एक अपराध नहीं, बल्कि हमारी चिकित्सा व्यवस्था और सामाजिक चेतना पर लगा गहरा प्रश्नचिह्न है।

    उत्तर प्रदेश (इंद्र यादव) प्रयागराज से आई नाबालिग लड़की के साथ हुई क्रूरता की खबर ने न केवल कानून व्यवस्था, बल्कि हमारी सामूहिक सामाजिक चेतना को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। एक 16 वर्षीय बच्ची का अपहरण, उसे नशे की हालत में अस्पताल ले जाना और फिर कागजी हेराफेरी के जरिए उसके शरीर से अंडाणु (Ova) निकाल लेना—यह पूरी प्रक्रिया किसी डरावनी फिल्म की पटकथा जैसी लगती है। लेकिन दुर्भाग्य से, यह हमारे ‘सभ्य’ समाज की कड़वी हकीकत है।

    चिकित्सा नैतिकता का अंत्येष्टि संस्कार !

    अस्पताल को समाज में ‘मंदिर’ और डॉक्टर को ‘भगवान’ का दर्जा दिया गया है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो समाज की नींव हिलना स्वाभाविक है। IVF जैसे आधुनिक उपचार, जो निःसंतान दंपत्तियों के जीवन में खुशियाँ भरने के लिए बने थे, अब चंद लालची हाथों में शोषण का औजार बन गए हैं। ART Act, 2021 के स्पष्ट प्रावधानों के बावजूद, एक नामी अस्पताल का इस घिनौने कृत्य में शामिल होना यह बताता है कि सफेद कोट के पीछे छिपी काली नीयत को कानून का कोई भय नहीं है।

    तकनीक बनाम संवेदना !

    हम तकनीकी रूप से जितने उन्नत हो रहे हैं, मानवीय संवेदनाओं के मामले में उतने ही दरिद्र होते जा रहे हैं। एक नया जीवन सृजित करने की चाहत में किसी दूसरे मासूम के जीवन और उसके भविष्य की प्रजनन क्षमता को दांव पर लगा देना किस तरह का पितृत्व सुख है? क्या उन दंपत्तियों ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की कि जिस माध्यम से वे माता-पिता बनने जा रहे हैं, वह वैध है? मांग और आपूर्ति का यह अनैतिक खेल मासूमों की बलि ले रहा है।

    तंत्र की विफलता और बढ़ता असुरक्षा बोध !

    फर्जी आधार कार्ड बनाना और उम्र की पुष्टि किए बिना सर्जिकल प्रक्रिया को अंजाम देना यह दर्शाता है कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं। यह घटना अभिभावकों के मन में एक गहरा डर पैदा करती है। अगर शहर के बीचों-बीच स्थित अस्पताल सुरक्षित नहीं हैं, तो बेटियाँ कहाँ सुरक्षित हैं? यह पुलिस प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की निगरानी समितियों के लिए एक चेतावनी है कि कागजी खानापूर्ति से बाहर निकलकर धरातल पर कड़े निरीक्षण किए जाएं।

    सामाजिक चिंतन की आवश्यकता !

    केवल गिरफ्तारी और अस्पताल का लाइसेंस रद्द करना पर्याप्त नहीं है। हमें एक समाज के रूप में खुद से सवाल पूछना होगा:
    क्या हम अंगों और कोशिकाओं के इस ‘अदृश्य बाजार’ को अपनी चुप्पी से मौन स्वीकृति दे रहे हैं!
    क्या गरीबी और लाचारी का फायदा उठाकर किया जाने वाला यह व्यापार हमारे विकास के दावों को नहीं चिढ़ाता !

    परिणाम !

    प्रयागराज की यह घटना सिस्टम की सड़न का एक छोटा सा हिस्सा मात्र है। यदि अब भी हम नहीं जागे, तो चिकित्सा विज्ञान का यह ‘वरदान’ अनैतिकता के हाथों ‘अभिशाप’ बन जाएगा। न्याय केवल आरोपियों को सजा देने में नहीं है, बल्कि एक ऐसा तंत्र बनाने में है जहाँ किसी दूसरी बेटी को अपनी गरिमा और स्वास्थ्य की आहुति न देनी पड़े।

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