केरल के मंदिर में ‘कझकम’ के कर्मचारियों ने ‘जातिगत भेदभाव’ के आरोपों के बीच इस्तीफा दिया
त्रिशूर के प्रसिद्ध कूडलमाणिक्यम मंदिर के एक ‘कझकम’ कर्मचारी ने जातिगत भेदभाव के आरोपों के बाद व्यक्तिगत कारणों का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया है। सूत्रों ने बुधवार को बताया कि बालू को राज्य द्वारा संचालित देवस्वओम भर्ती बोर्ड द्वारा ‘कझकम’ कार्य के लिए नियुक्त किया गया था। बालू ने मंगलवार शाम को देवस्वओम प्रशासक को अपना इस्तीफा सौंपा। ‘कझकम’ मंदिर में वरिष्ठताक्रम के अनुसार एक विशेष समूह होता है जिसे माला तैयार करने और अन्य औपचारिक कार्य सौंपा जाता है।
मंदिर की नौकरी से एझावा समुदाय के व्यक्ति के इस्तीफे ने एक बार फिर राज्य में खासकर मंदिरों में मौजूद कथित जातिगत भेदभाव के मुद्दे को सामने ला दिया है। इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए देवस्वओम मंत्री वी. एन. वासवन ने कहा कि बालू को सभी निर्धारित नियमों और मानदंडों के अनुसार भर्ती किया गया था।
उन्होंने मदुरै में मीडियाकर्मियों से कहा, ‘‘सरकार चाहती है कि वह (बालू) अपने पद पर बने रहें। हमने बालू को पहले ही सूचित कर दिया है कि सरकार उन्हें आवश्यक सहायता प्रदान करेगी। लेकिन, उन्होंने मंगलवार को अपना इस्तीफा दे दिया। मंत्री के अनुसार, बालू ने ‘कझकम’ कर्तव्यों से लिपिक पद पर स्थानांतरित होने पर काम जारी रखने की इच्छा व्यक्त की है।
विवादों के बाद छुट्टी पर गए कर्मचारी ने अपने त्यागपत्र में नौकरी छोड़ने के लिए व्यक्तिगत और स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया है। मंत्री ने यह भी आश्वासन दिया कि जब भी बालू कझकम पद पर आना चाहेंगे, सरकार उन्हें अवसर प्रदान करेगी। देवस्वओम भर्ती बोर्ड के एक अधिकारी ने स्पष्ट किया कि इस्तीफा व्यक्तिगत निर्णय है और बोर्ड का इससे कोई लेना-देना नहीं है।
देवस्वओम भर्ती बोर्ड के अध्यक्ष के. बी. मोहनदास ने इस मुद्दे पर मंदिर के तंत्रियों द्वारा अपनाए गए रुख की आलोचना की और कहा कि यह सभ्य समाज के लिए उचित नहीं है। हाल में बालू मंदिर में ‘कझकम’ के कर्तव्यों को संभालने के लिए आए थे, लेकिन ‘तंत्रियों’ (मुख्य पुजारियों) ने देवस्वओम बोर्ड के पास शिकायत दर्ज कराई, जिसमें कथित तौर पर कहा गया कि अगर उन्हें काम करने की अनुमति दी गई तो वे अपनी ज़िम्मेदारियों को नहीं निभाएंगे।
इसके बाद, बोर्ड के अधिकारियों ने उन्हें अस्थायी रूप से कार्यालय कर्तव्यों में फिर से नियुक्त किया। हालांकि, राज्य सरकार ने इस पर आपत्ति जताई थी और यह स्पष्ट किया था कि मौजूदा अधिनियमों और नियमों के अनुसार नियुक्त पिछड़े समुदाय के व्यक्ति को मंदिर में काम करने की अनुमति दी जानी चाहिए।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, मंदिर में ‘कझकम’ के दो पद हैं – एक ‘तंत्रियों’ द्वारा नियुक्त किया जाता है और दूसरा अधिनियमों और नियमों के अनुसार भरा जाता है। इरिनजालाकुडा में स्थित प्राचीन मंदिर भगवान राम के तीसरे भाई भगवान भरत को समर्पित केरल के कुछ मंदिरों में से एक है।