जोड़ा केंद्रीय अस्पताल कभी खनन श्रमिकों की उम्मीद था, आज उसकी हालत देखकर हर कोई स्तब्ध है। जोड़ा नगरपालिका क्षेत्र में स्थित यह ऐतिहासिक अस्पताल अपनी बदहाली के आँसू बहा रहा है। क्षेत्र के लोगों के लिए, यह केवल एक इमारत नहीं, बल्कि वर्षों की यादें और उम्मीदें समेटे हुए एक प्रतीक है, जो अब ढहने की कगार पर है। इसकी दुर्दशा न केवल स्वास्थ्य सेवाओं की कमी को उजागर करती है, बल्कि सरकारी उदासीनता की एक दर्दनाक कहानी भी बयाँ करती है।
जोड़ा केंद्रीय अस्पताल: एक गौरवशाली अतीत
स्थापना और उद्देश्य: इस अस्पताल का निर्माण वर्ष 1978 में केंद्र सरकार के श्रम मंत्रालय द्वारा विशेष रूप से खनन क्षेत्र के श्रमिकों के लिए किया गया था। यह एक 50 बिस्तरों वाला अस्पताल था, जो 13 एकड़ के विशाल परिसर में फैला हुआ था। इसका उद्देश्य उन हजारों श्रमिकों को तत्काल चिकित्सा सुविधा प्रदान करना था, जो इस खतरनाक पेशे में अपनी जान जोखिम में डालते थे।
व्यापक पहुँच: अस्सी के दशक में, जोड़ा केंद्रीय अस्पताल की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। केंदुझर, जाजपुर और सुंदरगढ़ के कोयडा सेक्टर के साथ-साथ मयूरभंज जिले के बदाम पहाड़ जैसे दूरस्थ स्थानों से भी श्रमिक और उनके परिवार इलाज के लिए यहाँ आते थे। यह उस समय क्षेत्र के लिए एक प्रमुख स्वास्थ्य केंद्र था।
सेवाओं का चरम: वर्ष 2018 तक, इस केंद्रीय अस्पताल के बाह्य विभाग (ओपीडी) में प्रतिदिन तीन से चार सौ तक मरीज इलाज के लिए आते थे। यह संख्या अपने आप में अस्पताल की महत्ता और सेवाओं की गुणवत्ता को दर्शाती थी। यहाँ सामान्य बीमारियों से लेकर गंभीर चोटों तक का इलाज उपलब्ध था, जिससे स्थानीय समुदाय को बहुत राहत मिलती थी।
वर्तमान दुर्दशा: एक भयावह तस्वीर
सेवाओं में गिरावट: बीते पाँच-छह वर्षों में, जोड़ा केंद्रीय अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाएँ पूरी तरह से चरमरा गई हैं। कभी मरीजों से गुलज़ार रहने वाला यह अस्पताल अब वीरान पड़ा है। इसकी दुर्दशा का मुख्य कारण सरकार और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता को बताया जा रहा है।
बंद वार्ड और जंग खाए उपकरण: अस्पताल में एक्स-रे मशीन, ईसीजी, इमरजेंसी वार्ड, मरीज भर्ती वार्ड सहित अन्य महत्वपूर्ण वार्डों में वर्षों से ताले लटके हुए हैं। संबंधित मशीनें और उपकरण जंग खा गए हैं, जिससे वे पूरी तरह से अनुपयोगी हो चुके हैं। कल्पना कीजिए, एक अस्पताल जहाँ आपातकालीन सेवाएँ भी उपलब्ध न हों, वह भला क्या काम आएगा?
कर्मचारियों की कमी: वर्तमान समय में, अस्पताल में केवल दो चिकित्सक और कुछ स्वास्थ्यकर्मी ही रह गए हैं। कभी कभार ही कुछ मरीज इलाज के लिए आते हैं, जिन्हें भी पूरी सुविधाएँ नहीं मिल पातीं। कर्मचारियों की कमी के कारण, अस्पताल अपनी बुनियादी जिम्मेदारियाँ भी पूरी करने में असमर्थ है।
जर्जर इमारत: बारिश हो जाने के बाद, अस्पताल की भवनों से अनेकों जगह से पानी टपकता रहता है। छतें और दीवारें टूट रही हैं, जो न केवल मरीजों के लिए, बल्कि वहाँ कार्यरत कर्मचारियों के लिए भी खतरनाक है। ऐसा लगता है मानो यह अस्पताल खुद अपने इलाज का इंतजार कर रहा हो।
सीमित संचालन: क्षेत्रवासियों का कहना है कि स्वास्थ्यकर्मी सुबह के वक्त अस्पताल आते तो हैं, परंतु दोपहर के बाद अस्पताल को बंद कर चले जाते हैं। यह स्थिति उन लोगों के लिए और भी निराशाजनक है, जिन्हें अचानक किसी चिकित्सा आपातकाल का सामना करना पड़ता है।
श्रमिकों की अनदेखी: एक मानवीय संकट
खनन क्षेत्र के जिन श्रमिकों के लिए यह अस्पताल बनाया गया था, आज वे ही सबसे अधिक प्रभावित हैं। उन्हें छोटी-मोटी चोट लगने या बीमारी होने पर भी दूर के अस्पतालों में जाना पड़ता है, जिससे समय और पैसे दोनों की बर्बादी होती है। यह उन हजारों परिवारों के स्वास्थ्य और सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है, जिन्होंने इस क्षेत्र के विकास में अपना योगदान दिया है। सरकार का कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों को मूलभूत स्वास्थ्य सेवाएँ प्रदान करे, खासकर उन मेहनतकश श्रमिकों को। आप भारत सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की वेबसाइट पर श्रमिकों के कल्याणकारी योजनाओं के बारे में और जान सकते हैं।
सुधार की अपील: क्या सरकार सुनेगी?
जोड़ा टाउनशिप के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस अस्पताल में सुधार के लिए कई प्रयास किए हैं। वर्ष 2024 के नवंबर महीने में, एक सामाजिक कार्यकर्ता ने केंदुझर सांसद अनंत नायक सहित राज्य के मुख्यमंत्री तथा केंद्रीय मंत्री को पत्र लिखकर जोड़ा केंद्रीय अस्पताल की बदहाली को दूर करने और उसे फिर से चालू करने की फरियाद की थी। लेकिन, अफसोस, इन अपीलों का कोई ठोस परिणाम देखने को नहीं मिला है।
आज यह प्रश्न सबके मन में है: क्या सरकार इस 13 एकड़ में फैले केंद्रीय अस्पताल में सुधार करेगी, या यह यूँ ही जंग खा-खाकर बर्बाद होता रहेगा? क्या जोड़ा केंद्रीय अस्पताल अपनी बदहाली का आँसू बहाता रहेगा, या इसे नया जीवन मिलेगा? यह क्षेत्रवासियों की उम्मीदों और सरकार की प्रतिबद्धता का एक बड़ा इम्तिहान है। समय आ गया है कि इस महत्वपूर्ण संस्थान को बचाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएँ।

