लेखक: राष्ट्रसंवाद, संवाददाता
चांडिल प्रखंड के आसनबनी गांव में सोमवार को आषाढ़ सप्तमी के अवसर पर पारंपरिक जाताल पूजा श्रद्धा एवं उत्साह के साथ संपन्न हुई। इस वर्ष भी ग्रामीणों ने अच्छी वर्षा, बेहतर फसल और क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना की। यह पूजा आदिवासी समाज की गहरी आस्था और प्रकृति के प्रति उनके सम्मान को दर्शाती है, जो सदियों से चली आ रही एक महत्वपूर्ण परंपरा का हिस्सा है। जाताल पूजा मुख्य रूप से कृषि प्रधान समाजों में मानसून के आगमन और आगामी फसल की समृद्धि के लिए की जाती है। यह त्योहार स्थानीय समुदायों के लिए केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक है।
पारंपरिक पुजारी उच्छप पहाड़िया और भूषण पहाड़िया ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर ग्राम देवता और पूर्वजों का स्मरण किया। इस विशेष अवसर पर, देवस्थल पर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई, जिसमें स्थानीय देवी-देवताओं और पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद किया गया। माना जाता है कि इन अनुष्ठानों से प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा होती है और गांव में खुशहाली बनी रहती है। मौके पर एक पाठा की बलि भी दी गई, जो पारंपरिक आदिवासी पूजा का एक अभिन्न अंग है और इसे ग्राम देवता को प्रसन्न करने तथा आशीर्वाद प्राप्त करने का माध्यम माना जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने देवस्थल पर माथा टेककर परिवार की खुशहाली की प्रार्थना की। गांव के सभी आयु वर्ग के लोग इस आयोजन में शामिल हुए, जो उनकी अटूट आस्था और सांस्कृतिक विरासत के प्रति समर्पण को दर्शाता है।
समाजसेवी दलमा टाइगर सुकलाल पहाड़िया ने इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आदिवासी परंपराएं केवल धार्मिक कृत्य नहीं हैं, बल्कि वे जीवन शैली का एक अभिन्न अंग हैं जो प्रकृति के प्रति सम्मान और सामाजिक एकजुटता को बढ़ावा देती हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि इन परंपराओं के माध्यम से लोग प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व में रहना सीखते हैं और एक दूसरे के प्रति सद्भाव बनाए रखते हैं। पूजा के बाद श्रद्धालुओं के बीच स्वादिष्ट खिचड़ी प्रसाद का वितरण किया गया, जो सामुदायिक भोजन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और सभी ग्रामीणों को एक साथ आने तथा खुशियां बांटने का अवसर प्रदान करता है। यह प्रसाद वितरण न केवल धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि सामाजिक समरसता को भी बढ़ावा देता है।
मौके पर फकीर सोरेन, मलिंद्र उरांव, गुरुचरण कर्मकार, कर्णराज प्रमाणिक, सोनू पहाड़िया, भमर पहाड़िया, जितू पहाड़िया और बैद्यनाथ सिंह सरदार समेत कई ग्रामीण उपस्थित थे। इन सभी गणमान्य व्यक्तियों और अन्य ग्रामीणों की उपस्थिति ने इस कार्यक्रम को और भी गरिमामय बना दिया। यह दिखाता है कि किस तरह पूरा गांव मिलकर अपनी सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखता है और आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी जड़ों से जोड़े रखता है।
जाताल पूजा का महत्व और अनुष्ठान
जाताल पूजा, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, ‘जात’ (जाति या समुदाय) और ‘ताल’ (भूमि या क्षेत्र) से संबंधित है, जिसका अर्थ है समुदाय और भूमि के लिए की जाने वाली पूजा। यह मुख्य रूप से आदिवासी समुदायों द्वारा खेती की शुरुआत से पहले या फसल के महत्वपूर्ण चरणों में की जाने वाली प्रार्थना है। इस पूजा का सबसे बड़ा महत्व कृषि उपज को बेहतर बनाना और प्राकृतिक तत्वों जैसे वर्षा, सूर्य और मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखना है। यह आदिवासियों के प्रकृति के साथ गहरे संबंध को दर्शाता है, जहाँ उन्हें जीवनदायिनी माना जाता है। झारखंड जैसे राज्यों में, जहाँ कृषि अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार है, ऐसी पूजाओं का सांस्कृतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से गहरा महत्व है। अनुष्ठानों में ग्राम देवता (जिन्हें ‘बोंगा’ या ‘ग्राम ठाकुर’ भी कहा जाता है) और पूर्वजों को विभिन्न प्रकार की सामग्री अर्पित की जाती है, जिनमें फूल, फल, अनाज और पशु बलि शामिल हैं। पुजारियों द्वारा मंत्रोच्चार और पारंपरिक गीतों के माध्यम से देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि फसलें बीमारियों और कीटों से सुरक्षित रहें तथा प्रचुर मात्रा में उपज दें।
प्रकृति संरक्षण और सामुदायिक सौहार्द का प्रतीक
आदिवासी परंपराएं सिर्फ धार्मिक रीति-रिवाज नहीं हैं, बल्कि वे जीवन शैली का एक अभिन्न अंग हैं जो प्रकृति के प्रति सम्मान और सामाजिक एकजुटता को बढ़ावा देती हैं। जाताल पूजा इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इस पूजा के माध्यम से समुदाय के सदस्य न केवल अच्छी फसल की कामना करते हैं, बल्कि वे एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करने, साझा करने और समर्थन करने की भावना को भी मजबूत करते हैं। सुकलाल पहाड़िया जैसे सामुदायिक नेताओं का मानना है कि ये परंपराएं आधुनिक समाज में भी प्रासंगिक हैं क्योंकि वे हमें प्रकृति के संसाधनों का सावधानीपूर्वक उपयोग करने और अपने पर्यावरण की रक्षा करने का महत्व सिखाती हैं। सामूहिक भोज, जैसे कि खिचड़ी प्रसाद का वितरण, सामाजिक असमानताओं को मिटाता है और सभी को एक समान स्तर पर लाता है, जिससे आपसी भाईचारा और सौहार्द बढ़ता है। यह त्योहार एक ऐसा मंच प्रदान करता है जहाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज्ञान और मूल्य हस्तांतरित होते हैं, जिससे सांस्कृतिक विरासत की निरंतरता सुनिश्चित होती है। [INTERNAL_LINK_HOLDER]
चांडिल क्षेत्र में आदिवासी परंपराओं का भविष्य
चांडिल प्रखंड, जो कि सरायकेला-खरसावां जिले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, अपनी समृद्ध आदिवासी संस्कृति और परंपराओं के लिए जाना जाता है। जाताल पूजा जैसी प्रथाएं इस क्षेत्र की पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। हालाँकि, आधुनिकीकरण और शहरीकरण के बढ़ते प्रभाव के साथ, इन प्राचीन परंपराओं को संरक्षित करने की चुनौती भी सामने आ रही है। स्थानीय समुदायों और सरकारी निकायों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे इन सांस्कृतिक धरोहरों को बढ़ावा देने और उन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवित रखने के लिए मिलकर काम करें। जागरूकता कार्यक्रम, सांस्कृतिक उत्सव और शैक्षणिक पहल इन परंपराओं के महत्व को उजागर करने और उन्हें नई पीढ़ियों के बीच लोकप्रिय बनाने में मदद कर सकते हैं। इन परंपराओं का संरक्षण न केवल आदिवासी समुदाय के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह समग्र भारतीय संस्कृति की विविधता और समृद्धि को भी बढ़ाता है। भविष्य में, इन प्रथाओं को और अधिक सशक्त बनाने के लिए स्थानीय प्रशासन और गैर-सरकारी संगठनों के सहयोग की आवश्यकता होगी, ताकि ये सांस्कृतिक मूल्य समय की कसौटी पर खरे उतर सकें और समाज को प्रकृति से जोड़े रखें।

