प्रणव का उपहार मैं हूं सृजन का त्यौहार मै हूं
प्रणव का उपहार मैं हूं
सृजन का त्यौहार मैहूं
हो अगर अन्याय तो मैं
क्रोध की ज्वाला अनल हूं।
चरण में शिव धाम लेकर
भैरवी काली प्रबल हूं।
मृदुल हूं मैं पांखुरी सी
सोम गंगा धार हूं मैं।।
प्राण सर की तरलता में
मैं जलज शतदल खिली हूं।
अहम् से जो जल रहे हैं
लेप बन उनसे मिली हूं ।
मखमली चादर बिछाती
गेह का सत्कार हूं मैं।।
गोद में जीवन समेटे
मैं प्रफुल्लित भी रही हूं।
और ममता नित समर्पित
मैं शहीदों की मही हूं।
राखियां सिन्दूर अर्पित
राष्ट्र का आधार हूं मैं।।
भावना हूं कामना हूं
श्रेष्ठतम की याचना हूं
युद्ध भूमि की पताका
तपोवन की साधना हूं
साम की पावन ऋचा मैं
अखिल मन का सार हूं मैं।।
डॉ रागिनी भूषण