देवानंद सिंह
चुनाव का समय है। आपकी, हमारी पूछ बढ़नी शुरू हो गई है। खूब लुभावने वायदे, जुमले सुनने को मिलने शुरू हो गए हैं। कोई कहता है कि बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट, एक बिहारी सब पर भारी, बिहार IAS की फैक्ट्री है, बिहारी बहुत मेहनती होते हैं, बिहार लोकतंत्र की जननी है, बिहार का इतिहास बहुत ही गौरवपूर्ण रहा है आदि आदि।
आपको लगता है कि क्या इस तरह के जुमलों, वायदों से हर बिहारी को झूमना शुरू कर देना चाहिए ? क्या अपनी-अपनी नाप वाला 56 इंच का सीना तानकर हर बिहारी को इस चुनावी मौसम में कसीदे पढ़ने शुरू कर देने चाहिए ? सच कहें तो कृपया इसे गाली के इतर कुछ भी मत समझिए। इन जुमलों पर अगर आप झूमते हैं, तो आपकी चेतना जा चुकी है।
आप सोचिए, कल सारा देश बिहार पर ही अपनी उँगली उठायेंगे और कहेंगे, तुम नालायक़ों की वजह से हम आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। वैसे अगर आपके पास कान है और थोड़ी भी चेतना बची है तो आप इसकी प्रतिध्वनि सुनने भी लगे होंगे। देश के विभिन्न राज्यों से बिहारियों के ख़िलाफ़ उठनेवाले स्वर इसी के उदाहरण हैं।
कभी आपने इस बात पर गौर किया है कि बिहार के बाहर अन्य राज्यों के लोगों में अधिकांश आपके प्रति क्यों सहानुभूति रखते हैं ? सहानुभूति कोई सकारात्मक शब्द नहीं है। अमूमन सहानुभूति उससे होती है जिसकी या तो दुर्गति हो रही होती है या फिर हो चुकी होती है। केरल, महाराष्ट्र या तमिलनाडु के लोगों के प्रति वैसी आम सहानुभूति नहीं दिखाई जाती क्योंकि उनकी माली हालत हम बिहारियों से हज़ार गुनी अच्छी है। हर तरह से वे हमसे बेहतर हैं।
मुगालते में नहीं रहें कि आप यानी बिहारी दूसरे राज्यों की जरूरत हैं। उनके बिना उन राज्यों का विकास संभव ही नहीं है। यह सब कुछ इन चुनावों में भी दोहराया जाएगा और आपको, हमको अहसास दिलाने की हर संभव कोशिश की जाएगी आप पूरे देश के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं। लेकिन आपको हकीकत पर ध्यान देना चाहिए। सबसे पहले यह ज़रूरी है कि आप यह मानना शुरू कर दें कि वास्तव में आपकी स्थिति कैसी है ? और हां जब आप सही में खुद का आंकलन करेंगे तो महसूस करेंगे कि यह वैसी तो एकदम नहीं है जैसी आप सब समझ रहे हैं। आप जीवन के हर क्षेत्र में अपने ही देश में सबसे निचले पायदान पर पड़े हैं।
अब आप पूछेंगे कि अभी इस तरह का ज्ञान क्यों दिया जा रहा है। हां, बिल्कुल ठीक आप कह रहे हैं। जरूरी नहीं है कि चुनाव आपकी और हमारी सभी समस्याओं को सुलझा दे। पर यह ऐसे लोगों को जरूर आपकी सेवा में ला सकता है जो आपकी समस्या को ठीक से समझ रहा है और उससे आपको उबारने की मंशा उनमें है। कुछ पैसे वालों की चमकदार स्थिति पूरे बिहारियों का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। देश में हमारी और आपकी यानी बिहारियों की स्थिति क्या है उसकी एक संक्षिप्त बानगी पर गौर करें।
बिहार को सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) की दृष्टि से देखें तो देश में उसका स्थान 28 राज्यों में 14वां है। वहीं देश की 9% जनसंख्या वाले राज्य का देश के सकल घरेलू उत्पाद में योगदान 2% से भी कम है। नतीजतन बिहार की 15.73% जनसंख्या ग़रीबी रेखा से नीचे है। यहाँ की प्रति व्यक्ति आय (2023-24) ₹ 59,637 है जबकि राष्ट्रीय औसत ₹1,72000 है।
इतना ही नहीं, बेरोज़गारी की दर बिहार में क़रीब 13% है। 15-29 साल के लोगों में बेरोज़गारी यहाँ 30% से भी अधिक है। और यह राष्ट्रीय औसत से तीन गुना है। वहीं वर्क फ़ोर्स में महिलाओं की भागीदारी बिहार में 10% से भी कम है।
सामाजिक दृष्टि से देखें तो बिहार की क़रीब 60% जनसंख्या 25 साल से कम उम्र के लोगों की है। बिहार में जन्म दर देश में सबसे अधिक है। बिहार में 71.2% पुरुष और 51.5% महिलाएँ साक्षर हैं (2011 की जनगणना के अनुसार)। बड़ी संख्या में लड़कियों की शादी अभी भी 18 वर्ष से कम उम्र में हो जाती है। वहीं साक्षरता दर की बात करें तो बिहार में साक्षरता दर सबसे कम है। यहां साक्षरता दर 63.82 फीसदी है। सबसे कम साक्षरता के मामले में बिहार का नम्बर नीचे से अरुणाचल प्रदेश और राजस्थान के बाद आता है।
बुनियादी सुविधाओं की भी यहां काफी कमी रही है। हर साल बाढ़ से लाखों लोग प्रभावित होते हैं और उन्हें भारी नुक़सान उठाना पड़ता है। एक अनुमान के मुताबिक 73.63 फीसदी लोग यानी तीन चौथाई लोग हर साल बाढ़ की विभीषिका और उसके दंश को झेलते हैं वहीं स्वच्छता सर्वेक्षण में भी बिहार के कई शहर औसत से भी काफी नीचे हैं। इसे दूसरे शब्दों में अगर कहा जाए तो बिहार के कई शहर सबसे गंदे शहरों में शामिल हैं। ऐसे ही बिहार के प्रमुख एक शहर सहरसा की बात करें तो उसे सबसे गंदे शहर की सूची में पिछले दिनों रखा गया था।
2024 और 2025 के नवीनतम आंकड़ों और रिपोर्टों के अनुसार बिहार की स्थिति कई सामाजिक आर्थिक मापदंडों पर चिंताजनक बनी हुई है जो राज्य के बदतर हालात को पुष्ट करते हैं। ग़रीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और कानून व्यवस्था जैसे क्षेत्रों में बिहार को काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
2025 की वेदांतु की एक रिपोर्ट के अनुसार बिहार प्रति व्यक्ति आय और गरीबी दूर के मामले में भारत का सबसे गरीब राज्य माना गया है।
2024 की इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में नीति आयोग के आंकड़ों का हवाला देते हुए बहुआयामी गरीबी वाले लोगों की संख्या सबसे ज्यादा बिहार में बताई गई थी जहां 2022-23 में 26.59 फीसदी आबादी इस श्रेणी में गरीब थी।
साक्षरता के मामले में बिहार के लोग कहां खड़े हैं इसकी एक बानगी प्राडक्टिव लेबर फोर्स सर्वे 2023-24 के आंकड़ों से भी मिलती है जिसमें साफ साफ बताया गया है कि बिहार उन राज्यों में है जहां सबसे कम साक्षरता दर है। स्कूलों में भी कम नामांकन हैं। 2025 की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि माध्यमिक स्तर पर बिहार में नामांकन दर 27.8 फीसदी है जो अन्य राज्यों की तुलना में बहुत ही कम है।
इतना ही नहीं, बिहार में बुनियादी ढांचे का अभाव है। बिहार के पास कमजोर शैक्षिक बुनियादी ढांचा है जो बढ़ती आबादी के लिए मांग और आपूर्ति के बीच एक बड़ा अंतर पैदा करता है। कमोबेश स्वास्थ्य सेवाओं का भी यही हाल है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की नवम्बर 2024 में जारी रिपोर्ट में भी बिहार की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की गंभीर स्थिति पर प्रकाश डाला गया है। डाक्टरों की भारी कमी का जिक्र किया गया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रति व्यक्ति एक हजार लोगों पर एक डाक्टर की सिफारिश के विपरीत नवम्बर 2024 तक बिहार में प्रति 2148 लोगों पर एक एलोपैथिक डाक्टर था। नीति आयोग के चौथे स्वास्थ्य सूचकांक (2021) में बड़े राज्यों के बीच समग्र स्वास्थ्य प्रदर्शन के मामले में बिहार दूसरे सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले राज्य के रूप में उभर कर सामने आया था।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि बिहार को गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे प्रमुख चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है जो राज्य की बद से बद्तर स्थिति को दर्शाता है। इसलिए बिहार फर्स्ट बिहारी फर्स्ट, एक बिहारी सब पर भारी जैसे जुमलों को सुनकर इतराने की जरूरत नहीं बल्कि हकीकत को जानकर उसमें सुधार लाने की जरूरत है।

