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    Home » कोल्हान की धरती, हल और लोकआस्था का पर्व, गोम्हां
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    कोल्हान की धरती, हल और लोकआस्था का पर्व, गोम्हां

    News DeskBy News DeskAugust 27, 2026No Comments3 Mins Read
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    मृत्युंजय बर्मन

    राष्ट्र संवाद संवाददाता, सरायकेला

     

    झारखंड में सावन की पूर्णिमा केवल रक्षाबंधन तक सीमित नहीं है। कोल्हान के ग्रामीण जीवन में इसी दिन गोम्हां पर्व मनाने की पुरानी परंपरा है। इसकी खासियत यह है कि अलग-अलग समुदायों में इसके स्वरूप और अनुष्ठान भले अलग हों, लेकिन इसकी आत्मा एक ही है, धरती, खेती, पशुधन और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता।

     

    लोकपरंपराओं से संकेत मिलता है कि इसकी जड़ें कृषि-आधारित जीवन में हैं। सावन पूर्णिमा तक धान की रोपाई पूरी होने और फसल के बढ़ने के समय किसान धरती को विश्राम देने, अच्छी फसल की कामना करने तथा खेती में सहयोगी पशुधन के प्रति सम्मान प्रकट करता है।

     

    संताल समाज में गोम्हां की अपनी विशिष्ट पहचान है। कई क्षेत्रों में इसे करम देवता और अच्छी फसल की कामना से जोड़ा जाता है। करम डाली को अखड़ा में स्थापित कर पूजा, मांदर की थाप और सामूहिक नृत्य-गान की परंपरा रही है। रिंझा और डंठा जैसे लोकनृत्य इसकी सामुदायिक जीवंतता को दर्शाते हैं। काड़ो-कुइली की लोककथा से गोमहा के दिन खेत में काम न करने और बच्चों को कृषि कार्य से दूर रखने जैसी लोकमान्यताएं भी जुड़ी हैं।

     

    कुड़मी, गौड़ और अन्य कृषक समुदायों में गोम्हा का संबंध धरती माता और कृषि से मिलता है। इस दिन खेती से विराम लेकर धरती के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है। वहीं पूर्वी सिंहभूम के बहरागोड़ा क्षेत्र में गाय-बैल पूजा इसकी प्रमुख विशेषता है। पशुओं को स्नान कराया, सजाया और पूजा की जाती है तथा घर में बने पीठे खिलाये जाते हैं। यह उस कृषि-संस्कृति की याद है, जिसमें बैल किसान का केवल पशु नहीं, बल्कि खेत का सहचर था।

     

    सरायकेला-खरसावां में गोम्हा का एक अलग धार्मिक आयाम दिखाई देता है। यहां कुछ ओड़िया परिवार इसे भगवान बलराम के जन्मोत्सव से जोड़ते हैं। घरों की दीवारों पर बलराम के साथ हल, गाय, बैल और बछड़े के चित्र बनाने की परंपरा कृषि और धार्मिक आस्था के सुंदर मेल को दर्शाती है। खरसावां के हरिभंजा में बलदेव जन्मोत्सव भी इसी दिन मनाया जाता है।

     

    रक्षाबंधन जहां भाई-बहन के रिश्ते और रक्षा-सूत्र का पर्व है, वहीं गोम्हा मनुष्य और धरती, किसान और पशुधन तथा प्रकृति और जीवन के संबंध का पर्व है।

     

    शिक्षाविद् सह झामुमो नेता प्रो केपी सोरेन कहते हैं “बदलती कृषि व्यवस्था और आधुनिक जीवनशैली के दौर में गोम्हा हमें उस लोकदर्शन की याद दिलाता है, जिसमें अन्न देने वाली धरती को माता, पशुधन को सहचर और प्रकृति को जीवन का आधार माना गया। यही कारण है कि गोम्हा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि झारखंड की कृषि-स्मृति, लोकपरंपरा और प्रकृति के साथ सहजीवी संबंध का जीवंत दस्तावेज है।”

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