लेखक: हिम्मत लाल महतों
गोम्हा पूनी यानी सावन महीने का अंतिम दिन और पूर्णिमा। आदिवासी समाज के लिए यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि खेती, प्रकृति, पशुधन और सामुदायिक जीवन से जुड़ी ऐसी परंपरा है, जिसमें एक पूरे जीवन-दर्शन की झलक मिलती है। लेकिन आज सवाल यह है कि गोम्हा पूनी बच रही है या धीरे-धीरे उसके ऊपर दूसरी संस्कृतियों, बाजार और धार्मिक प्रभावों की परतें चढ़ती जा रही हैं?
गोम्हा पूनी: बदलता मौसम और खेती का चक्र
परंपरागत रूप से गोम्हा पूनी तक खेतों में रोपा-रोपने का काम लगभग पूरा हो जाता था और फसल बढ़ने की स्थिति में पहुंचने लगती थी। लेकिन मौसम का बदलता मिजाज, समय पर बारिश नहीं होना और जलवायु परिवर्तन खेती के इस पारंपरिक चक्र को भी प्रभावित कर रहे हैं। जो ऋतु कभी किसान के अनुभव और प्रकृति के संकेतों से पहचानी जाती थी, वह अब अनिश्चित मौसम के सामने असहाय दिखाई देती है।
बचपन की स्मृतियों में सामुदायिक ऊर्जा
बचपन की स्मृतियों में गोम्हा पूनी का एक अलग ही रंग था। गांव-घर के चारों ओर साफ-सफाई होती थी। घरों में उत्साह रहता था। वातावरण में एक ऐसी सामुदायिक ऊर्जा महसूस होती थी, जो आज धीरे-धीरे कम होती जा रही है। यह सफाई केवल घर को साफ करने की प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि प्रकृति और अपने परिवेश के प्रति जिम्मेदारी का सामुदायिक संस्कार था।
मवेशियों के प्रति आदिवासी समाज का व्यवहार
इस पर्व का सबसे सुंदर पक्ष मवेशियों के प्रति व्यवहार में दिखाई देता है। दिनभर खेत और जंगल में चरने के बाद जब मवेशी घर लौटते हैं तो उनके पैर और सींग धोए जाते हैं, शरीर पर तेल लगाया जाता है और महुआ सहित विभिन्न अनाजों से तैयार दाना खिलाया जाता है। यह दृश्य बताता है कि आदिवासी जीवन में पशु केवल उपयोग की वस्तु नहीं थे। वे कृषि, परिवार और जीवन-व्यवस्था के सहभागी थे।
मनुष्य और पशु के बीच इस रिश्ते को आधुनिक नजरिए से देखने पर शायद यह केवल एक रस्म लगे, लेकिन वास्तव में यह सहजीवन की ऐसी अवधारणा है जिसमें मनुष्य स्वयं को प्रकृति से अलग नहीं मानता। यही आदिवासी जीवन-दर्शन की मूल शक्ति है।
गोम्हा पूनी की परंपराएं और चुनौतियां
लेकिन इसी सांस्कृतिक परिदृश्य में अब एक दूसरा दृश्य भी दिखाई देता है। गोम्हा पूनी के साथ रक्षा बंधन का प्रभाव बढ़ता गया। बाजार ने इसमें अपनी भूमिका निभाई। कभी साधारण धागे और स्थानीय परंपराओं के माध्यम से निभाई जाने वाली रस्में अब बाजार में बिकने वाली राखियों और उपभोक्तावादी संस्कृति का हिस्सा बन गई हैं। परिणाम यह है कि नई पीढ़ी के लिए गोम्हा पूनी की अपनी पहचान कमजोर होती जा रही है और रक्षा बंधन अधिक परिचित होता जा रहा है।
यहां सवाल रक्षा बंधन मनाने या किसी दूसरे पर्व को अपनाने का नहीं है। सवाल यह है कि क्या किसी समुदाय को अपनी मूल सांस्कृतिक स्मृतियों की कीमत पर दूसरे सांस्कृतिक प्रतीकों को स्वीकार करना चाहिए? सांस्कृतिक आदान-प्रदान स्वाभाविक है, लेकिन जब आदान-प्रदान एकतरफा हो और उसमें मूल परंपराएं पीछे छूटती जाएं, तब उसे केवल सामान्य बदलाव कहकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत भी ऐसी परंपराओं के संरक्षण पर जोर देती है।
धार्मिक प्रभाव और प्रतीकों का परिवर्तन
गोम्हा पूनी के दिन शिवलिंग पर जल चढ़ाने की बढ़ती प्रवृत्ति भी इसी बदलाव का एक उदाहरण है। सावन और पूर्णिमा के धार्मिक संदर्भ के कारण कुछ आदिवासी परिवारों में यह परंपरा दिखाई दे सकती है, लेकिन इसे आदिवासी समाज की मूल और सार्वभौमिक मान्यता मान लेना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। बाहरी धार्मिक प्रभावों ने अनेक स्थानीय परंपराओं को प्रभावित किया है और कई जगहों पर मूल प्रतीकों का स्थान दूसरे प्रतीकों ने लेना शुरू किया है।
दूसरी तरफ ईसाई धर्म अपनाने वाले कुछ आदिवासी परिवारों में पारंपरिक भाख खूंटा की जगह क्रॉस लगाया जाना भी इसी व्यापक सांस्कृतिक परिवर्तन का उदाहरण है। प्रार्थना की भावना अलग नहीं हुई, लेकिन प्रतीक बदल गया। सवाल फिर वही है—क्या प्रतीक के साथ उससे जुड़ी ऐतिहासिक स्मृति भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी?
सांस्कृतिक स्वायत्तता की चुनौती
आदिवासी समाज के सामने आज चुनौती किसी एक धर्म से लड़ने की नहीं है। असली चुनौती अपनी सांस्कृतिक स्वायत्तता और ऐतिहासिक स्मृति को बचाने की है। हिंदूकरण हो, ईसाईकरण हो या बाजारवाद—जब कोई बाहरी प्रभाव स्थानीय प्रतीकों, पर्वों और मान्यताओं को विस्थापित करता है, तब उसके साथ एक समुदाय की स्मृति भी कमजोर होती है।
विडंबना यह है कि सांस्कृतिक विस्थापन अक्सर दिखाई नहीं देता। पहले दिमाग में नए प्रतीक और नई मान्यताओं को श्रेष्ठ साबित किया जाता है, फिर पुराना प्रतीक अप्रासंगिक लगने लगता है और अंततः उसे छोड़ देना स्वाभाविक प्रतीत होता है। विस्थापन तब पूरा हो जाता है जब विस्थापित व्यक्ति को अपने विस्थापन का एहसास तक नहीं रहता।
गोम्हा पूनी: पहचान बचाने का अवसर
इसीलिए गोम्हा पूनी को केवल एक पुराने आदिवासी पर्व के रूप में देखना भूल होगी। यह सवाल पूछने का अवसर है कि विकास और आधुनिकता के बीच आदिवासी समाज अपनी पहचान को कैसे बचाएगा। अपनी परंपराओं को बचाने का अर्थ अतीत में लौटना नहीं है। इसका अर्थ है अपनी जड़ों को समझना और यह तय करना कि बदलाव के बीच क्या स्वीकार करना है और क्या बचाकर रखना है।
गोम्हा पूनी में खेत हैं, फसल है, मवेशी हैं, महुआ है, गांव की सफाई है और सामुदायिक जीवन है। सबसे बढ़कर इसमें मनुष्य और प्रकृति के बीच वह रिश्ता है, जिसे आधुनिक सभ्यता लगातार खोती जा रही है।
अगर गोम्हा पूनी के साथ उसकी स्मृति, उसके प्रतीक और उसका जीवन-दर्शन भी खो गया, तो केवल एक पर्व नहीं मिटेगा—आदिवासी इतिहास का एक जीवित पन्ना मिट जाएगा।

