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    Home » ईंधन मूल्य वृद्धि: राजनीति नहीं, आत्ममंथन की जरूरत
    कारोबार राजनीति राष्ट्रीय संपादकीय

    ईंधन मूल्य वृद्धि: राजनीति नहीं, आत्ममंथन की जरूरत

    Nikunj GuptaBy Nikunj GuptaMay 24, 2026No Comments3 Mins Read
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    ईंधन मूल्य वृद्धि
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    लेखक: देवानंद सिंह

    देश में पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी ने आम लोगों की चिंता जरूर बढ़ाई है। 10 दिनों के भीतर पेट्रोल और डीजल के दाम लगभग पांच रुपये प्रति लीटर तक बढ़ चुके हैं, जबकि सीएनजी भी चार रुपये प्रति किलो महंगी हो गई है। स्वाभाविक है कि इसका असर परिवहन, महंगाई और घरेलू बजट पर पड़ेगा। लेकिन इस पूरे मुद्दे को केवल राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय वैश्विक परिस्थितियों और आर्थिक वास्तविकताओं के संदर्भ में समझना अधिक जरूरी है।

    वैश्विक परिस्थितियां और भारत

    पश्चिम एशिया में जारी तनाव, विशेषकर ईरान-इजराइल संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट ने पूरी दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था को प्रभावित किया है। कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। ऐसे में दुनिया के अधिकांश देशों में ईंधन कीमतों में भारी उछाल देखने को मिला है। भारत भी इससे अछूता नहीं रह सकता था, क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है।

    सरकार के प्रयास और संतुलन

    फिर भी यह तथ्य उल्लेखनीय है कि भारत में ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी अपेक्षाकृत नियंत्रित रही है। सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने लंबे समय तक बढ़ती लागत का बोझ स्वयं उठाया। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार तेल कंपनियां अब भी प्रतिदिन सैकड़ों करोड़ रुपये का नुकसान उठा रही हैं। यदि वैश्विक बाजार के अनुरूप पूरी कीमत उपभोक्ताओं पर डाल दी जाती, तो हालात कहीं अधिक कठिन हो सकते थे।

    यह भी ध्यान देने योग्य है कि मार्च 2024 में केंद्र सरकार ने लोकसभा चुनाव से पहले पेट्रोल और डीजल पर दो रुपये प्रति लीटर की राहत दी थी। अब जब वैश्विक संकट गहराया है, तब कुछ चरणों में मूल्य समायोजन किया गया है ताकि अचानक बड़ा झटका न लगे। यह संतुलन साधने का प्रयास है।

    विपक्ष की भूमिका और आत्ममंथन

    ऐसे समय में विपक्ष का दायित्व केवल आलोचना करना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय परिस्थिति को समझते हुए रचनात्मक सुझाव देना भी होना चाहिए। यदि अंतरराष्ट्रीय संकट के बीच भारत अपेक्षाकृत नियंत्रित स्थिति में है, तो इसके पीछे आर्थिक प्रबंधन और ऊर्जा नीति की भूमिका को भी स्वीकार करना होगा। केवल राजनीतिक लाभ के लिए भय और भ्रम का वातावरण बनाना समाधान नहीं है।

    विपक्ष को आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या हर राष्ट्रीय और वैश्विक संकट को केवल सरकार विरोध का अवसर बना देना उचित है। जनता आज तथ्यों को समझती है और यह भी जानती है कि वैश्विक तेल संकट का असर हर देश पर पड़ा है। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, विपक्ष और समाज — सभी मिलकर ऊर्जा संरक्षण, वैकल्पिक संसाधनों और आर्थिक अनुशासन की दिशा में सकारात्मक सोच विकसित करें।

    महंगाई चिंता का विषय है, लेकिन संकट की इस घड़ी में संतुलित दृष्टिकोण और जिम्मेदार राजनीति की भी उतनी ही आवश्यकता है।

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