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    किसान आंदोलन : किसानों की भलाई की मंशा कम, सियासत ज्यादा

    Devanand SinghBy Devanand SinghFebruary 17, 2024No Comments4 Mins Read
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    किसान आंदोलन : किसानों की भलाई की मंशा कम, सियासत ज्यादा

    देवानंद सिंह

     

    दिल्ली-एनसीआर और आसपास के इलाकों में रहने लोग फिर से करीब तीन साल पहले वाली अव्यवस्था की कल्पना करके सहमे हुए हैं। देश के कई राज्यों से फिर से किसानों को दिल्ली कूच करने का आह्वान किया गया है। 16 फरवरी को राष्ट्रव्यापी बंद का एलान किया गया, जिसकी वजह से रास्ते बंद रहे, इंटरनेट पर पाबंदी लगी रही, कारोबार ठप हो रहा। किसान अपनी मांग उठाएं, विरोध करें, इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन इसके पीछे मंशा क्या है, ये देखने की सख्त जरूरत है। क्या मंशा वाकई में किसानों की भलाई है? गरीब किसान को फायदा पहुंचाने के लिए है? या इस आंदोलन का मकसद चुनाव से पहले मोदी सरकार को बदनाम करने की है?

     

     

     

    दरअसल, 2020-21 के किसान आंदोलन को भी मोदी सरकार को यूपी विधानसभा चुनावों के मुहाने पर आकर किसी तरह से समाप्त करवाने को मजबूर होना पड़ा था। अप्रैल-मई में देश आम चुनावों के लिए तैयार हो रहा है और यह केंद्र सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनने वाला है। किसान संगठन केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी दर्जा देने की मांग कर रहे हैं, जिस तरह से यह आंदोलन हो रहा है, वह एक
    विश्वव्यापी ट्रेंड बनकर उभरा है। भारत जी नहीं, यूरोप के देशों से लेकर अमेरिका तक में किसानों के आंदोलन और चुनाव का सीधा तालमेल देखा जा रहा है, इसी ग्लोबलाइजेशन के युग में भारत भी इससे अछूता नहीं है।

     

     

    इसीलिए तथ्य यह है कि किसान संगठनों को भी पता है कि लोकसभा चुनाव सामने हैं और मोदी सरकार पर प्रेशर बनाने के लिए इससे बेहतर मौका हो नहीं हो सकता। यूपी और पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले मोदी सरकार के सामने क्या मजबूरी थी, उन्हें इसका अंदाजा लग चुका है।
    आंदोलनकारी किसानों की मांगों में भी इस बार बढोतरी हो गई है, जैसे कि एमएसपी की कानूनी गारंटी दी जाए और इसके लिए कानून बनाया जाए। स्वामीनाथन कमिटी की सिफारिशों को लागू किया जाए। किसानों और कृषि मजदूरों को पेंशन दी जाए। विश्व व्यापार संगठन से भारत निकल जाए।

     

     

     

    2013 के भूमि अधिग्रहण कानून को फिर से लागू किया जाए। पिछली बार आंदोलन तीन कृषि कानूनों को वापस लेने को लेकर था। संसद से पास होने के बावजूद सरकार ने कृषि कानूनों को लागू करने को टाल दिया था फिर भी किसान आंदोलन पर अड़े रहे।
    सरकार किसानों की पिछली बार की ज्यादतियों को भूली नहीं है । उस समय देश की राजधानी को आंदोलन के नाम पर तकरीबन एक साल तक बंधक बनाकर रखा गया था । सड़कों पर किसानों ने तंबू कनात तो टांग रखे ही थे, कुछ जगहों पर पक्के निर्माण तक कर दिए। स्थानीय लोगों को असुविधा होती रही। आधे घंटे की दूरी तय करने में तीन-तीन घंटे झेलने पड़ रहे थे। स्कूली बच्चों को दिक्कतें, आम लोगों को दिक्कतें, बीमार लोगों को दिक्कतें। हालत ये थी कि मेडिकल इमर्जेंसी की स्थिति में मरीज की जान जाने का जोखिम कई गुना बढ़ चुका था क्योंकि किसान सड़कें घेरकर आंदोलन कर रहे थे।हत्या, रेप, हिंसा,किसान आंदोलन के दौरान क्या-क्या नहीं हुआ। आंदोलन के नाम पर अराजकता का नंगा नाच दिखा।

     

     

    फिलहाल, केंद्र की मोदी सरकार चुनावी साल में इस संकट से उबरने के लिए दो मोर्चे पर काम कर रही है। एक तो केंद्र के वरिष्ठ मंत्रियों को तमाम किसान संगठनों से बातचीत में लगाया है। क्योंकि, सरकार मानकर चल रही है कि किसी भी समस्या का हल आखिरकार बातचीत से ही निकाला जा सकता है।

     

     

    दूसरी तरफ दिल्ली की सीमाओं पर पिछली बार जैसी परिस्थितियां पैदा न होने पाएं, उसके लिए तमाम एहतियाती उपाय किए गए हैं। पड़ोसी राज्यों को दिल्ली से जोड़ने वाली तमाम सीमाओं, जैसे कि सिंघू, शंभू, टिकड़ी और गाजीपुर बॉर्डरों पर जोरदार बैरिकेडिंग की गई है। तंबू गाड़ने की इजाजत नहीं दी जा रही है, लेकिन देखने वाली बात होगी कि आखिर मोदी सरकार किसानों को मनवाने में कब तक सफल हो पाती है।

     

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