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    Home » वट सावित्री व्रत 10 जून 2021 को, जानिए पूजन विधि के साथ शुभ मुहूर्त
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    वट सावित्री व्रत 10 जून 2021 को, जानिए पूजन विधि के साथ शुभ मुहूर्त

    Devanand SinghBy Devanand SinghJune 9, 2021No Comments7 Mins Read
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    इसे सुहागिन महिलायें अपने अखंड सौभाग्य के लिए रखती हैं.

    यह व्रत हर साल ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि के दिन रखा जाता है.
    वट सावित्री व्रत अखंड सौभाग्य की कामना और संतान प्राप्ति की दृष्टि से बहुत ही शुभ फलदायी होता है.

    साल 2021 में वट सावित्री व्रत 10 जून को रखा जाएगा.

    शुभ मुहूर्त व्रत तिथि:- 10 जून 2021 दिन गुरुवार अमावस्या प्रारंभ : 9 जून 2021 को दोपहर 01: बजकर 10 मिनट से प्रारम्भ है.

    अमावस्या समाप्त:- 10 जून 2021 को शाम 03:07 बजे व्रत पारण:-

    वट सावित्री पूजन सामग्री अखंड सौभाग्य एवं संतान की प्राप्ति के लिए रखे जाने वाले वट सावित्री व्रत की पूजन सामग्री में सावित्री-सत्यवान की मूर्तियां, बांस का पंखा, लाल कलावा, धूप-दीप, घी, फल-फूल, रोली, सुहाग का सामान, पूडियां, बरगद का फल, जल से भरा कलश आदि शामिल है. वट सावित्री व्रत की पूजा विधि वट सावित्री व्रत के दिन सुबह उठकर स्नानादि करके व्रत का संकल्प लें.
    मान्यता है कि इस दिन माता सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प और श्रद्धा से यमराज द्वारा अपने मृत पति सत्यवान के प्राण वापस पाए. इसलिए महिलाओं के लिए ये व्रत बेहद ही फलदायी माना जाता है.

    अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए यह व्रत हर साल ज्येष्ठ माह की अमावस्या को रखा जाता है. जो इस बार 10 जून को है. धार्मिक मान्यता अनुसार जो व्रती सच्चे मन से इस व्रत को करती हैं उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होने के साथ उनके पति को लंबी आयु प्राप्त होती है. इस व्रत के कुछ नियम हैं जिनका पालन करना काफी अहम माना गया है. जानिए वट सावित्री व्रत की पूजन सामग्री, विधि, नियम, कथा और सभी संबंधित जानकारी…

    वट सावित्री पूजन सामग्री:-
    पूजन के लिए माता सावित्री की मूर्ति, बांस का पंखा, बरगद पेड़, लाल धागा, कलश, मिट्टी का दीपक, मौसमी फल, पूजा के लिए लाल कपड़े, सिंदूर-कुमकुम और रोली, चढ़ावे के लिए पकवान, अक्षत, हल्दी, सोलह श्रृंगार व पीतल का पात्र जल अभिषेक के लिए.
    महत्व:- मान्यता है कि इस दिन माता सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प और श्रद्धा से यमराज द्वारा अपने मृत पति सत्यवान के प्राण वापस पाए. इसलिए महिलाओं के लिए ये व्रत बेहद ही फलदायी माना जाता है. इस दिन सुहागन महिलाएं पूरा श्रृंगार कर बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं. वट वृक्ष की जड़ में भगवान ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु व डालियों, पत्तियों में भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है. महिलाएं इस दिन यम देवता की पूजा करती हैं.

    पूजा विधि: इस व्रत में बरगद के पेड़ की पूजा के साथ-साथ सत्यवान और यमराज की पूजा भी की जाती है. वट सावित्री व्रत के दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान कर व्रत करने का संकल्प लें. फिर सोलह श्रृंगार करें और सूर्य देव को जल का अर्घ्य दें. फिर बांस की एक टोकरी में पूजा की सभी सामग्रियां रख वट वृक्ष के पास जाकर पूजा प्रारंभ करें. सबसे पहले पेड़ की जड़ को जल का अर्घ्य दें. फिर सोलह श्रृंगार अर्पित करें. इसके बाद वट देव की पूजा करें. वट-वृक्ष की पूजा हेतु जल, फूल, रोली-मौली, कच्चा सूत, भीगा चना, गुड़ इत्यादि चढ़ाएं और जलाभिषेक करें. पेड़ के चारों ओर कच्चा धागा लपेट कर तीन बार परिक्रमा करें. इसके बाद वट सावित्री व्रत की कथा सुननी चाहिए. कथा सुनने के बाद भीगे हुए चने का बायना निकाले और उस पर कुछ रुपए रखकर अपनी सास को दें. जो स्त्रियाँ अपनी साँसों से दूर रहती है, वे बायना उन्हें भेज दे और उनका आशीर्वाद लें. पूजा की समाप्ति के पश्चात ब्राह्मणों को वस्त्र तथा फल आदि दान करें.

    कोरोना के चलते घर में ऐसे करें वट सावित्री व्रत पूजन:-

    वट के पांच पत्र डालकर कलश स्थापित करें. वट पत्र न होने पर कपड़े के पट्टे पर चंदन, रोली से ब्रह्मा, सावित्री बनाकर अथवा कागज पर छपा हुआ वट सावित्री पट्टा ले सकते हैं.स्नान, शृंगार करने के बाद शृंगार सामग्री, कलावा, चंदन, पिठ्या (रोली), फल, नैवेद्य आदि रखकर दीप जलाते हुए स्वयं संकल्प करें. कलश में एक लोटा शुद्ध जल, हल्दी, अक्षत आदि अर्पित करें. कलश पर सात बार कलावा लपेटे और 11 परिक्रमा करें. आरती के बाद ऊँ सावित्री देव्यै नम: का जाप करें. दान सामग्री ब्राह्मणों को देकर आशीर्वाद प्राप्त करें.
    वट सावित्री व्रत विधि:-
    इस व्रत में सुहागिन महिलाएं नए वस्‍त्र पहनकर सोलह श्रृंगार करती हैं. पूरे दिन निर्जला व्रत रखती हैं. इस दिन बरगद के पेड़ की पूजा करने का विधान है. जिसके लिए 24 बरगद फल (आटे या गुड़ के) और 24 पूरियां अपने आंचल में रखकर वट वृक्ष पूजन के लिए जाएं. अब 12 पूरियां और 12 बरगद फल वट वृक्ष पर चढ़ा दें. इसके बाद वट वृक्ष पर एक लोटा जल चढ़ाएं. फिर वट वक्ष को हल्‍दी, रोली और अक्षत लगाएं. अब फल और मिठाई अर्पित करें. इसके बाद धूप-दीप से पूजन करें. अब वट वृक्ष में कच्‍चे सूत को लपटते हुए 12 बार परिक्रमा करें. हर परिक्रमा पर एक भीगा हुआ चना चढ़ाते जाएं. परिक्रमा पूरी होने के बाद सत्‍यवान व सावित्री की कथा सुनें. अब 12 कच्‍चे धागे वाली एक माला वृक्ष पर चढ़ाएं और दूसरी खुद पहन लें. अब 6 बार माला को वृक्ष से बदलें और अंत में एक माला वृक्ष को चढ़ाएं और एक अपने गले में पहन लें. पूजा खत्‍म होने के बाद घर आकर पति को बांस का पंख झलें और उन्‍हें पानी पिलाएं. फिर 11 चने और वट वृक्ष की लाल रंग की कली को पानी से निगलकर अपना व्रत तोड़ें.

    वट सावित्री व्रत कथा:- यह व्रत करने से सौभाग्यवती महिलाओं की मनोकामना पूर्ण होती है और उनका सौभाग्य अखंड रहता है. इस दिन वट यानी बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है. कहा जाता है कि वट वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु व डालियों व पत्तियों में भगवान शिव का निवास स्थान माना जाता है. व्रत रखने वालों को मां सावित्री और सत्यवान की इस पवित्र कथा को सुनना जरूरी माना गया है. वट सावित्री व्रत कथा के अनुसार सावित्री के पति अल्पायु थे, उसी समय देव ऋषि नारद आए और सावित्री से कहने लगे की तुम्हारा पति अल्पायु है. आप कोई दूसरा वर मांग लें. पर सावित्री ने कहा- मैं एक हिन्दू नारी हूं, पति को एक ही बार चुनती हूं. इसी समय सत्यवान के सिर में अत्यधिक पीड़ा होने लगी. सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे अपने गोद में पति के सिर को रख उसे लेटा दिया. उसी समय सावित्री ने देखा अनेक यमदूतों के साथ यमराज आ पहुंचे है. सत्यवान के जीव को दक्षिण दिशा की ओर लेकर जा रहे हैं. यह देख सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चल देती हैं.  उन्हें आता देख यमराज ने कहा कि- हे पतिव्रता नारी! पृथ्वी तक ही पत्नी अपने पति का साथ देती है. अब तुम वापस लौट जाओ. उनकी इस बात पर सावित्री ने कहा- जहां मेरे पति रहेंगे मुझे उनके साथ रहना है. यही मेरा पत्नी धर्म है. सावित्री के मुख से यह उत्तर सुन कर यमराज बड़े प्रसन्न हुए. उन्होंने सावित्री को वर मांगने को कहा और बोले- मैं तुम्हें तीन वर देता हूं. बोलो तुम कौन-कौन से तीन वर लोगी. तब सावित्री ने सास-ससुर के लिए नेत्र ज्योति मांगी, ससुर का खोया हुआ राज्य वापस मांगा एवं अपने पति सत्यवान के सौ पुत्रों की मां बनने का वर मांगा. सावित्री के यह तीनों वरदान सुनने के बाद यमराज ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा- तथास्तु! ऐसा ही होगा. सावित्री पुन: उसी वट वृक्ष के पास लौट आई. जहां सत्यवान मृत पड़ा था. सत्यवान के मृत शरीर में फिर से संचार हुआ. इस प्रकार सावित्री ने अपने पतिव्रता व्रत के प्रभाव से न केवल अपने पति को पुन: जीवित करवाया बल्कि सास-ससुर को नेत्र ज्योति प्रदान करते हुए उनके ससुर को खोया राज्य फिर दिलवाया. तभी से वट सावित्री अमावस्या और वट सावित्री वट वृक्ष की पूजा-अर्चना करने का विधान है. यह व्रत करने से सौभाग्यवती महिलाओं की मनोकामना पूर्ण होती है और उनका सौभाग्य अखंड रहता है, ऐसी मान्यता है.

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