नई दिल्ली: भारत में शहरीकरण की रफ्तार अब इतनी तेज हो चुकी है कि प्रशासनिक सीमाएं भी उसके सामने छोटी पड़ने लगी हैं। देश के अनगिनत क्षेत्र ऐसे हैं, जो सरकारी कागजों पर भले ही आज भी गांव दर्ज हों, लेकिन हकीकत में वे पूरी तरह से आधुनिक शहरों में तब्दील हो चुके हैं। इन इलाकों में खेती-किसानी पर निर्भरता कम हो गई है, गगनचुंबी इमारतें खड़ी हो रही हैं और सड़कों का जाल बिछ गया है। इस अभूतपूर्व बदलाव को देखते हुए केंद्र सरकार ने अब एक महत्वपूर्ण कदम उठाने का मन बनाया है। वह शहरी और ग्रामीण के पारंपरिक वर्गीकरण से आगे बढ़कर एक तीसरी नई श्रेणी, ‘कार्यात्मक शहरी बस्तियां’ (Functional Urban Settlements), बनाने पर गंभीरता से विचार कर रही है। यह पहल देश के लाखों लोगों के लिए एक नई पहचान और बेहतर भविष्य की नींव रख सकती है।
पुराने वर्गीकरण की सीमाएं और नई ‘कार्यात्मक शहरी बस्तियां’ की आवश्यकता
भारत में शहरी विकास को लंबे समय से केवल जनगणना कस्बों (Census Towns) और वैधानिक कस्बों (Statutory Towns) के पुराने चश्मे से देखा जाता रहा है। यह वर्गीकरण अक्सर जमीन पर मौजूद वास्तविक स्थिति को पूरी तरह से दर्शाने में विफल रहा है। आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के तहत कार्यरत प्रतिष्ठित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स (NIUA) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में एक नए ‘नेशनल सेटलमेंट क्लासिफिकेशन फ्रेमवर्क’ की सिफारिश की है। इस महत्वपूर्ण अध्ययन को प्रधानमंत्री मोदी के प्रधान सचिव पीके मिश्रा द्वारा जारी किया गया है, जो इस दिशा में सरकार की गंभीरता को दर्शाता है।
इस नए फ्रेमवर्क का उद्देश्य केवल आंकड़ों को सही करना नहीं है, बल्कि भारत के भविष्य के शहरी विकास के लिए एक मजबूत नींव तैयार करना है। यह सुनिश्चित करेगा कि शहरीकरण की प्रक्रिया अधिक नियोजित, समावेशी और सतत हो, जिससे सभी नागरिकों को लाभ मिल सके। इन प्रस्तावित कार्यात्मक शहरी बस्तियां को मान्यता मिलने से उन्हें आवश्यक संसाधन और योजनाएं मिल पाएंगी, जो उनकी वास्तविक जरूरतों के अनुरूप होंगी।
संयुक्त राष्ट्र के मानकों पर आधारित अनुमान बताते हैं कि साल 2025 तक भारत की करीब 84 प्रतिशत आबादी शहरी बस्तियों में निवास कर रही थी, जबकि सरकारी रिकॉर्ड में यह आंकड़ा केवल 36 प्रतिशत के आसपास ही सिमटा हुआ है। यह भारी अंतर ग्रामीण और शहरी जीवन के बीच की उस धुंधली होती रेखा को स्पष्ट करता है, जिसे अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसे सैकड़ों गांव हैं, खासकर उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और केरल जैसे राज्यों में, जो शहरी सुख-सुविधाओं से पूरी तरह लैस हैं, लेकिन उनका प्रशासनिक संचालन आज भी ग्रामीण व्यवस्था यानी पंचायतों के तहत ही हो रहा है। इन क्षेत्रों में रहने वाले लोग शहर जैसी जिंदगी जीते हैं, लेकिन उन्हें ग्रामीण योजनाएं या फंडिंग मिलती हैं, जो अक्सर उनकी जरूरतों के हिसाब से पर्याप्त नहीं होतीं।
इस प्रशासनिक विसंगति के चलते इन क्षेत्रों के निवासी अक्सर शहरी सुविधाएं पाने से वंचित रह जाते हैं। जल आपूर्ति, स्वच्छता, परिवहन और सार्वजनिक सुरक्षा जैसी मूलभूत सेवाओं का स्तर अक्सर ग्रामीण मानकों पर ही सीमित रहता है, जबकि उनकी जीवनशैली और आवश्यकताएं पूरी तरह से शहरी होती हैं। यह स्थिति न केवल नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करती है, बल्कि स्थानीय प्रशासन पर भी अनावश्यक दबाव डालती है, क्योंकि उन्हें शहरी समस्याओं को ग्रामीण संसाधनों से सुलझाना पड़ता है। [INTERNAL_LINK_HOLDER]
जमीनी हकीकत को मापने के लिए आधुनिक तकनीक का सहारा
इस भौगोलिक और प्रशासनिक विसंगति को दूर करने के लिए सरकार अब आधुनिक तकनीक का सहारा ले रही है। उपग्रहों (सैटेलाइट) से प्राप्त ‘नाइट-टाइम लाइट’ यानी रात के समय चमकने वाली रोशनी के डेटा का इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि शहरों के वास्तविक फैलाव का सटीक आकलन किया जा सके। यह तकनीक शहरों के अनौपचारिक विस्तार को पकड़ने में मदद करेगी, जो पारंपरिक जनगणना के आंकड़ों में अक्सर छूट जाता है। इससे यह पता लगाया जा सकेगा कि कौन से क्षेत्र वास्तव में शहरी बन चुके हैं, भले ही उनके नाम के आगे ‘गांव’ लगा हो। सरकार का यह कदम पारदर्शिता और सटीक नियोजन की दिशा में एक बड़ा बदलाव लाएगा।
इसके साथ ही, सरकार टियर-2 से लेकर टियर-5 तक के शहरों के लिए एक समान वर्गीकरण को भी अंतिम रूप दे रही है। इसका उद्देश्य उनके आकार, जनसंख्या घनत्व और विकास की जरूरतों के हिसाब से सही नीतियां, बजट आवंटन और विकास योजनाएं तैयार करना है। यह सुनिश्चित करेगा कि छोटे और मध्यम शहरों को भी उनकी क्षमता के अनुसार विकास के अवसर मिलें और वे देश की आर्थिक प्रगति में पूरी तरह से योगदान दे सकें। इस बारे में अधिक जानकारी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ अर्बन अफेयर्स की वेबसाइट पर उपलब्ध है: NIUA
‘कार्यात्मक शहरी बस्तियां’ श्रेणी के फायदे और भविष्य की उम्मीदें
‘कार्यात्मक शहरी बस्तियां’ की नई श्रेणी बनने से कई महत्वपूर्ण लाभ मिलने की उम्मीद है। सबसे पहले, यह उन लाखों नागरिकों को एक पहचान देगी जो शहरी जीवनशैली जीते हुए भी ग्रामीण प्रशासनिक ढांचे में फंसे हुए हैं। उन्हें बेहतर शहरी सुविधाएं मिलेंगी, जैसे ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, उन्नत सार्वजनिक परिवहन, बेहतर जल निकासी और शहरी विकास परियोजनाओं का सीधा लाभ। दूसरा, इससे केंद्र और राज्य सरकारों को अपनी शहरीकरण नीतियों को जमीन की हकीकत के साथ जोड़ने में मदद मिलेगी, जिससे संसाधनों का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग हो पाएगा।
यह पहल केवल शहरों की परिभाषा बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के तेजी से बदलते आर्थिक और सामाजिक परिदृश्य को एक सही और व्यावहारिक दिशा देने का भी एक प्रयास है। जब हम ग्रामीण से शहरी में बदलते इन क्षेत्रों को औपचारिक रूप से पहचानेंगे, तो उनके लिए विशिष्ट विकास योजनाएं बनाई जा सकेंगी। इससे बुनियादी ढांचे का विकास तेजी से होगा, रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और जीवन की गुणवत्ता में सुधार आएगा। यह नई व्यवस्था भारत को एक अधिक नियोजित, समावेशी और स्थायी शहरी भविष्य की ओर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, जहां हर नागरिक को उसकी वास्तविक स्थिति के अनुरूप सुविधाएं और अवसर मिल सकें। यह सिर्फ एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि एक सामाजिक-आर्थिक क्रांति है जो देश के विकास को नई गति प्रदान करेगी और ‘कार्यात्मक शहरी बस्तियां’ भारतीय नियोजन में मील का पत्थर साबित होंगी। इस तरह की दूरदर्शी पहल से भारत विश्व पटल पर एक अग्रणी शहरी मॉडल प्रस्तुत कर सकता है।

