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    भारत का संदेश भाषण में नहीं, व्यवहार में दिखना चाहिए

    Devanand SinghBy Devanand SinghAugust 31, 2026No Comments4 Mins Read
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    भारत
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    लेखक: देवानंद सिंह

    भारत

    मोहन भागवत का न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में दिया गया संबोधन ऐसे समय में सामने आया है, जब दुनिया पहचान, धर्म, विचारधारा और राजनीतिक ध्रुवीकरण के सवालों से जूझ रही है। आरएसएस प्रमुख ने भारत की भूमिका को ‘विविधता में एकता’ का संदेश दुनिया तक पहुंचाने से जोड़ा और साफ कहा कि भारत को यह काम उपदेश देकर नहीं, बल्कि अपने आचरण से करना होगा। यही उनके पूरे वक्तव्य का सबसे महत्वपूर्ण और विचारणीय पक्ष है।

    भारत की शक्ति उसकी एकरूपता में नहीं, उसकी विविधता को साथ लेकर चलने की क्षमता में रही है। अलग-अलग धर्मों, भाषाओं, परंपराओं और संस्कृतियों के बावजूद एक साझा भारतीय भाव का बने रहना हमारी सभ्यता की बड़ी विशेषता है। इसलिए जब भागवत कहते हैं कि विविधता का सम्मान और स्वीकार किया जाना चाहिए, तो यह बात केवल आरएसएस या किसी एक विचारधारा की सीमा में नहीं, बल्कि पूरे भारतीय समाज के संदर्भ में देखी जानी चाहिए।

    ‘हिंदू राष्ट्र’ की अवधारणा पर उनका यह कहना कि किसी मुसलमान को भारत से बाहर करने की सोच हिंदुत्व नहीं हो सकती, निश्चित रूप से ध्यान खींचता है। यह स्पष्टीकरण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आरएसएस की विचारधारा को लेकर देश और विदेश में लंबे समय से बहस होती रही है। लेकिन यहां असली प्रश्न बयान का नहीं, उस बयान की सामाजिक परिणति का है। किसी भी विचार की विश्वसनीयता उसके शब्दों से कम और उसके व्यवहार से अधिक तय होती है।

    भागवत ने ‘मैं’ और ‘मेरा’ के बजाय ‘हम’ और ‘हमारा’ की भावना अपनाने की बात कही। यही वह कसौटी है जिस पर आज भारतीय समाज और राजनीति दोनों को स्वयं को परखने की जरूरत है। यदि ‘हम’ में केवल अपने धर्म, अपनी जाति, अपने राजनीतिक समूह या अपने समर्थक शामिल हैं, तो यह व्यापक भारतीयता नहीं है। वास्तविक ‘हम’ वह है जिसमें असहमति रखने वाला व्यक्ति भी शामिल हो, दूसरा धर्म मानने वाला भी शामिल हो और वह व्यक्ति भी शामिल हो जिससे वैचारिक मतभेद हों।

    उन्होंने दुश्मन को खत्म करने के बजाय दुश्मनी की मानसिकता खत्म करने की बात कही। यह विचार वर्तमान समय के लिए खास महत्व रखता है। लोकतंत्र में विरोधी होना अपराध नहीं है और असहमति राष्ट्रविरोध नहीं। समाज तब मजबूत होता है जब मतभेदों के बावजूद संवाद के दरवाजे खुले रहते हैं।

    न्यूयॉर्क में भागवत के कार्यक्रम का विरोध भी हुआ। विरोध करने वालों ने आरएसएस की विचारधारा को लेकर गंभीर सवाल उठाए। इन सवालों को खारिज कर देना आसान है, लेकिन उन्हें लोकतांत्रिक संवाद का हिस्सा मानकर जवाब देना कहीं अधिक प्रभावी होगा। यदि आरएसएस स्वयं को भारतीय समाज में एकता का वाहक मानता है तो आलोचना और असहमति को भी उसी उदारता से स्वीकार करना होगा।

    प्रवासी भारतीयों को अमेरिका के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने की सलाह भी उल्लेखनीय है। भारत से जुड़े रहना और जिस देश में व्यक्ति रहता है, उसके प्रति निष्ठा निभाना—दोनों साथ चल सकते हैं। यह संदेश भारतीय संस्कृति की उस व्यापक भावना से मेल खाता है जिसमें लेने के साथ समाज को वापस देने पर जोर दिया गया है।

    लेकिन अंततः भागवत के संबोधन की सबसे बड़ी परीक्षा भारत की जमीन पर होगी। यदि विविधता का सम्मान वास्तव में भारतीय नियति है तो वह मंदिर-मस्जिद, बहस और राजनीति से आगे निकलकर रोजमर्रा के सामाजिक व्यवहार में दिखाई देनी चाहिए। कमजोर और असहमत व्यक्ति के प्रति हमारा व्यवहार ही बताएगा कि ‘हम और हमारा’ केवल भाषण है या सचमुच जीवन-मूल्य।

    भारत दुनिया को एकता का संदेश तभी दे सकता है, जब उसके भीतर यह एकता मजबूत हो। दुनिया को उपदेश देने से पहले भारत को अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करना होगा। मोहन भागवत ने स्वयं यही कहा है। अब इस कथन की सार्थकता कथन से नहीं, कर्म से साबित होने की प्रतीक्षा है।

    आरएसएस न्यूयॉर्क मोहन भागवत विविधता में एकता
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