Close Menu
Rashtra SamvadRashtra Samvad
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Rashtra SamvadRashtra Samvad
    • होम
    • राष्ट्रीय
    • अन्तर्राष्ट्रीय
    • राज्यों से
      • झारखंड
      • बिहार
      • उत्तर प्रदेश
      • ओड़िशा
    • संपादकीय
      • मेहमान का पन्ना
      • साहित्य
      • खबरीलाल
    • खेल
    • वीडियो
    • ईपेपर
    Topics:
    • रांची
    • जमशेदपुर
    • चाईबासा
    • सरायकेला-खरसावां
    • धनबाद
    • हजारीबाग
    • जामताड़ा
    Rashtra SamvadRashtra Samvad
    • रांची
    • जमशेदपुर
    • चाईबासा
    • सरायकेला-खरसावां
    • धनबाद
    • हजारीबाग
    • जामताड़ा
    Home » भगवान दास माहौर: क्रांतिपथ के अविचल राही
    Breaking News Headlines धर्म मेहमान का पन्ना राष्ट्रीय संपादकीय

    भगवान दास माहौर: क्रांतिपथ के अविचल राही

    Devanand SinghBy Devanand SinghFebruary 26, 2026No Comments6 Mins Read
    Share Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link
    भगवान दास माहौर
    Share
    Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link

    भगवान दास माहौर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन क्रांतिकारियों में थे, जिन्होंने चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह के साथ मिलकर अंग्रेजी शासन को चुनौती दी।

    • प्रमोद दीक्षित मलय

    पूरे परिवेश में ऊर्जा एवं उत्साह की लहर थी। देशभक्ति-भाव से वातावरण ओजमय था। देश की स्वतंत्रता में क्रांतिकारियों के योगदान की चर्चा हर जुबान थी। स्वतंत्रता के वेदिका में सांसों की समिधा समर्पित कर अमर हो गये क्रांतिपथिकों के प्रति उपस्थित जन समूह में श्रद्धा का सरोवर लबालब भरा हुआ था। अवसर था लखनऊ में, महान बलिदानी चंद्रशेखर आजाद की प्रतिमा के अनावरण का। समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित आजाद के घनिष्ठ मित्र ने ‘चंद्रशेखर आजाद – अमर रहें’ के जनघोष के बीच मूर्ति पर ढंका कपड़ा हटाया, अश्रुपूरित नेत्रों से पुष्प माला पहनाई और प्रणाम हेतु चरणों में झुक गये। पूरा माहौल बलिदानी ओजस्वी नारों से गूंजता रहा। आजाद की मूर्ति के चरणों में झुका मुख्य अतिथि की शीश झुका ही रहा। एक सह-अतिथि ने हाथ का सहारा दे उठाना चाहा, पर यह क्या! उनके हाथों में निष्प्राण देह झूल गयी। अपने आदर्श, क्रांतिकारी साथी मां भारती के सपूत चंद्रशेखर आजाद के चरणों में मुख्य अतिथि ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। मुख्य अतिथि थे डॉ. भगवान दास माहौर और दिन था 12 मार्च, 1979 सोमवार।
    चंद्रशेखर आजाद और सरदार भगत सिंह के प्रिय साथी भगवान दास माहौर का जन्म 27 फरवरी, 1910 को झांसी जनपद के बड़ौनी गांव में हुआ था जो अब मध्यप्रदेश के दतिया जिला अंतर्गत आता है। माता नन्नीबाई लाड़-प्यार लुटातीं पशु-पक्षियों एवं प्रकृति से जुड़ी कहानियां सुनातीं, फलत: बालक भगवान दास प्रकृति के सान्निध्य में शांति एवं सुख अनुभव करते प्रकृति से भावनात्मक रूप से जुड़ता गया। पिता रामचरन माहौर का मिठाई बनाने का व्यवसाय था, किंतु वह जीवन में शिक्षा के महत्व से परिचित थे। इसी कारण पढ़ाई की उम्र होते ही बालक को गांव के विद्यालय में भेजा जाने लगा और समय के साथ उसने पांचवीं कक्षा उत्तीर्ण कर ली। आगे की शिक्षा हेतु गांव में विद्यालय उपलब्ध न था तो भगवान दास को कक्षा 6 में प्रवेश हेतु झांसी में रिश्तेदार नाथूराम माहौर के पास भेज दिया गया और वह मन लगाकर पढ़ने लगे। प्रकृति और साहित्य से लगाव बढ़ने लगा था, पर नियति ने तो कुछ और ही रच लगा था। कक्षा 9 में अध्ययन के दौरान भगवान दास का सम्पर्क क्रांतिकारी युवा शचींद्रनाथ बख्शी से हुआ। शचींद्रनाथ ने भगवान दास को चंद्रशेखर आजाद से मिलवाया। उम्र रही होगी 15-16 वर्ष, आजाद ने परीक्षा ली। शचींद्रनाथ ने पिस्तौल में गोली भरकर नली भगवान दास की ओर करके ट्रिगर दबाते हुए कहा कि गोली ऐसे चलाते हैं। इसी बीच आजाद ने शचींद्रनाथ का हाथ ऊपर उठा दिया, गोली छत से जा टकराई और छत का थोड़ा चूरा फर्श पर फैल गया। आजाद ने भगवान दास की नब्ज टटोली, दिल की धड़कन सुनी, सब सामान्य जैसे कुछ हुआ ही न हो। साहस के धनी भगवान दास न केवल क्रांतिकारी दल में शामिल कर लिए गये, बल्कि आजाद के घनिष्ठ और प्रिय साथी भी बन गये। चंद्रशेखर आजाद का आगमन जब भी झांसी होता तो भगवान दास के साथ ही रहते। झांसी के ही दो क्रांतिकारी साथी सदाशिव मलकापुर एवं विश्वनाथ वैशम्पायन, जो बांदा में बहुत समय रहे और पढ़ाई की, भी मिलते। बारहवीं उत्तीर्ण कर आजाद के निर्देश पर भगवान दास ने 1928 में विक्टोरिया कालेज ग्वालियर में प्रवेश ले छात्रावास में रहने लगे। यहां क्रांतिकारी साथियों का बहुत आना-जाना लगा रहता था, किसी को शक न हो जाये, यह सोच कर भगवान दास ने छात्रावास छोड़कर बाहर शहर में एक मकान किराये पर लिया। यहां पर क्रांतिकारियों का छिपना-रहना आसान हो गया।
    काल चक्र का पहिया चलता रहा। लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध प्रदर्शन के दौरान लाठियों की मार से लाला लाजपत राय का बलिदान हो चुका था। बदला लेने और देश में उत्साह जगाने के लिए लाठी चार्ज का आदेश देने वाले अंग्रेज अधिकारी जेम्स अलेक्जेंडर स्काट का वध आवश्यक था। चंद्रशेखर आजाद ने भगवान दास को लाहौर बुला लिया। योजना बनी, भूलवश स्काट की जगह जॉन पायंट्ज साण्डर्स की हत्या हो गयी। पर विषय यह नहीं है कि किसकी हत्या हुई, विषय यह है कि भगवान दास की जिम्मेदारी थी कि यदि भगतसिंह और शिवराम राजगुरु से कोई चूक होती है तो विकल्प के तौर पर भगवान दास माहौर अंग्रेज अधिकारी को तुरंत गोली मार देंगे, साथ ही भगत सिंह और राजगुरु को कवर फायर भी देंगे। इस घटना के बाद कुछ क्रांतिकारी ग्वालियर आ गये। भगवान दास ने सभी को विभिन्न स्थानों पर छिपा दिया। क्रांति कभी भी लुक-छिपकर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से नहीं होती। अतः आजाद के निर्देश पर भगवान दास माहौर और शिवदास मलकापुर 1930 में बम-बारूद और हथियारों की पेटी लेकर शिवराम राजगुरु के पास अकोला के लिए निकले। किंतु जयगोपाल एवं फणींद्रनाथ घोष की मुखबिरी से भुसावल में पकड़ लिए गये। जलगांव में मुकदमा चला और भगवान दास माहौर को 14 साल की जेल सजा हुई। इस मुकदमें के दौरान पहचान के लिए दोनों मुखबिर जलगाव कोर्ट में गवाही देने आने वाले थे। चंद्रशेखर आजाद ने सदाशिव मलकापुर के भाई शंकर राव के हाथ 20 फरवरी को भोजन पात्र में एक भरी पिस्तौल भगवान दास को भेज कर दोनों मुखबिरों की हत्या का निर्देश दिया। 21 फरवरी को पेशी थी, न्यायालय के बाहर भोजन करते मुखबिरों पर भगवान दास ने गोली चलाई किंतु सुरक्षाकर्मी आगे आ गया, दोनों मुखबिर मेज के नीचे छिप गये, पर अगली दो गोलियों ने दोनों को घायल कर दिया था। भगवान दास को जेल में बंद कर कठोर यातना दी गई। वर्ष 1938 में जब कांग्रेस मंत्रिमंडल बना तब आठ साल की जेल के बाद भगवान दास को रिहा किया गया, किंतु आंदोलनों में सक्रियता के कारण वह 1940 में फिर जेल में बंद कर दिये गये।
    वर्ष 1945 में जेल से छूटने के बाद भगवान दास ने बीए, एमए करके आगरा विश्वविद्यालय से ‘1857 के स्वाधीनता संग्राम का हिंदी साहित्य पर प्रभाव’ विषय पर शोध कर पीएचडी उपाधि प्राप्त की और बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी में अध्यापन कार्य किया। वह कलम के धनी थे, साहित्य के आंगन में विचरण करते थे। क्रांतिकारियों के जीवन पर ‘यश की धरोहर’ तथा कहानी संग्रह ‘यक्ष प्रश्न’ लिख साहित्य भंडार को समृद्ध किया। एक रेडियो रूपक भी लिखा – ऐसे तो घर नहीं बनता मम्मी, जो बहुत चर्चित और लोकप्रिय हुआ। संगठन गढ़ने में कुशल, अचूक निशानेबाज एवं क्रांतिकारियों में ‘कुठे गुंतला’ नाम से सम्बोधित क्रांतिवीर डॉ. भगवान दास माहौर ने 12 मार्च, 1979 को अपनी अंतिम सांस अपने आदर्श के चरणों में समर्पित कर दी। उनकी एक काव्य पंक्ति- मेरे शोणित की लाली से कुछ तो लाल धरा होगी, से श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूं। जन्मभूमि बड़ौनी गांव में भगवान दास माहौर की प्रतिमा देशभक्ति का संचार करती रहेगी

    लेखक शिक्षक एवं शैक्षिक संवाद मंच के संस्थापक हैं।‌बांदा, उ.प्र.
    मोबा. 9452085234

    Share. Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link
    Previous Article24 घंटे में खुला राज तांती हत्याकांड, चक्रधरपुर पुलिस की त्वरित कार्रवाई से बढ़ा जनता का भरोसा
    Next Article आनंद मार्ग के 10 मोतियाबिंद ऑपरेशन एवं लैंस प्रत्यारोपण रोगियों को होली के रंग एवं हुरदंग से बचने की अपील की गई

    Related Posts

    स्वच्छता पखवाड़ा के वेस्ट टू वेल्थ प्रतियोगिता में जी सी जे डी हाई स्कूल को तीसरा स्थान युसीआईएल सीएमडी ने किया सम्मानित 

    February 28, 2026

    ब्रह्मप्राप्ति ही एकमात्र पथ : आनन्दमार्ग संभागीय सेमिनार में आचार्य सिद्धविद्यानंद अवधूत

    February 28, 2026

    मानगो नगर निगम चुनाव में हार के बाद विकास सिंह का भाजपा पर तीखा हमला

    February 28, 2026

    Comments are closed.

    अभी-अभी

    स्वच्छता पखवाड़ा के वेस्ट टू वेल्थ प्रतियोगिता में जी सी जे डी हाई स्कूल को तीसरा स्थान युसीआईएल सीएमडी ने किया सम्मानित 

    ब्रह्मप्राप्ति ही एकमात्र पथ : आनन्दमार्ग संभागीय सेमिनार में आचार्य सिद्धविद्यानंद अवधूत

    मानगो नगर निगम चुनाव में हार के बाद विकास सिंह का भाजपा पर तीखा हमला

    गम्हरिया के कई इलाकों में रविवार को पांच घंटे रहेगी विद्युत आपूर्ति बाधित

    होली में डीजे पर रहेगा पूर्ण प्रतिबंध- थाना प्रभारी

    पितकी रेलवे फाटक पर महाजाम, 10–15 घंटे फंसे वाहन — यात्रियों व चालकों की बढ़ी मुश्किलें

    फाल्गुन महोत्सव पर बाबा श्याम का भव्य शृंगार,  भजन संध्या में भक्तिमय हुआ माहौल

    तमोलिया में शिव शिष्य परिवार की भव्य ‘शिव परिचर्चा’, सैकड़ों श्रद्धालु शामिल

    टाटानगर स्टेशन पार्किंग में भारी घाटा, कंपनी ने शुल्क घटाने की मांग उठाई

    सूर्यधाम सिदगोड़ा में राम मंदिर के छठवीं वर्षगांठ पर राममय हुआ सिदगोड़ा, 51 सौ दीपक की आभा से जगमग हुआ सूर्य मंदिर, आतिशबाजी, महाभंडारा के साथ चार दिवसीय अनुष्ठान का हुआ समापन

    Facebook X (Twitter) Telegram WhatsApp
    © 2026 News Samvad. Designed by Cryptonix Labs .

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.