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    Home » मैं राजनीति से सन्यास लेना चाहता हूँ :सूर्य सिंह बेसरा
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    मैं राजनीति से सन्यास लेना चाहता हूँ :सूर्य सिंह बेसरा

    News DeskBy News DeskDecember 30, 2022No Comments7 Mins Read
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    मैं राजनीति से सन्यास लेना चाहता हूँ :सूर्य सिंह बेसरा

    सूर्य सिंह बेसरा पूर्व विधायक

    आज सुबह-सुबह मैंने जब व्हाट्सएप खोला तो वरिष्ठ पत्रकार अरुण जी का एक मैसेज देखा उस मैसेज पर मैंने जब नजर डाली तो देखा पूर्व विधायक सूर्य सिंह बेसरा ने अपनी मन की बात पाठकों से साझा की है राष्ट्र संवाद उसे हूबहू आपके समक्ष रख रहा है

    यह मेरी अपनी राय है ! आपकी राय क्या है ? झारखंड के आदिवासी -मूलवासी यानि झारखंडियों से आपकी राय जानना चाहता हूं
    आप सभी जानते हैं कि मैं झारखंड राज्य निर्माताओं में से एक हूं झारखंड कि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को देखकर मैं काफी आहत हूं यह विडंबना कहा जाए यह दुखद आश्चर्य का विषय एक समय ऐसा भी था यह मेरा सर्वत्र यानी संपूर्ण झारखंड क्षेत्र में जय जय कार की आवाजें गूंज रही थी आज परिस्थितियां

     

    बदल गई है मेरे नाम पर जिंदाबाद के बजाय मुर्दाबाद के नारे लगने लगी है आदिवासी मूलवासी भाई भाई कहने पर मेरा पुतला है जलने लगा है माझी महतो भाई भाई यानी सामाजिक समरसता कहने पर असामाजिक तत्व द्वारा साथ ही कुछ तथाकथित आदिवासी नाथ नेता द्वारा मेरी नींद आ होती रही है और तो और झारखंडी जन जागरण अभियान चलाने जनसभाएं करने तथा अभिव्यक्ति करने की आजादी से मेरे ऊपर पाबंदी लग रही है दूसरी ओर वर्तमान झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस की गठबंधन सरकार यानी हेमंत सोरेन की सरकार द्वारा प्रतिनियुक्त मेरे अंगरक्षक को हटा दिया गया है

     

    उसके कारण मेरी जान माल की सुरक्षा खतरा बन गई है ऐसी परिस्थिति में मैं और सुरक्षा का महसूस करते हुए राजनीति से अलविदा कह देना चाहता हूं उसके पूर्व आप से भी मैं राय लेना चाहूंगा इतिहास साक्षी है जिस प्रकार भारत स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की नेतृत्व में आजाद हिंद फौज की भूमिका रही थी ठीक उसी प्रकार झारखंड अलग राज निर्माण में मेरे नेतृत्व में ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू )की भूमिका रही है मैं 1978 में झारखंड पार्टी द्वारा एन. ई. होरो के नेतृत्व में छात्र जीवन में रहते हुए सर्वप्रथम झारखंड आंदोलन से जुड़े थे उसके बाद 1980 से लेकर 1986 तक शिबू सोरेन के नेतृत्व में झारखंड मुक्ति मोर्चा के दामन थामे थे मैंने देखा परखा और महसूस किया कि झारखंड मुक्ति मोर्चा के द्वारा केबल एमएलए एमपी बनने की

     

    राजनीति हो सकती है लेकिन झारखंड अलग राज की लड़ाई नहीं हो सकती है इसलिए मैंने झारखंड मुक्ति मोर्चा में रहते हुए अपनी सोच विचार को रखते हुए पार्टी के महाधिवेशन में एक छात्र संगठन बनाने का प्रस्ताव रखा था जिसका पारित होने के बाद मैंने ऑल आसाम स्टूडेंट यूनियन (आसू) के तर्ज पर 22 जून 1986 में जामसेदपुर में ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू )का गठन किया था मैं आशु के संस्थापक और झारखंड मुक्ति मोर्चा के तत्कालीन केंद्रीय अध्यक्ष निर्मल महतो संरक्षक थे निर्मल महतो की हत्या 8 अगस्त 1987 को जामसेदपुर में दिनदहाड़े एक राजनीतिक साजिश के तहत कांग्रेस के अपराधियों ने उन्हें गोली मारकर हत्या कर दी गई थी

     

    शहीद निर्मल महतो की हत्या कांड के पश्चात झारखंड में विद्रोह की बादल मंडरा रही थी उसी जनआक्रोश को जन आंदोलन में तब्दील करने के लिए मेरे नेतृत्व में निर्मल महतो के खून के बदले झारखंड राज निर्माण करने का ऐलान किया था अचानक ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन आजसू की तेवर उग्रवादी बन गए और देखते ही देखते मेरे नेतृत्व में करीब 10000 युवा छात्रों ने बलिदान देने के लिए उलगुलान का संकल्प लिया था 1989 में 72 घंटे का झारखंड बंद आवत हुआ था जिसमें संपूर्ण झारखंड में आर्थिक नाकेबंदी की स्थिति बन गई थी और तू और रेल यातायात और सड़क यातायात पूर्ण रूप से ठप पड़ गई थी और जान माल अस्त व्यस्त हो गई थी झारखंड की विस्फोटक एवं हिंसक गतिविधि को मद्देनजर तत्कालीन केंद्र सरकार के प्रधानमंत्री राजीव गांधी और केंद्रीय गृहमंत्री बूटा सिंह ने

     

    आजसू के नेताओं के साथ झारखंड वार्ता के लिए दिल्ली आमंत्रित किया था मेरे नेतृत्व में दिल्ली वार्ता में केवल 5 प्रतिनिधि शामिल थे उनमें से प्रभाकर तिर्की देव शरण भगत हरिशंकर महतो और आनंद उराव शामिल थे इस प्रकार 50 वर्ष पुरानी झारखंड आंदोलन के इतिहास में पहली बार झारखंड अलग राज्य मांगों को लेकर भारत सरकार और आजसू नेताओं के बीच दिल्ली मैं झारखंड वार्ता संपन्न हुई थी 1989 में भारत सरकार द्वारा झारखंड विशेष समिति गठित की थी जिसमें यह स्वीकार किया गया था कि बिहार पश्चिम बंगाल उड़ीसा और मध्य प्रदेश इन चार राज्यों के सीमावर्ती भौगोलिक क्षेत्र के झारखंडी संस्कृति अविभाज्य कार्यों को अलग राज्य का दर्जा दिया जाना के लिए अनुशंसा किया गया था बाद में 15 नवंबर 2000 को बिहार राज्य से अलग कर झारखंड राज्य की स्थापना हुई थी वर्तमान झारखंड राज महत्व परिकल्पित है और ना ही शहीदों के अरमानों का और ना ही झारखंडी जन आकांक्षाओं के अनुरूप है वर्तमान झारखंड राज के अंदर एक दूसरा बिहार समावेश है झारखंड राज्य 22 वर्षों की सफरनामा पूरी कर चुकी है इन 22 वर्षों के अंतराल में 11 बार सरकार बनी और तो और तीन बार राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो गई थी इसके अलावा झारखंड विधानसभा की चुनाव पांच बार संपन्न हो चुकी है

     

    इसके बावजूद भी मैं झारखंड की तस्वीर बदली है और ना ही झारखंडी ओ की तकदीर बदली है झारखंड में पूर्णता विधायक बिकाऊ है और नौकरशाही भ्रष्ट है भ्रष्टाचार में झारखंड का अकंठ डुबा है इसी के कारण मेरा मन भी उठ चुका है अब मेरा मन करता है झारखंड की राजनीति को अलविदा कर दें और हमेशा के लिए झारखंड की राजनीति से संयास ले ले क्योंकि अब मेरा प्रासंगिकता अब नहीं रह गई है 22 वर्षों के अंतराल में झारखंड की जनसंख्या के अनुरूप सपनों का झारखंड यानी अबुआ दिसुम अबुआ राज नहीं बना पेसा कानून 1996 केंद्र सरकार द्वारा पारित हुई थी लेकिन आज तक झारखंड में लागू नहीं हुई 22 दिसंबर 2003 में लोकसभा द्वारा संताली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था परंतु दुर्भाग्य है अभी तक संताली भाषा के ओलचिकि लागू नहीं हो सकी जबकि झारखंड राज्य के मुख्यमंत्री शिबू सोरेन तीन बार रह चुके हैं और

     

    झारखंड मुक्ति मोर्चा के ही हेमंत सोरेन दो बार मुख्यमंत्री रहे हैं बावजूद संथाली मात्रिभाषा संथाली साहित्य लागू नहीं होना दुर्भाग्य का विषय है इसके अलावे झारखंडी 9 भाषाएं हैं यानी मुंडारी हो कुड़ूख कुड़माली खोरठा नागपुरी ओर पंचपड़गानिया इन भाषाओं को प्राथमिक स्तर से उच्चतर स्तर तक पढ़ाई के लिए अभी तक कोई शिक्षण इतनी थी नहीं बन पाई है और दुआ और स्थानीय कौन खतियान के आधार पर अभी तक परिभाषित नहीं हो पाना तथा नियोजन नीति नहीं बन पाए ना झारखंड के लिए दुर्भाग्य का विषय है झारखंड को दलालों ने ही हलाल किया है झारखंड एक धनी राज्य होते हुए भी यहां के झारखंडी लेजा लेजा और खुली की फौज में तब्दील हो गई है झारखंड के बाहरी और बिहारी लोगों के हाथों में सत्ता एवं व्यवस्था का बागडोर है झारखंड में भाजपा गठबंधन और झारखंड मुक्ति मोर्चा गठबंधन चाय सत्ता पक्ष हो या विपक्ष हो दोनों एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं दोनों पार्टी ही सत्ता का सुख सुख भोग चुकी है और जनता है उसका दंग झेल चुकी है इसलिए झारखंड में भाजपा जैसी सांप्रदायिक पार्टी को मिटाना चाहिए और झारखंड मुक्ति मोर्चा एवं कांग्रेस जैसे भ्रष्ट नेताओं की सरकार को हटाना चाहिए उसके लिए “फ्रेश लीडरशिप ओर फेयर पॉलिटिक्स” की जरूरत है

     

    मैं आने वाला 2024 में युवा छात्रों के हाथों में झारखंड की श्रद्धा का बागडोर सौंपना चाहता था ऐसा नेतृत्व जो ऊर्जावान हो शक्तिमान हो तेजो सिवान हो दूरदर्शिता हो जिसमें पारदर्शिता हो इसमें शिक्षित और प्रशिक्षित हो इसमें संविधान का जानकार हो इसमें ईमानदारी और नैतिकता हो उसको सॉल्व इन झारखंड के लिए हम वृहद झारखंड और बेहतर झारखंड का परिकल्पना किया था अभी सपना साकार होते हुए नहीं दिखाई दे रहा है और तो हमें काफी त्रस्त होकर राजनीति में परास्त होकर मैं हमेशा के लिए झारखंड की राजनीति से सन्यास लेना चाहता हूं अलविदा जोहार मैं ही हूं निर्णय झारखंड आंदोलन के नायक झारखंड राज निर्माताओं में से एक तथा झारखंड राज्य के मांग पर विधायक पद से इस्तीफा देने वाले एकमात्र त्यागी विधायक का एक मिसाल हूं

     

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