क्या मौर्य के सहारे दलित वोट बैंक को साध पाएंगे अखिलेश….?
विशन सिंह पपोला
विधानसभा चुनाव का ऐलान होने के बाद उत्तर प्रदेश में सियासी रंग दिखने लगा है। उम्मीदवारों के नामों का ऐलान हो उससे पहले ही पाला बदलने का सिलसिला शुरू हो गया है। इसमें योगी सरकार में मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य का नाम जिस तरह से अचानक सामने आया है, उससे सियासी पारा कई गुना ऊपर चढ़ गया है, क्योंकि स्वामी प्रसाद मौर्य कद्दावर नेता हैं और दलितों और पिछड़ा वर्ग में उनका अच्छा खासा दबदबा है। उनका जाना बीजेपी के लिए अच्छा नहीं है, जबकि पार्टी में आने से सपा उनका फायदा ले सकती है। इसीलिए बीजेपी खेमे की तरफ से उन्हें लगातार मनाने के प्रयास हो रहे हैं। अमित शाह खुद इस मामले को सीधे डील कर रहे हैं। जो दर्शाता है कि बीजेपी के प्वाइंट ऑफ व्यू से यह बिल्कुल भी हल्का मामला नहीं है। इसीलिए आज भी अमित शाह, योगी आदित्यनाथ सहित कई बड़े बीजेपी नेता बैठक कर रहे हैं। देखने वाली बात होगी कि बीजेपी स्वामी प्रसाद मौर्य को मनाने में सफल रहती है या फिर उनका कोई विकल्प तलाशती है। आपको याद होगा कि पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा का साथ छोड़कर स्वामी प्रसाद मौर्य ने कमल यानि बीजेपी का दामन थामा था। सियासी तौर पर स्वामी प्रसाद मौर्य की नाराजगी भाजपा को कितनी भारी पड़ेगी? और उत्तर प्रदेश की कितनी सीटों पर इसका असर पड़ सकता है और इस उलटफेर से राज्य के जातिगत समीकरण में कितना बदलाव आ सकता है, यह काफी महत्वपूर्ण रहेगा। दरअसल, स्वामी प्रसाद मौर्य गैर यादव ओबीसी समुदाय का बड़ा चेहरा माने जाते हैं। वह कुशीनगर की पडरौना विधानसभा सीट से विधायक हैं, लेकिन उनका प्रभाव रायबरेली, ऊंचाहार, शाहजहांपुर और बदायूं तक माना जाता है। ऐसा दावा किया जा रहा है कि स्वामी प्रसाद मौर्य के सपा में जाने से भाजपा को इन क्षेत्रों में आने वाली करीब 100 विधानसभा सीटों पर इसका असर देखने को मिल सकता है। ऐसा इसीलिए हो सकता है क्योंकि 2017 के विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की सफलता में गैर यादव ओबीसी का काफी ज्यादा योगदान था। और दूसरा मौर्य की बेटी संघमित्रा बदायूं से सांसद हैं। जिसका फायदा भी सपा ले सकती है। जातिगत मोर्चे की बात करें तो राज्य में यादव और कुर्मी के बाद मौर्य ओबीसी समुदाय को तीसरी सबसे बड़ी जाति माना जाता है और स्वामी प्रसाद मौर्य इससे ही ताल्लुक रखते हैं। काछी, मौर्य, कुशवाहा, शाक्य और सैनी जैसे उपनाम भी इसी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। आबादी के लिहाज से भी देखें तो उत्तर प्रदेश के आठ फीसदी लोग इसी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। अगर, वोट बैंक की बात करें तो उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ा वोट बैंक पिछड़ा वर्ग यानि ओबीसी का माना जाता है। लगभग 52 फीसदी पिछड़े वोट बैंक में 43 फीसदी वोट बैंक गैर यादव समुदाय से ताल्लुक रखता है। हालांकि, यह वोट बैंक अब तक किसी भी चुनाव में एकजुट नजर नहीं आया। ऐसे में, सभी राजनीतिक दल गैर यादव वोटों को अपने पाले में लाने में सफल रहते आए हैं। जहां तक मौर्य का बीजेपी का दामन छोड़ने की बात है, वह जल्दबाजी में लिया गया निर्णय नहीं है, बल्कि मौर्य करीब पिछले एक साल से स्वयं को अलग थलग मान रहे थे, क्योंकि उन्हें प्रदेश में आयोजित हुए कई दलित कार्यक्रमों में उतनी तब्बजो नहीं दी गई, जितना वह चाहते थे। दूसरा यह भी माना जा रहा कि वह अपने बेटे के लिए टिकट की फिर से डिमांड कर रहे थे, लेकिन जिस तरह बीजेपी बहुत से टिकट काटने की जुगत में लगी है, उसमें मौर्य खुद को सेफ नहीं मान रहे थे। और डेढ़ दो महीने से अखिलेश यादव के संपर्क में थे।
वैसे भी देखा जाए तो स्वामी प्रसाद मौर्य हवा का रुख देखकर पाला बदलने में माहिर हैं। 2017 विधानसभा चुनाव से पहले स्वामी प्रसाद बहुजन समाज पार्टी का अहम चेहरा थे। उनका कद इतना बड़ा था कि मायावती ने मीडिया में बोलने की इजाजत भी सिर्फ उन्हें ही दे रखी थी। जब उन्हें मोदी लहर का एहसास हुआ तो उन्होंने बीजेपी का दामन थाम लिया था। बसपा से पहले वह जनता दल का भी हिस्सा रह चुके हैं, लेकिन देखने वाली बात होगी कि मौर्य के लिए यह कदम फायदे का सौदा साबित होता है या फिर आत्मघाती क्योंकि जिस तरह के सर्वेक्षण सामने आ रहे हैं, उसमें योगी सरकार ही रिपीट होती दिख रही है।

