
लोकतंत्र बचाओ रैली से भाजपा का विपक्ष को जवाब, लेकिन सड़क पर आंदोलन के मामले में सत्ता पक्ष पीछे
जेपी गुप्ता, राष्ट्र संवाद ब्यूरो लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में वर्ष 2026 के घटनाक्रम पर नजर डालें तो एक अहम सवाल सामने आता है कि क्या भाजपा सरकार और संगठन ने विपक्ष के आंदोलनों का जवाब सड़क पर उतरकर दिया या फिर सरकारी आयोजनों, जनसभाओं, प्रेस कॉन्फ्रेंस और संगठनात्मक गतिविधियों के जरिए अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने की कोशिश की? मौजूदा राजनीतिक गतिविधियों से संकेत मिलता है कि सत्ता पक्ष ने विपक्ष के मुकाबले जनआंदोलन खड़ा करने की बजाय सरकार की उपलब्धियों और संगठन की सक्रियता को अधिक महत्व दिया है।
भाजपा सरकार और संगठन की गतिविधियों को एक ही नजरिये से देखना उचित नहीं होगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार ने वर्ष 2026 के दौरान जनकल्याणकारी योजनाओं, विकास कार्यों और उपलब्धियों के प्रचार पर जोर दिया। वहीं, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के नेतृत्व में संगठन ने वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों को गति दी। 31 अक्टूबर को लखनऊ में युवा मोर्चा के नवनियुक्त राष्ट्रीय महामंत्री हर्षवर्धन सिंह का स्वागत भी संगठनात्मक शक्ति प्रदर्शन का उदाहरण रहा।
नवंबर में वाराणसी में भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा की एसआईआर पर प्रेस कॉन्फ्रेंस विपक्ष के आरोपों का राजनीतिक जवाब देने की कोशिश थी। हालांकि, पत्रकारों के सवालों और मतदाता सूची से जुड़े विवाद ने इस मुद्दे को और राजनीतिक रूप से चर्चा में ला दिया। दूसरी ओर भाजपा की लोकतंत्र बचाओ रैली को विपक्ष के लगातार जारी राजनीतिक अभियानों के जवाब में सत्ता पक्ष के शक्ति प्रदर्शन के तौर पर देखा जा सकता है।
दरअसल, विपक्ष एसआईआर के तहत मतदाताओं के नाम काटे जाने, चुनाव आयोग की निष्पक्षता, महंगाई, बेरोजगारी और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर सरकार को घेर रहा है। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव जैसे नेता इन मुद्दों को लेकर राजनीतिक अभियान चला रहे हैं। महिला सुरक्षा और अपराध की घटनाएं भी विपक्ष के हमले का प्रमुख आधार बनी हुई हैं।
इसके मुकाबले भाजपा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस, सरकारी कार्यक्रमों और संगठनात्मक बैठकों के माध्यम से अपना पक्ष रखने की रणनीति अपनाई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा नेतृत्व के पास सरकारी मंच तथा विकास योजनाओं के प्रचार का व्यापक तंत्र है, लेकिन इसे सीधे राजनीतिक जनआंदोलन की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
लोकतंत्र बचाओ रैली का राजनीतिक संदेश
भाजपा की लोकतंत्र बचाओ रैली के तीन प्रमुख राजनीतिक अर्थ हैं। पहला, चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक संस्थाओं को लेकर विपक्ष के आरोपों का जवाब देना। दूसरा, यह संदेश देना कि राजनीतिक विमर्श पर केवल विपक्ष का अधिकार नहीं है। तीसरा, वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कार्यकर्ताओं में उत्साह और संगठनात्मक एकजुटता पैदा करना।
कुल मिलाकर, वर्ष 2026 में भाजपा ने सरकार की उपलब्धियों के प्रचार और संगठन की चुनावी तैयारी पर अधिक ध्यान दिया, जबकि विपक्ष ने सरकार की जवाबदेही के सवालों पर सड़क और राजनीतिक मंचों का इस्तेमाल किया। लोकतंत्र बचाओ रैली सत्ता पक्ष की ओर से विपक्ष को जवाब देने की कोशिश जरूर है, लेकिन इसके आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि भाजपा ने पूरे वर्ष विपक्ष के मुकाबले अधिक व्यापक जनआंदोलन खड़ा किया। असली परीक्षा 2027 के चुनाव से पहले जनता के बीच राजनीतिक समर्थन जुटाने की होगी।
