बाढ़ की त्रासदी से कब मुक्त होगा बिहार?
घोषणाओं से नहीं, ठोस जल प्रबंधन, जवाबदेही और समयबद्ध कार्ययोजना से बदलेगी बिहार की तस्वीर
देवानंद सिंह
बिहार में बाढ़ हर साल तबाही मचाती है। खेत डूबते हैं, फसलें बर्बाद होती हैं, सड़कें टूटती हैं, घर उजड़ते हैं और हजारों परिवारों की जिंदगी पटरी से उतर जाती है। विडंबना यह है कि जिस पानी को नियंत्रित कर राज्य की समृद्धि का आधार बनाया जा सकता है, वही पानी हर साल बिहार के लिए अभिशाप बन जाता है। सवाल यह है कि आखिर कब तक बिहार बाढ़ की मार झेलता रहेगा? कब तक राहत और बचाव के नाम पर सरकारी तंत्र सक्रिय होगा और पानी उतरते ही समस्या को फिर अगले साल के लिए छोड़ दिया जाएगा? अब समय आ गया है कि बाढ़ को महज प्राकृतिक आपदा मानकर उससे समझौता करने के बजाय इसे विकास, नीति और प्रशासन की गंभीर चुनौती के रूप में देखा जाए।
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने बिहार को बाढ़ से राहत दिलाने के लिए व्यापक जल प्रबंधन, नदियों की ड्रेजिंग, सुरक्षात्मक दीवारों के निर्माण और वाटर ग्रिड विकसित करने की जो बात कही है, वह निश्चित रूप से एक बड़ी बहस का आधार बन सकती है। लेकिन बिहार को अब केवल सुझावों और घोषणाओं से आगे बढ़ना होगा। राज्य को ऐसी ठोस कार्ययोजना चाहिए, जिसका परिणाम जमीन पर दिखाई दे और जिसकी सफलता का आकलन भी किया जा सके।
बिहार की बाढ़ समस्या का समाधान केवल तटबंध खड़े करने में नहीं है। वर्षों से तटबंधों के निर्माण और मरम्मत पर खर्च किया जाता रहा है, लेकिन बाढ़ का खतरा समाप्त नहीं हुआ। कहीं तटबंध टूटते हैं, कहीं पानी आबादी में घुस जाता है और कहीं जल निकासी बाधित होने से लंबे समय तक खेत जलमग्न रहते हैं। इसका स्पष्ट अर्थ है कि बाढ़ प्रबंधन को केवल निर्माण कार्यों तक सीमित रखने के बजाय नदी घाटियों, जल प्रवाह, गाद जमाव, प्राकृतिक जल निकासी और वर्षा के पानी के समग्र प्रबंधन से जोड़ना होगा। हर नदी और हर क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप अलग रणनीति बनानी होगी।
गडकरी का वाटर ग्रिड विकसित करने और एक नदी बेसिन से दूसरे बेसिन में पानी स्थानांतरित करने का सुझाव इस दिशा में महत्वपूर्ण पहल हो सकता है। लेकिन ऐसी योजनाओं के लिए विस्तृत तकनीकी अध्ययन, पर्यावरणीय आकलन और अंतरराज्यीय एवं अंतरराष्ट्रीय समन्वय अनिवार्य होगा। केवल बड़ी परियोजनाओं की कल्पना कर लेने से बाढ़ का समाधान नहीं निकलेगा। असली कसौटी यह होगी कि योजना कितनी व्यावहारिक है, उसका खर्च कितना है, उसका पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा और उससे प्रभावित लोगों के हितों की रक्षा कैसे होगी।
नदियों की ड्रेजिंग यानी तल में जमा गाद निकालने का प्रस्ताव भी गंभीरता से विचार करने योग्य है। यदि वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर जरूरत वाले हिस्सों में ड्रेजिंग की जाए और निकाली गई गाद का सुरक्षित उपयोग सड़क निर्माण में हो सके, तो इससे दोहरा लाभ मिल सकता है। गडकरी ने भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के माध्यम से कम लागत या नि:शुल्क ड्रेजिंग की संभावना भी जताई है। लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि हर नदी में गाद निकालना बाढ़ का स्थायी समाधान नहीं है। नदी की प्रकृति, तलछट के प्रवाह, जलधारण क्षमता और पारिस्थितिकी को ध्यान में रखे बिना की गई ड्रेजिंग उलटा नुकसान भी पहुंचा सकती है। इसलिए इस प्रस्ताव को वैज्ञानिक कसौटी पर परखकर ही लागू किया जाना चाहिए।
बिहार की बाढ़ समस्या का एक बड़ा पहलू नेपाल से आने वाली नदियां भी हैं। कोसी सहित कई नदियों का जल प्रवाह राज्य की सीमाओं से बाहर की परिस्थितियों से प्रभावित होता है। गडकरी ने नेपाल में कोसी नदी पर बांध परियोजना पूरी नहीं हो पाने पर अफसोस जताया है। यह तथ्य बताता है कि बिहार की बाढ़ का समाधान केवल पटना या दिल्ली में बैठकर नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए भारत और नेपाल के बीच निरंतर संवाद, साझा जल प्रबंधन, प्रभावी बाढ़ पूर्वानुमान और दीर्घकालिक सहयोग की आवश्यकता है। जब तक नदी घाटी के स्तर पर समन्वित रणनीति नहीं बनेगी, तब तक बिहार को हर साल बाढ़ के खतरे का सामना करना पड़ सकता है।
बाढ़ नियंत्रण के साथ-साथ नदियों को आर्थिक विकास का माध्यम बनाने पर भी ध्यान देना होगा। गडकरी ने तीन मीटर गहरे जलमार्ग के जरिए वाराणसी से बांग्लादेश के ढाका तक माल परिवहन की संभावना का उल्लेख किया है। यदि तकनीकी और पर्यावरणीय दृष्टि से यह संभव हो, तो जल परिवहन लॉजिस्टिक्स लागत कम करने, व्यापार बढ़ाने और उद्योगों को प्रोत्साहित करने में मदद कर सकता है। लेकिन इसके लिए नौवहन की निरंतरता, पर्याप्त जल गहराई, सुरक्षित जलमार्ग और आवश्यक बुनियादी ढांचे का विकास जरूरी होगा। बिहार को ऐसी योजनाओं में केवल रास्ता उपलब्ध कराने वाला राज्य नहीं, बल्कि आर्थिक गतिविधियों का सक्रिय केंद्र बनना चाहिए।
इसी तरह, कचरे से संपदा तैयार करने की अवधारणा बिहार के लिए नई आर्थिक संभावनाएं खोल सकती है। जैविक कचरे से बायो-सीएनजी, ठोस अपशिष्ट का वैज्ञानिक निस्तारण और निर्माण कार्यों में उपयुक्त अपशिष्ट पदार्थों का उपयोग रोजगार तथा निवेश के अवसर पैदा कर सकता है। मगर इन योजनाओं की सफलता केवल बड़े निवेश के आंकड़ों से नहीं मापी जानी चाहिए। यह भी देखा जाना चाहिए कि कितनी परियोजनाएं वास्तव में शुरू हुईं, कितने रोजगार पैदा हुए और पर्यावरण को कितना लाभ मिला।
राज्य में राजमार्ग निर्माण के लिए 3.85 लाख करोड़ रुपये के आवंटन का उल्लेख किया गया है, जिसमें पूरी हो चुकी, जारी और प्रस्तावित परियोजनाएं शामिल हैं। इतनी बड़ी राशि का उल्लेख अपने आप में विकास की उपलब्धि नहीं माना जा सकता। जरूरी यह है कि परियोजनाएं समय पर पूरी हों, उनकी लागत नियंत्रण में रहे और उनका लाभ आम नागरिकों, किसानों, कारोबारियों तथा उद्योगों तक पहुंचे। बाढ़ से प्रभावित इलाकों में सड़कों के निर्माण के साथ जल निकासी की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि सड़कें बनें, लेकिन पानी की प्राकृतिक निकासी बाधित हो जाए, तो विकास का उद्देश्य ही कमजोर पड़ सकता है।
बिहार को अब बाढ़ प्रबंधन के लिए स्पष्ट जवाबदेही तय करनी होगी। किस नदी पर क्या काम होगा, कब तक होगा, कितना खर्च आएगा और उससे बाढ़ के जोखिम में कितनी कमी आएगी इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए। संवेदनशील इलाकों की पहचान, आधुनिक पूर्वानुमान प्रणाली, समय पर चेतावनी, तटबंधों का नियमित निरीक्षण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को प्राथमिकता देनी होगी। साथ ही, केंद्र और राज्य सरकारों को ऐसी परियोजनाओं पर समन्वित ढंग से काम करना होगा, जिनका लाभ एक से अधिक राज्यों या देशों तक पहुंचता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बिहार की बाढ़ को नियति मान लेना बंद करना होगा। प्रकृति पर पूरी तरह नियंत्रण संभव नहीं है, लेकिन वैज्ञानिक तैयारी, बेहतर बुनियादी ढांचे और प्रभावी प्रशासन से नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ वित्तीय पारदर्शिता और परिणामों की नियमित समीक्षा भी जरूरी है।
बिहार को अब हर साल बाढ़ आने के बाद सक्रिय होने वाली व्यवस्था से आगे बढ़कर ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जो बाढ़ आने से पहले तैयार हो। नदियों का बेहतर प्रबंधन हो, जल संसाधनों का उपयोग बढ़े, जल परिवहन विकसित हो और बाढ़ से होने वाले नुकसान में वास्तविक कमी आए। गडकरी के सुझावों को इसी व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। बिहार को आश्वासनों की नहीं, परिणामों की जरूरत है; योजनाओं की नहीं, योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन की जरूरत है। जिस दिन बाढ़ का पानी बिहार की बर्बादी के बजाय उसके विकास की संभावनाओं से जुड़ने लगेगा, उसी दिन राज्य एक बड़ी ऐतिहासिक चुनौती से आगे बढ़ने की दिशा में वास्तविक कदम उठा सकेगा।

