लेखक: महेन्द्र तिवारी
जनविश्वास का क्षरण आज भारतीय लोकतंत्र के सामने एक गंभीर चुनौती बनकर उभरा है।
जनविश्वास का क्षरण: कारण और प्रभाव
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति केवल चुनाव नहीं, बल्कि नागरिक और शासन के बीच बना विश्वास है। जब जनता को यह भरोसा होता है कि उसकी आवाज सुनी जाएगी और उसके अधिकार सुरक्षित रहेंगे, तब वह सरकार के आह्वानों में सक्रिय भागीदारी करती है। पिछले कुछ वर्षों में देश ने ऐसे अनेक अवसर देखे, जब राष्ट्रीय एकता के प्रतीकात्मक अभियानों में लोगों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। वहीं हाल के समय में सार्वजनिक जीवन में एक प्रकार की शांति और संकोच भी दिखाई दे रहा है, जिसने राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषकों का ध्यान आकर्षित किया है।
बदलते वातावरण के कारण
इस बदलते वातावरण के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। इनमें कानूनों के दुरुपयोग की आशंका, उच्च शिक्षा से जुड़े विवाद, रोजगार की चिंता और समाज के विभिन्न वर्गों के बीच बढ़ता अविश्वास प्रमुख हैं। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम का मूल उद्देश्य कमजोर वर्गों को संरक्षण देना है, किंतु इसके दुरुपयोग को लेकर समय समय पर न्यायालयों, विधि विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों में बहस होती रही है। दूसरी ओर अनेक दलित और आदिवासी संगठन यह तर्क देते हैं कि यह कानून आज भी आवश्यक है क्योंकि सामाजिक भेदभाव और अत्याचार की घटनाएँ पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। इसलिए चुनौती कानून को समाप्त करने की नहीं, बल्कि न्याय और निष्पक्षता के बीच संतुलन स्थापित करने की है।
उच्च शिक्षा में विवाद
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी समानता संबंधी नए प्रावधानों को लेकर व्यापक विवाद सामने आया। कई विश्वविद्यालयों, शिक्षकों और छात्र संगठनों ने इन नियमों पर आपत्ति जताई, जबकि समर्थकों का कहना था कि इनका उद्देश्य भेदभाव रहित वातावरण बनाना है। इस विवाद का प्रभाव केवल शिक्षण संस्थानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह युवाओं की रोजगार संबंधी आशंकाओं से भी जुड़ गया।
राजस्थान के शहरी निकाय चुनावों का संदेश
हाल में संपन्न राजस्थान के शहरी निकाय चुनावों ने भी यह संकेत दिया कि स्थानीय चुनावों में मतदाता राष्ट्रीय नारों से अधिक स्थानीय मुद्दों को महत्व देता है। परिणामों में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी, किंतु कांग्रेस और निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। कई नगर निकायों में मुकाबला अत्यंत कड़ा रहा और निर्दलीयों की भूमिका निर्णायक बनी। इससे यह स्पष्ट हुआ कि मतदाता स्थानीय नेतृत्व, टिकट वितरण, नगर सेवाओं और क्षेत्रीय समस्याओं के आधार पर अलग अलग निर्णय ले सकता है। भारत निर्वाचन आयोग के आंकड़े भी इस प्रवृत्ति की पुष्टि करते हैं।
मतदाता का मौन और संवाद
लोकतंत्र में मतदाता का मौन भी एक संदेश होता है। हर असहमति सड़कों पर दिखाई दे, यह आवश्यक नहीं। अनेक बार नागरिक अपनी राय मतदान, जन संवाद और सामाजिक विमर्श के माध्यम से व्यक्त करते हैं। यही कारण है कि किसी भी सरकार के लिए केवल लोकप्रियता पर्याप्त नहीं होती, बल्कि निरंतर संवाद, पारदर्शी नीतियाँ और न्यायपूर्ण प्रशासन अधिक महत्वपूर्ण बन जाते हैं।
सामाजिक समरसता और न्यायपूर्ण प्रशासन की आवश्यकता
आज आवश्यकता इस बात की है कि सामाजिक समरसता को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से ऊपर रखा जाए। कानून ऐसे हों जो पीड़ित को सुरक्षा दें और निर्दोष को भी निष्पक्ष न्याय मिले। शिक्षा ऐसी हो जो अवसरों का विस्तार करे और युवाओं में विश्वास जगाए। लोकतंत्र तभी सशक्त होगा जब हर नागरिक स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और समान अधिकारों वाला सहभागी अनुभव करेगा।

