नई दिल्ली. दुष्कर्म से जुड़े 26 साल पुराने एक मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल रात में किसी महिला के घर में प्रवेश करना और उसके कपड़े उठाना भारतीय दंड संहिता (बीएनएस) के तहत दुष्कर्म या दुष्कर्म के प्रयास का अपराध नहीं माना जा सकता. हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले में बदलाव करते हुए मामले को महिला की गरिमा भंग करने और आपराधिक बल के इस्तेमाल से संबंधित अपराध माना है.
जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि दुष्कर्म किए जाने के पर्याप्त रूप से निकट कोई प्रत्यक्ष कृत्य भी, परिस्थितियों के आधार पर, भारतीय दंड संहिता के तहत दुष्कर्म के प्रयास का अपराध नहीं माना जा सकता. प्रत्यक्ष कृत्य से आशय अपराध की योजना को पूरा करने की दिशा में उठाए गए वास्तविक और ठोस कदम से है.
यह फैसला 31 अगस्त को सुनाया गया था और सोमवार को सार्वजनिक किया गया. आरोपी ने घाटशिला सत्र अदालत द्वारा 25 जुलाई, 2006 को सुनाई गई चार साल के सश्रम कारावास की सजा को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी.
हाईकोर्ट ने आरोपी की सजा में बदलाव करते हुए कहा कि वह मुकदमे के दौरान करीब आठ महीने हिरासत में रह चुका है. अदालत ने माना कि न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उसके द्वारा हिरासत में बिताई गई अवधि पर्याप्त है.
मामला वर्ष 1999 का है. चाकुलिया पुलिस ने 27 दिसंबर, 1999 को प्राथमिकी दर्ज होने के बाद आरोपी को गिरफ्तार किया था. पीडि़ता ने आरोप लगाया था कि आरोपी पिछली रात उसके घर में घुसा और दुष्कर्म करने के इरादे से उसके कपड़े उठाने की कोशिश की.
पुलिस ने मामले की जांच के बाद आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म के प्रयास का आरोपपत्र दाखिल किया था. इसके बाद निचली अदालत ने उसे दोषी ठहराते हुए चार साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी. हाईकोर्ट में अपील पर सुनवाई के दौरान अदालत ने अपराध की प्रकृति और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए निचली अदालत के फैसले में संशोधन कर दिया.

