Close Menu
Rashtra SamvadRashtra Samvad
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Rashtra SamvadRashtra Samvad
    • होम
    • राष्ट्रीय
    • अन्तर्राष्ट्रीय
    • राज्यों से
      • झारखंड
      • बिहार
      • उत्तर प्रदेश
      • ओड़िशा
    • संपादकीय
      • मेहमान का पन्ना
      • साहित्य
      • खबरीलाल
    • खेल
    • वीडियो
    • ईपेपर
    Topics:
    • रांची
    • जमशेदपुर
    • चाईबासा
    • सरायकेला-खरसावां
    • धनबाद
    • हजारीबाग
    • जामताड़ा
    Rashtra SamvadRashtra Samvad
    • रांची
    • जमशेदपुर
    • चाईबासा
    • सरायकेला-खरसावां
    • धनबाद
    • हजारीबाग
    • जामताड़ा
    Home » संस्कारों से खाली होती नई पीढ़ी का सबसे दर्दनाक सच: शिवचरण गुप्ता की कहानी
    मेहमान का पन्ना राजनीति शिक्षा संपादकीय

    संस्कारों से खाली होती नई पीढ़ी का सबसे दर्दनाक सच: शिवचरण गुप्ता की कहानी

    Devanand SinghBy Devanand SinghAugust 7, 2026No Comments5 Mins Read
    Share Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link
    संस्कारों से खाली होती नई पीढ़ी
    Share
    Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link

    लेखक: प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

    संस्कारों से खाली होती नई पीढ़ी का सबसे दर्दनाक सच आज हमारे सामने है। [चिता पर लकड़ियाँ कम, रिश्ते अधिक जल रहे थे] [क्या सचमुच हम अब अपने माता-पिता के उत्तराधिकारी हैं?]

    समाज की संवेदनहीनता: एक खुला घाव

    समाज की संवेदनहीनता अब कोई छिपी हुई बीमारी नहीं, बल्कि खुले घाव की तरह फैल रही है। जब कोई पिता, जिसने अपनी जवानी के सपने कुचलकर बेटियों को आत्मनिर्भर बनाया, बुढ़ापे में सोनीपत के वृद्धाश्रम की चारदीवारी में अंतिम सांस लेता है और उसकी संतानें अंतिम संस्कार में शरीर से नहीं, केवल पैसों या स्क्रीन से जुड़ती हैं, तब यह घटना एक परिवार की नहीं, पूरे युग की कहानी बन जाती है। शिवचरण गुप्ता जैसे पिता की चिता के सामने खड़े समाजसेवियों के कंधे बताते हैं कि रिश्ते अब खून से नहीं, सुविधा से तय होते हैं। तकनीक ने हाथों को जोड़ दिया, लेकिन हृदय को अलग कर दिया। यह विडंबना नहीं, एक चेतावनी है कि हम इंसानियत की परिभाषा ही बदल रहे हैं।

    संस्कारों से खाली होती नई पीढ़ी: एक चेतावनी

    एक समय था जब पिता की अंतिम यात्रा में बेटियों का कंधा देना सबसे बड़ा धर्म माना जाता था। आज वही धर्म वीडियो कॉल और पाँच हजार एक सौ रुपये में सिमट गया है। तीनों आत्मनिर्भर और सफल बेटियाँ—एक नेपाल, एक मुंबई, एक आजमगढ़ में—बाप की मृत्यु की खबर सुनकर भी शरीर से नहीं पहुँचीं। एक ने पैसा भेजा, दूसरी ने स्क्रीन पर चिता देखी, तीसरी ने शायद यह भी जरूरी नहीं समझा। उल्लेखनीय है कि बीमारी की सूचना लगभग 20 दिन पहले दे दी गई थी, फिर भी कोई बेटी नहीं पहुँची। क्या शिक्षा ने उन्हें केवल डिग्री दी और संवेदना छीन ली? पिता ने करोड़ों का कारोबार खोकर भी बेटियों को पढ़ा-लिखाया, पर बेटियों ने अंतिम क्षण में उपस्थिति का कर्ज नहीं चुकाया। यह लेन-देन नहीं, भावनात्मक दिवालियापन है।

    वृद्धाश्रम: सफल बच्चों के अकेले माता-पिता का ठिकाना

    वृद्धाश्रम अब अनाथों के नहीं, उन माता-पिता के घर बन गए हैं जिनके बच्चे सफल हैं। शिवचरण गुप्ता ने मुंबई में कपड़े का साम्राज्य खड़ा किया था, फिर सब कुछ खोया, पत्नी भी चली गईं, फिर भी बेटियों को आत्मनिर्भर बनाया। करीब डेढ़-दो साल पहले पत्नी के साथ वृद्धाश्रम पहुँचे। पत्नी मीना गुप्ता का निधन भी आश्रम में हुआ था और तब भी बेटियाँ नहीं आई थीं। दोनों बार आश्रम प्रबंधन और स्थानीय लोगों ने संस्कार किए। अब पिता की चिता पर भी वही दृश्य। समाज ने कंधा दिया, आँखें दान हुईं, दो दृष्टिहीनों को रोशनी मिली। पर जिन आँखों ने बेटियों को सपने दिखाए, उन आँखों को अंतिम विदाई में देखने वाली संतानें दूर रहीं। आँखों का दान रोशनी देता है, पर संतानों की अनुपस्थिति अंधेरा फैलाती है। HelpAge India जैसी संस्थाएं इस दिशा में कार्यरत हैं।

    आधुनिकता की दौड़ में रिश्ते हुए समयसारिणी के कैदी

    आधुनिक जीवन की भागदौड़ ने रिश्तों को समयसारिणी में कैद कर दिया है। करियर, शहर, विदेश—सब जरूरी लगते हैं, पर माता-पिता का अंतिम संस्कार फालतू। तकनीक हमें दुनिया से जोड़ती है, पर घर के आँगन से काट देती है। तीनों आत्मनिर्भर बेटियों में दो बेटियाँ शिक्षिका हैं, समाज को नैतिकता सिखाती होंगी, पर खुद के पिता की चिता के पास खड़े होने का समय नहीं निकाल सकीं। क्या यह शिक्षा की असफलता नहीं? डिग्रियाँ बढ़ीं, संस्कार सिकुड़े। बैंक बैलेंस भरा, हृदय खाली। पिता ने भूख छिपाकर पेट भरा, थकान छिपाकर नींव रखी, पर अंतिम यात्रा में अकेला छोड़ दिया गया।

    रिश्तों का सौदेबाजी में बदलना

    यह घटना हमें आईना दिखाती है कि हम संबंधों को भावुकता से नहीं, बल्कि सौदेबाज़ी से तौलने लगे हैं। धन भेजना सरल है, उपस्थिति कठिन। वीडियो कॉल से अंतिम संस्कार देखना संभव है, कंधा देना असंभव। पर अंतिम संस्कार मात्र एक क्रिया नहीं, जीवनभर के ऋण का सत्कार है। जिसे ऑनलाइन भुगतान से नहीं चुकाया जा सकता। शिवचरण गुप्ता की आँखें दो अजनबियों को प्रकाश दे गईं, पर अपनी संतानों को भावनात्मक अंधकार दे गईं। समाजसेवी कंधे दे रहे थे, बेटियाँ स्क्रीन पर थीं। वीडियो कॉल के दौरान एक बेटी की यह टिप्पणी भी सामने आई—‘कितना समय लगेगा?’ यह एक वाक्य ही रिश्तों की ठंडक और संवेदनहीनता को पूरी तरह उजागर कर देता है। यह दृश्य आँसू नहीं, आत्मा को हिला देता है।

    समय का पहिया और आने वाली पीढ़ी

    समय का पहिया न्यायसंगत है। जो व्यवहार हम माता-पिता के साथ करते हैं, वही हमारे बच्चों के सामने एक दिन लौटता है। आज की उपेक्षा निश्चित रूप से कल की विरासत बनेगी। वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ना केवल गरीबी नहीं, बल्कि भावनात्मक दरिद्रता का सबूत है। सफल बच्चे, अकेला बाप—यह नई सामान्य स्थिति बन रही है आजकल। भारतीय संस्कृति में माता-पिता देवतुल्य हैं, पर देवता को भी अंतिम क्षण में अकेला छोड़ दिया जाए तो संस्कृति का क्या अर्थ रह जाता है? पैसे से कर्ज नहीं चुकाया जाता, उपस्थिति से ही चुकाया जाता है।

    आत्ममंथन की आवश्यकता

    हमें सचमुच और गहराई से खुद से पूछना होगा—क्या हम भी कहीं केवल आर्थिक सहायता देकर इतिश्री मान बैठे हैं? क्या कभी बिना किसी स्वार्थ के उनके साथ बैठे और बातें कीं? उनका गहरा और दर्द भरा अकेलापन समझा? धन, पद, प्रतिष्ठा तो यहीं रह जाते हैं। याद रहती है केवल वह सच्ची गर्माहट। जिस दिन चिता के सामने संतान की जगह मोबाइल की स्क्रीन दिखे, समझ लेना चाहिए कि तकनीक पूरी तरह जीत गई, और इंसान बुरी तरह हार गया। शिवचरण गुप्ता की कहानी केवल एक समाचार नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक गहरी और जरूरी चेतावनी है।

    विकास की चमक और संवेदना की लौ

    विकास की चमक संवेदना की लौ को ढक रही है। यदि समय रहते नहीं संभाला तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें आधुनिक कहेंगी, मानवीय नहीं। माता-पिता को जीवनभर पैसे की नहीं, उपस्थिति की जरूरत होती है। अंतिम यात्रा में दो कदम साथ चलना उपकार नहीं, उस ऋण का छोटा प्रतिदान है जिसे कोई संतान जीवनभर नहीं चुका सकती। आँखें दान करके रोशनी दी जा सकती है, पर हृदय की रोशनी केवल प्रेम और उपस्थिति से जलती है। समाज यदि इसी राह पर चला तो संवेदनहीनता उसकी नई पहचान बन जाएगी।

    पारिवारिक मूल्य बुजुर्गों की उपेक्षा वृद्धाश्रम शिवचरण गुप्ता सामाजिक संवेदनहीनता
    Share. Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link
    Previous Articleवित्तीय घोटाला नहीं हुआ है: अयोध्या राम मंदिर चंदा विवाद पर सरकार का स्पष्टीकरण
    Next Article गम्हरिया पहुंचने पर इप्टा के राष्ट्रीय संगठन मंत्री का किया गया भव्य स्वागत

    Related Posts

    देहरादून में ‘सौहार्द’ और ‘सचित्र संविधान दर्शन’ प्रदर्शनी का आयोजन

    August 7, 2026

    ब्रह्माकुमारी संस्था के कार्यक्रम में युवाओं से नशामुक्त समाज बनाने का आह्वान

    August 7, 2026

    युवा शक्ति ही झारखंड के भविष्य की दिशा तय करेगी : सुदेश कुमार महतो

    August 7, 2026

    Comments are closed.

    अभी-अभी

    AI तकनीक से श्रावणी मेला प्रबंधन हुआ हाईटेक, रियल टाइम मॉनिटरिंग से श्रद्धालुओं को राहत

    स्वतंत्रता दिवस समारोह की तैयारियों का उपायुक्त ने लिया जायजा

    12वां राष्ट्रीय हस्तकरघा दिवस उत्साहपूर्वक मनाया गया

    देहरादून में ‘सौहार्द’ और ‘सचित्र संविधान दर्शन’ प्रदर्शनी का आयोजन

    ब्रह्माकुमारी संस्था के कार्यक्रम में युवाओं से नशामुक्त समाज बनाने का आह्वान

    आफताब आलम हत्याकांड में पुलिस को बड़ी सफलता, दो शूटर समेत चार गिरफ्तार

    लगातार पांचवीं बार नवल टाटा हॉकी झारखंड सब-जूनियर एवं जूनियर स्टेट चैंपियनशिप की मेजबानी करेगा एनटीएचए

    रेंगकर जलमीनार से लाती है पानी, बैटरी व्हीलचेयर के सहारे सपनों को उड़ान देना चाहती है मालती सिंह

    युवा शक्ति ही झारखंड के भविष्य की दिशा तय करेगी : सुदेश कुमार महतो

    नशे के अड्डों पर पुलिस का शिकंजा, सीनी में कई जगह छापेमारी

    Facebook X (Twitter) Telegram WhatsApp
    © 2026 News Samvad. Designed by Cryptonix Labs .

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.