सावन से पहले आषाढ़ी पूजा संपन्न, सुख-समृद्धि और अच्छी फसल की कामना
राष्ट्र संवाद संवादाता
जमशेदपुर: झारखंड की समृद्ध लोक परंपराओं में शामिल आषाढ़ी पूजा का विशेष महत्व है। सावन माह के आगमन से पहले आयोजित होने वाली यह पूजा गांवों में सुख-समृद्धि, शांति, समय पर अच्छी वर्षा और भरपूर फसल की कामना के लिए की जाती है। वर्षों पुरानी इस परंपरा को आज भी ग्रामीण समाज पूरी आस्था और श्रद्धा के साथ निभा रहा है। बदलते समय के बावजूद इस पूजा के प्रति लोगों की आस्था बरकरार है और नई पीढ़ी भी इसमें बढ़-चढ़कर भाग ले रही है।
इसी कड़ी में जमशेदपुर के बर्मामाइंस स्थित रजक समाज की ओर से पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ आषाढ़ी पूजा का आयोजन किया गया। सुबह से ही समाज के महिला, पुरुष और बच्चे पूजा स्थल पर एकत्र हुए। वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक विधि-विधान के बीच पूजा-अर्चना संपन्न हुई। श्रद्धालुओं ने गांव, समाज और परिवार की सुख-शांति तथा समृद्धि की कामना करते हुए देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त किया।
समाज के सदस्य नेहाल ने बताया कि आषाढ़ी पूजा में सात देवियों और एक देवता की विशेष रूप से आराधना की जाती है। लोक मान्यता के अनुसार इन देवी-देवताओं की कृपा से गांव में खुशहाली बनी रहती है, प्राकृतिक आपदाओं से रक्षा होती है और किसानों की फसल अच्छी होती है। उन्होंने कहा कि यह पूजा प्रकृति और कृषि से जुड़ी लोक आस्था का प्रतीक है, जिसे पूर्वजों से विरासत के रूप में वर्तमान पीढ़ी तक पहुंचाया गया है।
उन्होंने यह भी बताया कि इस पूजा में परंपरा के अनुसार बलि प्रथा का भी पालन किया जाता है, जो वर्षों से चली आ रही मान्यता का हिस्सा है। पूजा के दौरान गांव के बच्चों के उज्ज्वल भविष्य, परिवारों की खुशहाली, समाज की उन्नति और आपसी भाईचारे की कामना की गई। पूजा के बाद प्रसाद वितरण किया गया और सभी लोगों ने सामूहिक रूप से एक-दूसरे की खुशहाली की प्रार्थना की।
ग्रामीणों का कहना है कि आषाढ़ी पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि झारखंड की लोक संस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता का प्रतीक है। यह पर्व लोगों को अपनी सांस्कृतिक विरासत, पूर्वजों और प्रकृति से जोड़ने के साथ-साथ सामूहिक सहयोग, सद्भाव और सामाजिक समरसता का संदेश भी देता है। सावन के स्वागत से पहले आयोजित होने वाला यह पर्व ग्रामीण जीवन की आस्था, संस्कृति और परंपराओं को आज भी जीवंत बनाए हुए है।

