वेतन नहीं, तो व्यवस्था भी नहीं एमजीएम के होमगार्डों की चीख सुनिए सरकार
राष्ट्र संवाद संवादाता
अमन कुमार शांडिल्य
“हमको पैसा दिला दीजिए, नहीं तो हम मर जाएंगे…” यह किसी फिल्म का संवाद नहीं, बल्कि झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था के भीतर काम कर रही एक महिला होमगार्ड की असहनीय पीड़ा है। पांच महीने तक मेहनत कराने के बाद भी मानदेय नहीं देना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि श्रमिकों की गरिमा और जीवन के अधिकार के साथ सीधा अन्याय है।
एमजीएम अस्पताल में एक महिला होमगार्ड का फूट-फूटकर रोना और आत्महत्या की चेतावनी देना बताता है कि समस्या अब आर्थिक नहीं, मानवीय त्रासदी बन चुकी है। इससे पहले भी एक महिला होमगार्ड मानसिक तनाव में फिनाइल पी चुकी है। सवाल यह है कि आखिर कितनी घटनाओं के बाद सरकार जागेगी?
ऐसे समय में विधायक सरयू राय का हस्तक्षेप और स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी से बकाया वेतन जल्द दिलाने का आश्वासन निश्चित रूप से राहत देने वाला कदम है। लेकिन केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं होगा। जब तक भुगतान की तय समय-सीमा और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक हर आश्वासन अधूरा रहेगा।
विडंबना यह भी है कि अस्पतालों, नगर निकायों और सरकारी संस्थानों की व्यवस्था इन्हीं आउटसोर्सिंग कर्मियों, सफाईकर्मियों और होमगार्डों के भरोसे चलती है, लेकिन सबसे पहले इन्हीं के अधिकारों की अनदेखी होती है। न्यूनतम मजदूरी, पीएफ, ईएसआई और समय पर वेतन जैसी बुनियादी सुविधाएं भी यदि सुनिश्चित नहीं हो पा रही हैं, तो यह श्रम कानूनों और प्रशासनिक जवाबदेही दोनों पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।
सरकार को यह समझना होगा कि वेतन कोई उपकार नहीं, बल्कि कर्मचारी का वैधानिक अधिकार है। यदि समय पर भुगतान नहीं हुआ तो आर्थिक तंगी, मानसिक अवसाद और आत्मघाती कदमों की जिम्मेदारी केवल पीड़ितों की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की भी होगी जिसने उन्हें इस कगार पर पहुंचाया।
कड़वा सच यही है जिस व्यवस्था के सुरक्षा प्रहरी और कर्मी ही असुरक्षित हों, उस व्यवस्था पर जनता का भरोसा भी कमजोर पड़ जाता है। अब समय आश्वासनों का नहीं, तत्काल कार्रवाई का है।

