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    Home » चाटुकारिता की राजनीति: आत्मसम्मान की सरेआम नीलामी
    Breaking News Headlines राजनीति राष्ट्रीय संपादकीय

    चाटुकारिता की राजनीति: आत्मसम्मान की सरेआम नीलामी

    Devanand SinghBy Devanand SinghJuly 16, 2026No Comments3 Mins Read
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    चाटुकारिता
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    लेखक: इंद्र यादव

    इंद्र यादव/मुंबई/आजकल के दौर में रीढ़ की हड्डी का इस्तेमाल सिर्फ शरीर को सीधा रखने के लिए हो रहा है, बाकी काम तो ‘चाटुकारिता‘ की जीभ कर रही है। कहावत है कि नमक चाटने से हड्डियाँ गल जाती हैं, लेकिन मौजूदा समाज को देखें तो हड्डियाँ गलने की चिंता किसे है! यहाँ तो लोगों ने अपनी ज़मीर को ही ‘अचार‘ बना कर रख दिया है।

    नमक की कड़वाहट और चाटुकारिता का स्वाद

    सवाल हड्डियाँ गलने का नहीं, सवाल उस लत का है जो सत्ता, कुर्सी और पद के गलियारों से आती है। नमक चाटने का मतलब सिर्फ नमक का स्वाद लेना नहीं है, यह उन टुकड़ों का प्रतीक है जो ‘आकाओं‘ के टेबल से गिरते हैं। अफसोस इस बात का है कि नमक चाटने वाले इतने ‘प्रोफेशनल‘ हो गए हैं कि उन्हें यह भी एहसास नहीं होता कि कब उनकी हड्डियाँ अंदर से खोखली हो गई हैं। वे बस अपनी जीभ को इतना तेज़ कर चुके हैं कि सामने वाले के तलवे चाटना अब उनके लिए एक कला बन चुका है।

    तलवे चाटने की ‘अकादमी’

    तलवे चाटने का खेल अब सिर्फ गली-मोहल्लों तक सीमित नहीं है। आज यह कॉर्पोरेट बोर्डरूम से लेकर राजनीतिक मंचों तक का ‘टॉप स्किल‘ बन गया है। जिसे देखो, अपनी आत्म-सम्मान की पोटली को किनारे रखकर किसी के जूतों की चमक बढ़ाने में लगा है। इन्हें लगता है कि ये ‘स्मार्ट‘ हैं, जबकि सच्चाई यह है कि इनकी ज़मीर का वजूद उस तलवे की धूल से भी हल्का हो गया है जिसे ये अपनी जीभ से साफ कर रहे हैं।

    ज़मीर की कीमत और सस्ती वफादारी

    सबसे दुखद पहलू यह है कि यह सब कुछ एक ‘मेंटालिटी‘ बन चुकी है। आप किसी को टोकेंगे, तो जवाब मिलेगा—”भाई, आज के ज़माने में सर्वाइव करना है तो झुकना ही पड़ेगा।” अरे धिक्कार है ऐसी सर्वाइवल पर! जब इंसान अपनी ज़मीर को ही जूतों की पॉलिश में डुबो दे, तो उसकी ज़िंदगी और एक दरी में कोई फर्क नहीं रह जाता।

    परिणाम

    हड्डियाँ गलेंगी तो शरीर गिरेगा, लेकिन ज़मीर गलेगी तो इंसान गिरेगा। याद रखिए, नमक चाटकर जो वफादारी खरीदी जाती है, उसकी एक्सपायरी डेट बहुत छोटी होती है। जिस दिन ‘आका‘ का मूड बदला या आपका उपयोग खत्म हुआ, वे इसी ज़मीरविहीन व्यक्ति को अपने जूतों से कुचलने में एक सेकंड नहीं लगाएंगे।

    सोचिए, क्या आपकी रीढ़ इतनी कमज़ोर है कि वह सीधे खड़े होने का बोझ नहीं उठा सकती! या फिर वाकई आपकी जीभ का स्वाद ही आपकी ज़िंदगी का इकलौता मक़सद रह गया है!

    आईना साफ़ है, देखना आपको है कि उसमें इंसान दिख रहा है या सिर्फ एक और ‘चाटुकार‘।

    क्या आपको लगता है कि समाज में बढ़ते इस ‘चाटुकारिता‘ के चलन के लिए खुद सिस्टम जिम्मेदार है या फिर यह सिर्फ व्यक्ति की अपनी कमजोरी है!

    मनोविज्ञान और सामाजिक व्यवहार पर और पढ़ें

    आत्मसम्मान इंद्र यादव चाटुकारिता
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