लेखक: देवानंद सिंह
देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था में बदलाव के उद्देश्य से लाया गया ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान (VBSA) विधेयक, 2025′ अब केवल एक शिक्षा सुधार का प्रस्ताव नहीं रह गया है, बल्कि यह केंद्र और राज्यों के अधिकारों, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता तथा संविधान के संघीय ढांचे पर एक बड़ी बहस का विषय बन गया है। एक ओर केंद्र सरकार इसे उच्च शिक्षा में गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने वाला ऐतिहासिक कदम बता रही है, तो दूसरी ओर कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल इसे शिक्षा व्यवस्था के अत्यधिक केंद्रीकरण की दिशा में उठाया गया कदम मान रहे हैं।
विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक पर विपक्ष के आरोप
कांग्रेस का आरोप है कि यह विधेयक राज्यों के अधिकारों में हस्तक्षेप करता है और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को कमजोर करेगा। पार्टी का कहना है कि विश्वविद्यालयों को मिलने वाले अनुदान और नियामक शक्तियां यदि सीधे केंद्र सरकार या मंत्रालय के अधीन चली जाती हैं, तो स्वतंत्र शैक्षणिक संस्थानों की निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होगी। इसके साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि विधेयक राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 की उस भावना से मेल नहीं खाता, जिसमें संस्थानों को अधिक स्वायत्त और सक्षम बनाने की बात कही गई थी।
सरकारी पक्ष और उच्च शिक्षा में सुधार की आवश्यकता
दूसरी ओर, सरकार का तर्क है कि देश में उच्च शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता में असमानता, नियामक संस्थाओं की जटिल व्यवस्था और जवाबदेही की कमी लंबे समय से चिंता का विषय रही है। यदि एकीकृत और आधुनिक नियामक व्यवस्था बनाई जाती है, तो इससे शिक्षा प्रणाली अधिक प्रभावी होगी, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय विश्वविद्यालयों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी और छात्रों को बेहतर अवसर मिलेंगे। सरकार का मानना है कि शिक्षा व्यवस्था को समय के अनुरूप बदलना आवश्यक है।
असल प्रश्न यह नहीं है कि सरकार सही है या विपक्ष, बल्कि यह है कि क्या प्रस्तावित कानून शिक्षा व्यवस्था को वास्तव में मजबूत करेगा? यदि किसी कानून से राज्यों की भूमिका सीमित होती है, विश्वविद्यालयों की अकादमिक स्वतंत्रता प्रभावित होती है या निर्णय लेने की प्रक्रिया अत्यधिक केंद्रीकृत हो जाती है, तो इन चिंताओं पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। वहीं यदि वर्तमान व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है, तो केवल राजनीतिक विरोध के कारण आवश्यक सुधारों को रोकना भी उचित नहीं होगा।
विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान और संघीय ढांचे का संतुलन
भारत का संविधान संघीय व्यवस्था पर आधारित है। शिक्षा ऐसा क्षेत्र है, जहां केंद्र और राज्य दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए किसी भी बड़े शिक्षा सुधार में दोनों के बीच संतुलन और सहयोग आवश्यक है। उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता केवल प्रशासनिक सुविधा का विषय नहीं, बल्कि शोध, नवाचार और स्वतंत्र अकादमिक वातावरण की आधारशिला है। यदि यह स्वायत्तता कमजोर होती है, तो इसका असर देश की ज्ञान परंपरा और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर भी पड़ सकता है।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि विधेयक अभी संसद की संयुक्त समिति (जेपीसी) के विचाराधीन है। ऐसे में सरकार के पास सभी पक्षों की आशंकाओं को दूर करने और आवश्यक संशोधन करने का अवसर है। शिक्षा विशेषज्ञों, कुलपतियों, शिक्षकों, छात्रों और राज्य सरकारों के सुझावों को गंभीरता से शामिल किया जाना चाहिए। इसी प्रकार विपक्ष को भी केवल विरोध तक सीमित रहने के बजाय ऐसे व्यावहारिक सुझाव देने चाहिए, जिनसे शिक्षा व्यवस्था अधिक मजबूत और पारदर्शी बन सके।
निष्कर्ष: शिक्षा सुधार के लिए संवाद और सहमति आवश्यक
निष्कर्षतः, शिक्षा किसी राजनीतिक दल की विचारधारा का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। इसलिए वीबीएसए विधेयक पर निर्णय राजनीतिक लाभ-हानि के बजाय संविधान की भावना, संघीय ढांचे, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और छात्रों के भविष्य को केंद्र में रखकर होना चाहिए। यदि यह कानून व्यापक संवाद, सहमति और आवश्यक सुधारों के साथ लागू होता है, तो यह देश की उच्च शिक्षा के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता है। लेकिन यदि इसमें वास्तविक चिंताओं की अनदेखी की गई, तो यह लंबे समय तक विवाद और अविश्वास का कारण भी बन सकता है। शिक्षा सुधार की सफलता का रास्ता संवाद, सहमति और संतुलित नीति से होकर ही गुजरता है।

