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    श्रीगंगानगर दुष्कर्म: 32 दरिंदों ने छीना बचपन, क्या हम बेटियों को सुरक्षित रख पाए?

    Devanand SinghBy Devanand SinghJuly 4, 2026No Comments5 Mins Read
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    श्रीगंगानगर दुष्कर्म
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    एक बच्ची, 32 दरिंदे: क्या हम अपनी बेटियों को सुरक्षित रखने का हक खो चुके हैं!

    मुंबई/इंद्र यादव/राजस्थान के श्रीगंगानगर से आई खबर ने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है। यह श्रीगंगानगर दुष्कर्म केवल एक अपराध नहीं, बल्कि हमारे समाज और सरकार के चेहरे पर लगा एक ऐसा काला धब्बा है, जिसे किसी भी बहाने से मिटाया नहीं जा सकता। एक 13 साल की मासूम बच्ची, जिसे अभी दुनिया को समझना था, उसे 5 दिनों तक 32 हैवानों ने अपनी हवस का शिकार बनाया। यह घटना केवल एक अपराध नहीं, बल्कि हमारे समाज और सरकार के चेहरे पर लगा एक ऐसा काला धब्बा है, जिसे किसी भी बहाने से मिटाया नहीं जा सकता। यह सवाल हर अभिभावक के मन में उठ रहा है कि आखिर हमारी बेटियां कब और कहाँ सुरक्षित होंगी?

    श्रीगंगानगर दुष्कर्म पर सरकार और प्रशासन पर उठते तीखे सवाल!

    जब ऐसी भयानक घटना सामने आती है, तो सरकार की ओर से ‘बुलडोजर’ चलने की खबरें आती हैं। सवाल यह है कि क्या यह न्याय है? जी नहीं, यह सिर्फ अपनी नाकामी छुपाने की एक कोशिश भर है, जो वास्तविक समस्या से ध्यान भटकाने का प्रयास करती है।

    • खुली छूट या लापरवाही: 5 दिन का समय बहुत लंबा होता है। क्या प्रशासन सो रहा था? 32 दरिंदे 5 दिनों तक एक बच्ची को लेकर शहर की सड़कों पर घूमते रहे, होटलों में ले जाते रहे और पुलिस को खबर तक नहीं हुई। यह किसी एक व्यक्ति की चूक नहीं, बल्कि पूरी सुरक्षा व्यवस्था के चरमराने का सबूत है, जहाँ हर स्तर पर लापरवाही की गई।
    • होटलों की मिलीभगत: वे होटल, जहाँ ये अपराध हुए, क्या वे प्रशासन की अनुमति के बिना चल रहे थे? अगर चल रहे थे, तो वहां चल रहे गोरखधंधों पर आज तक ताले क्यों नहीं लगे थे? जब अपराध हो गया, तब बुलडोजर चलाकर अपनी ‘सख्ती’ दिखाने का नाटक क्यों किया जा रहा है? इन होटलों की भूमिका की गहन जाँच होनी चाहिए।
    • अधूरी कार्रवाई: 32 अपराधी हैं, लेकिन अभी तक केवल 12 ही गिरफ्तार हुए हैं। बाकी 20 दरिंदे अभी भी कानून की पकड़ से बाहर हैं। क्या सरकार उनका इंतज़ार कर रही है कि वे सबूत मिटा दें या भाग जाएं? इस धीमी और अधूरी कार्रवाई से जनता का विश्वास कमज़ोर होता जा रहा है।

    नागरिक का अधिकार और सरकार की जवाबदेही!

    एक नागरिक के तौर पर हमारा यह संवैधानिक अधिकार है कि हम सुरक्षित माहौल में जिएं। लेकिन श्रीगंगानगर की घटना ने साबित कर दिया है कि हमारे बच्चे अब अपने घरों और गलियों में भी सुरक्षित नहीं हैं। यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा केवल कागजों और विज्ञापनों तक ही सीमित रह गया है?

    सरकार से हमारे कुछ कड़े सवाल हैं:

    • सुरक्षा का क्या हुआ: ‘बेटी बचाओ’ का नारा केवल विज्ञापन तक सीमित क्यों रह जाता है? जमीनी स्तर पर हर शहर में एंटी-रोमियो स्क्वाड और पुलिस गश्त का क्या हाल है? क्या ये केवल नाम के लिए मौजूद हैं, या वाकई कोई ठोस काम करते हैं?
    • दिखावे से ऊपर उठें: बुलडोजर चलाने से सड़क चौड़ी हो सकती है, लेकिन उससे अपराधियों में वास्तविक डर पैदा नहीं होता। असली डर तब पैदा होगा जब पुलिस हर शिकायत पर तुरंत एक्शन लेगी, जब न्याय सालों तक लटकने के बजाय महीनों में मिलेगा। त्वरित और निष्पक्ष न्याय ही असली बदलाव ला सकता है।
    • जिम्मेदारी तय करें: जिस इलाके में यह घटना हुई, वहां की पुलिस की जवाबदेही तय होनी चाहिए। उन्हें निलंबित करना ही काफी नहीं है, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि उनकी लापरवाही ने एक मासूम की जिंदगी बर्बाद कर दी। इस तरह की घटनाओं में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई ज़रूरी है।

    अब नहीं तो कब: श्रीगंगानगर दुष्कर्म के दोषियों को कब मिलेगा न्याय?

    एक मासूम बच्ची का बचपन छीना गया है। आज पूरा समाज गुस्से में है, लेकिन यह गुस्सा केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहना चाहिए। हमें सरकार से पूछना होगा कि वे कब तक अपराधियों को ‘संरक्षण’ देने वाली व्यवस्था को ढोते रहेंगे? हमें यह भी याद रखना चाहिए कि बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। आप राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग की वेबसाइट पर अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

    बुलडोजर से घर गिराना आसान है, लेकिन एक बच्ची को जो मानसिक और शारीरिक घाव मिले हैं, उन्हें कोई बुलडोजर नहीं भर सकता। अगर हम अभी भी नहीं जागे, तो कल फिर कोई दूसरी बच्ची इस व्यवस्था का शिकार होगी। प्रशासन को यह समझ लेना चाहिए कि जनता अब ‘खोखले आश्वासनों’ से संतुष्ट नहीं होने वाली। हमें ठोस कार्रवाई, त्वरित न्याय और अपराधियों के लिए ऐसी मिसाल चाहिए, जिससे दोबारा ऐसा करने की किसी की हिम्मत न हो। इस शर्मनाक घटना पर आपका क्या सोचना है: क्या बुलडोजर जैसी तात्कालिक कार्रवाई से अपराध रुक सकते हैं, या हमें पुलिस और न्याय व्यवस्था में बड़े बदलावों की ज़रूरत है?

    पुलिस लापरवाही बेटी बचाओ श्रीगंगानगर
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