लेखक: देवानंद सिंह
फ्रांस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की संभावित मुलाकात से पहले अमेरिका द्वारा अपनी सैन्य कमान के नाम में किया गया बदलाव नई बहस को जन्म दे रहा है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) ने इंडो-पैसिफिक कमांड (INDOPACOM) का नाम बदलकर पुनः यूएस पैसिफिक कमांड कर दिया है। यह फैसला केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं माना जा रहा, बल्कि इसके दूरगामी रणनीतिक और कूटनीतिक संकेत भी तलाशे जा रहे हैं।
क्या इंडो-पैसिफिक कमांड के नाम बदलने से रणनीति में बदलाव?
वर्ष 2018 में ट्रंप प्रशासन ने ही यूएस पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर इंडो-पैसिफिक कमांड किया था। उस समय अमेरिकी रक्षा नेतृत्व ने स्पष्ट रूप से कहा था कि यह बदलाव भारत की बढ़ती वैश्विक और क्षेत्रीय भूमिका को सम्मान देने तथा हिंद महासागर और प्रशांत क्षेत्र को एकीकृत रणनीतिक क्षेत्र के रूप में देखने की नीति का प्रतीक है। इसके बाद भारत-अमेरिका संबंधों में रक्षा, व्यापार और सामरिक सहयोग लगातार मजबूत हुए। क्वाड जैसे मंचों पर दोनों देशों की साझेदारी भी गहरी हुई।
ऐसे में यदि अब इस कमान का नाम फिर से पैसिफिक कमांड किया गया है, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि क्या अमेरिका अपनी इंडो-पैसिफिक रणनीति की प्राथमिकताओं में बदलाव कर रहा है? क्या यह केवल नाम परिवर्तन है या इसके पीछे कोई बड़ा भू-राजनीतिक संकेत छिपा हुआ है?
नाम परिवर्तन के निहितार्थ और प्रतीकात्मक महत्व
हालांकि किसी सैन्य कमान का नाम बदलने मात्र से उसकी जिम्मेदारियां या रणनीतिक दायरा तुरंत नहीं बदल जाता। हवाई स्थित यह कमान अब भी हिंद महासागर से लेकर प्रशांत महासागर तक के विशाल क्षेत्र की जिम्मेदारी संभालती है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रतीकों का भी अपना महत्व होता है। “इंडो-पैसिफिक” शब्द में भारत की केंद्रीय भूमिका निहित थी, जबकि “पैसिफिक” शब्द उस महत्व को अपेक्षाकृत कम करता हुआ दिखाई देता है।
हाल के महीनों में भारत और अमेरिका के संबंधों में कुछ मुद्दों को लेकर मतभेदों की चर्चा रही है। ऐसे समय में यह निर्णय दोनों देशों के रणनीतिक रिश्तों पर सवाल खड़े कर सकता है। हालांकि यह भी संभव है कि अमेरिका ने यह बदलाव अपनी सैन्य संरचना या प्रशासनिक प्राथमिकताओं के तहत किया हो और इसका सीधा संबंध भारत से न हो। इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक स्पष्टीकरण और व्यापक संदर्भ को समझना आवश्यक होगा।
भारत आज हिंद महासागर क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण शक्तियों में से एक है और उसकी सामरिक स्थिति, आर्थिक क्षमता तथा वैश्विक प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। किसी नाम परिवर्तन से इस वास्तविकता को बदला नहीं जा सकता। फिर भी अमेरिका का यह कदम यह याद दिलाता है कि अंतरराष्ट्रीय संबंध स्थायी मित्रता नहीं, बल्कि स्थायी हितों पर आधारित होते हैं।
जी-7 शिखर सम्मेलन और भविष्य की कूटनीति
अब सबकी नजर जी-7 सम्मेलन में मोदी और ट्रंप की मुलाकात पर रहेगी। यदि दोनों नेता रणनीतिक साझेदारी को नई मजबूती देने का संदेश देते हैं, तो यह विवाद स्वतः शांत हो सकता है। लेकिन यदि मतभेद और गहराते हैं, तो इंडो-पैसिफिक से पैसिफिक तक का यह सफर भविष्य की कूटनीतिक दिशा का संकेत भी माना जा सकता है।
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