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    छऊ नृत्य के उस्ताद परीक्षित महतो ने चंदनकियारी के माटी की कला को दिलाया है राष्ट्रीय सम्मान लेकिन सरकार का उनके उत्थान पर नहीं है कोई ध्यान

    Sumi BangabashBy Sumi BangabashJune 11, 2026No Comments6 Mins Read
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    छऊ नृत्य के उस्ताद परीक्षित महतो ने चंदनकियारी के माटी की कला को दिलाया है राष्ट्रीय सम्मान लेकिन सरकार का उनके उत्थान पर नहीं है कोई ध्यान

     राष्ट्र संवाद संवादाता 

    खुद तंगहाली में रहकर छऊ लोकनृत्य के संरक्षण में खपा रहें हैं जीवन, झारखंड सरकार और बोकारो जिला प्रशासन से मदद की आस

    माटी की खुशबू को जिसने आसमान तक पहुँचाया है,
    अपनी कला के दम पर जिसने झारखंड का मान बढ़ाया है।
    घूंघरू बांधे पैरों में, जब उनकी कला का सैलाब आता है,
    तब गाँव की पगडंडी का सफर, सीधा राष्ट्रपति भवन पहुंच जाता है…..।

    जी हाँ, झारखंड की माटी में कला और संस्कृति की सुगंध रची-बसी है, जिसे यहाँ के समर्पित साधकों ने अपनी अटूट निष्ठा से जीवंत रखा है। इसी गौरवशाली परंपरा को राष्ट्रीय पटल पर एक नई ऊंचाई देने का काम बोकारो जिले के चंदनकियारी प्रखंड स्थित खेड़ाबेड़ा गांव के रहने वाले प्रतिष्ठित छऊ नर्तक परीक्षित महतो ने किया है। कला के प्रति उनकी अनवरत साधना को उस समय देश का नामचीन सम्मान मिला, जब उन्हें नई दिल्ली में आयोजित एक गरिमामयी समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के कर-कमलों द्वारा देश के सबसे प्रतिष्ठित ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ से नवाजा गया। वर्ष 1966 में एक साधारण कुड़मी कृषक परिवार में जन्मे परीक्षित महतो का यह सफर उनके व्यक्तिगत संघर्षों की विजय तो है कि साथ ही यह पूरे चंदनकियारी और झारखंड राज्य के लिए एक ऐतिहासिक और गौरवशाली क्षण भी है। यह सम्मान इस बात का साक्षात प्रमाण है कि यदि कला के प्रति समर्पण सच्चा हो, तो ग्रामीण आंचल की पगडंडियों से शुरू हुआ सफर भी देश के सर्वोच्च शिखर तक पहुँच सकता है।

    परीक्षित महतो के इस मुकाम तक पहुँचने की कहानी बेहद प्रेरणादायक और संघर्षों से भरी रही है। बचपन से ही छऊ कला और फुटबॉल खेल के प्रति गहरा रुझान रखने वाले परीक्षित ने महज पांच वर्ष की उम्र से अपनी प्रारंभिक शिक्षा की शुरुआत की थी। वर्ष 1982 में मैट्रिक और उसके बाद चास कॉलेज से इंटरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान ही उनके भीतर की कला ने एक बड़ा आकार लेना शुरू कर दिया था। अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाने की धुन इस कदर सवार थी कि उन्होंने वर्ष 1983 में महज सत्रह-अठारह साल की उम्र में तीस से चालीस स्थानीय युवाओं को एकजुट कर स्वयं एक छऊ पार्टी का गठन किया। तब से लेकर आज तक बीते चार दशकों से भी अधिक समय से उनकी यह छऊ मंडली निरंतर सक्रिय है और लोक कला का परचम लहरा रही है। उन्होंने छऊ नृत्य की बारीकियां इस विधा के महान उस्ताद स्वर्गीय धनंजय महतो और गंभीर सिंह मुण्डा जैसे दिग्गजों से सीखीं। कला को ही अपनी आजीविका और जीवन का एकमात्र ध्येय मानने वाले परीक्षित महतो ने कृषि कार्य के साथ-साथ इस पारंपरिक नृत्य को अपने जीवन का आधार बनाए रखा।

    छऊ नृत्य की मानभूम शैली के विकास और संरक्षण में उनका योगदान अतुलनीय है। पौराणिक और ऐतिहासिक गाथाओं को जीवंत करने की उनकी कला अद्भुत है, जिसे उन्होंने गणेश वन्दना में कार्तिक, महिषासुर वध में महिषासुर, बिरसा मुण्डा, अभिमन्यु, महिरावण और किरात अर्जुन में किरात कृष्णा जैसी कालजयी भूमिकाओं के माध्यम से मंच पर उतारा है। अपनी इस अद्भुत अभिनय और नृत्य क्षमता के बल पर उन्होंने देश के कोने-कोने में इस लोक कला का प्रदर्शन किया। उनके इस समर्पण को समय-समय पर विभिन्न प्रतिष्ठित मंचों द्वारा सराहा भी गया। जिसमें वर्ष 1991 में निरसा में मिला बेस्ट उस्ताद पुरस्कार, 1995 में चास ब्लॉक के भव्य आयोजन में प्राप्त दूरदर्शन पुरस्कार, संस्कार भारती द्वारा लखनऊ और बोकारो में मिले सम्मान और हाल के वर्षों में मिला चंदनकियारी महोत्सव सम्मान शामिल हैं। उन्होंने अपने गांव में ‘घोषाल कृषि मंगल छऊ नृत्य समिति’ की स्थापना कर इस विधा को एक संगठित स्वरूप दिया, जिसके माध्यम से देश के बड़े-बड़े मंचों पर झारखंड की सांस्कृतिक सुवास पहुँची।

    आज के इस आधुनिक दौर में, जहाँ युवा पीढ़ी अपनी पारंपरिक जड़ों से दूर होती जा रही है वहीं परीक्षित महतो चंदनकियारी स्थित ‘राष्ट्रीय छऊ नृत्य प्रशिक्षण एवं अनुसंधान केंद्र’ में एक मार्गदर्शक की भूमिका निभा रहे हैं। यह वही केंद्र है जिससे संबंधित सवाल कौन बनेगा करोड़पति में अमिताभ बच्चन पूछ चुके हैं।
    परीक्षित महतो नई पीढ़ी के युवाओं को इस ऐतिहासिक नृत्य शैली की बारीकियां और तकनीकी ज्ञान पूरी शिद्दत से सिखा रहे हैं, ताकि पूर्वजों की यह अनमोल धरोहर समय के थपेड़ों में कहीं खो न जाए। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार के रूप में उन्हें मिली सम्मान राशि, ताम्रपत्र और अंगवस्त्रम वास्तव में उनकी इसी निस्वार्थ कला-साधना का प्रतिफल है। परीक्षित महतो को मिला यह राष्ट्रीय गौरव न केवल छऊ नृत्य के सुनहरे भविष्य की उम्मीद जगाता है, बल्कि यह इस बात को भी रेखांकित करता है कि लोक कलाएं ही किसी समाज की वास्तविक पहचान होती हैं और उनका संरक्षण करना हम सभी का परम कर्तव्य है।

    परीक्षित महतो अपने जीवन को लोककला छऊ के संरक्षण के लिए खपा तो रहें हैं लेकिन उनके खुद के जीवन में संघर्षों की पीड़ा असहनीय है। तंगहाली के बावजूद इनकी हिम्मत, जज्बे और छऊ नृत्य के प्रति असीम प्रेम के उद्गार को सलाम करना होगा कि कर्ज़ लेकर भी इन्होंने चंदनकियारी का मान राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ाने का काम किया है। झारखंड सरकार, बोकारो जिला प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों से उन्होंने अपने वाद्ययंत्र और छऊ मुखौटा रखने के लिए एक अदद भवन की मांग की है साथ ही बीते समय उन्होंने दिल्ली के राजपथ में अपने छऊ नृत्य कला का प्रदर्शन किया लेकिन अबतक राशि की भुगतान नहीं हुई है। ऐसे में जरूरत है ऐसे कलाकारों को समेकित रूप से मिलकर सहयोग और संबल प्रदान करने की ताकि उनकी कला का परचम देश दुनिया में लहराता रहें और चंदनकियारी सहित संपूर्ण झारखंड का मान बढ़ता रहें। अब देखना भविष्य के गर्भ में है कि ऐसे कलाकार और कला के संरक्षण के लिए सरकार, प्रशासन और जनप्रतिनिधि आगे आते है या भी वही ढाक के तीन पात वाली कवाहत चरितार्थ होगी और इनकी जिंदगी तंगहाली में ही गुजर जाएगी। कुछ भी हो लेकिन परीक्षित महतो के छऊ नृत्य के प्रति जुनून को हम सलाम करते हैं और अंत में दो पंक्तियां उनके लिए प्रस्तुत करते हैं ।

    जड़ों से जुड़े रहकर जो इतिहास रचते हैं,
    वही सदियों तक लोगों के दिलों में बसते हैं।

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